भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 34

* माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * १३


जप होता रहता है, उन्होंने ही इस सम्पूर्ण जगत्को धारण किया है। पुण्यात्मा पुरुषोंने शिवजीके आँगनमें आरतीके समय बजानेके लिये जो बड़ा-सा नगारा रख छोड़ा हो, उसकी आवाजसे पापी मनुष्य भी पवित्र हो जाते हैं। इसलिये चिरकालसे संचित प्रचुर धन, बहुमूल्य चँवर, मंच, शय्या, दर्पण, चँदोवा, आभूषण तथा विचित्र वस्त्र भगवान् शिवकी सेवामें अर्पित करने चाहिये। पुराण-पाठ, कथा, इतिहास और संगीत आदि नाना प्रकारके आयोजन भगवान् शिवको प्रिय हैं; इनकी व्यवस्था करनी चाहिये। ऐसी व्यवस्था करके पापी मनुष्य भी अपने पापसे मुक्त होकर शिवलोकमें चले जाते हैं। जो स्वधर्मका पालन करनेवाले, महात्मा और शिव-पूजाके विशेषज्ञ हैं, जिन्होंने गुरुके मुखसे शिवकी दीक्षा ली है, जो निरन्तर शिवजीकीपूजामें संलग्न रहते हैं, मनमें दृढ़ विश्वास रखकर सम्पूर्ण विश्वको शिवके रूपमें देखते हैं, उत्तम बुद्धिका आश्रय ले सदाचारका पालन करते तथा अपने वर्ण-धर्म और आश्रम-धर्ममें स्थित रहते हैं, वे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा कोई भी क्यों न हों, भगवान् शिवके परम प्रिय होते हैं। चाण्डाल हो या सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण, भजन करनेपर सभी भगवान् शंकरको अत्यन्त प्रिय लगते हैं। भगवान् शंकर ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत्के आधार हैं, अतः सब कुछ शिवस्वरूप है— यह बात विशेष रूपसे जाननी चाहिये। वेद, पुराण, शास्त्र, उपनिषद्, आगम और देवता— सबके द्वारा भगवान् सदाशिव ही जानने योग्य हैं। मनुष्य निष्काम हो या सकाम, सबको भगवान् सदाशिवकी आराधना करनी चाहिये।

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शिवलिंग-पूजनकी महिमा तथा रावणके उत्कर्ष और पतनका वृत्तान्त

लोमशजी कहते हैं—जो विष्णु हैं, उन्हें शिव जानना चाहिये और जो शिव हैं, वे विष्णु ही हैं। पीठिका (आधार अथवा अर्घा) भगवान् विष्णुका रूप है और उसपर स्थापित लिंग महेश्वरका स्वरूप है। अतः शिवलिंगका पूजन सबके लिये श्रेष्ठ है। ब्रह्माजी निरन्तर मणिमय शिवलिंगका पूजन करते हैं। इन्द्र रत्नमय, चन्द्रमा मुक्तामय तथा सूर्य ताम्रमय लिंगकी सर्वदा पूजा करते हैं। कुबेर चाँदीके शिवलिंगकी, वरुण कुछ लाल रंगके शिवलिंगकी, यमराज नीले रंग, नैर्ऋत्य कोणके अधिपति रजतवर्ण तथा वायुदेव केसरिया रंगके शिवलिंगकी निरन्तर आराधना करते हैं। इस प्रकार इन्द्र आदि समस्त लोकपाल शिवलिंगोपासक हैं। पातालमें भी सब लोग शिवपूजक हैं। गन्धर्व और किन्नर भी शिवोपासना करते हैं। दैत्योंमें प्रह्लाद आदि कोई-कोई ही वैष्णव हैं। यही बात राक्षसोंके लिये भी है, उनमें भी विभीषणआदि ही वैष्णव हैं। बलि, नमुचि, हिरण्यकशिपु, वृषपर्वा, संह्लाद— ये तथा बुद्धिमान् शुक्राचार्यके और भी बहुत-से शिष्य शिवजीकी उपासना करनेवाले हैं। इस तरह प्रायः सभी दैत्य-दानव और राक्षस शिवाराधनमें ही रत रहते हैं। हेति, प्रहेति, संयाति, प्रयाची, प्रघस, विद्युज्जिह्व, तीक्ष्णदंष्ट्र, धूम्राक्ष, भीमविक्रम, माली, सुमाली, माल्यवान्, अतिभीषण, विद्युत्केश, खड्गजिह्व, महाबली रावण, दुर्धर्ष वीर कुम्भकर्ण तथा प्रतापी वेगदर्शी आदि समस्त श्रेष्ठ राक्षस सदा शिव-पूजनमें संलग्न रहे हैं। ये सर्वदा शिवलिंगका अर्चन करके उच्चकोटिकी सिद्धिको प्राप्त हुए हैं। रावणने ऐसी तपस्याकी थी, जो सभीके लिये दुःसह थी। महादेवजीको तपस्या बहुत प्रिय है। वे उसकी तपस्यासे जब बहुत अधिक प्रसन्न हो गये, तब उन्होंने रावणको ऐसे-ऐसे वरदान दिये, जो अन्य सबके लिये अत्यन्त दुर्लभ हैं। रावणने भगवान् सदाशिवसे