भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

ज्ञान, विज्ञान, संग्राममें अजेयता तथा शिवजीकी अपेक्षा दुगुने सिर प्राप्त किये। महादेवजीके पाँच मुख हैं। इसलिये उनसे द्विगुण मुख पाकर रावण दशमुख हुआ। उसने देवताओं, ऋषियों और पितरोंको भी सर्वथा परास्त करके उन सबपर अपनी प्रभुता स्थापित की। भगवान् महेश्वरके प्रसादसे वह सबसे अधिक प्रतापी हुआ। महादेवजीने उसे त्रिकूट पर्वतका महाराजा बना दिया।

इस प्रकार शिवलिंगकी पूजाके प्रसादसे रावणने तीनों लोकोंको वशमें कर लिया। देवताओंको बड़ी चिन्ता हुई। वे सब मिलकर शिवलोकमें गये और दरवाजेपर किंकरोंकी भाँति खड़े हो गये। उस समय नन्दी, जिनका मुख वानरके समान है, देवताओंसे वार्तालाप करने लगे। देवताओंने नन्दीको प्रणाम करके पूछा—'आपका मुख वानरके समान क्यों है?' नन्दीने कहा—" 'एक समय रावण यहाँ आया और अपने पराक्रमकी बातें बहुत बढ़-चढ़कर कहने लगा; उस समय मैंने उससे कहा—'भैया! तुम भी शिवलिंगके पूजक हो और मैं भी, अतः हम दोनों समान हैं; फिर मेरे सामने यह व्यर्थ डींग क्यों मारते हो?' मेरी बात सुनकर रावणने तुम्हीं लोगोंकी भाँति मेरे वानर-मुख होनेका कारण पूछा। उत्तरमें मैंने निवेदन किया कि 'यह मेरी शिवोपासनाका मुँहमाँगा फल है। भगवान् शिव मुझे अपना सारूप्य दे रहे थे, किंतु उस समय मैंने वह नहीं स्वीकार किया। अपने लिये वानरके समान ही मुख माँगा। भगवान् बड़े दयालु हैं। उन्होंने कृपापूर्वक मुझे मेरी माँगी हुई वस्तु दे दी। जो अभिमानशून्य हैं, जिनमें दम्भका अभाव है तथा जो परिग्रहसे दूर रहनेवाले हैं, उन्हें भगवान् शंकरका प्रिय समझना चाहिये। इसके विपरीत जो अभिमानी, दम्भी और परिग्रही हैं, वे शिवकी कल्याणमयी कृपासे वंचित रहते हैं।' रावण मेरे साथ पूर्वोक्त बातचीतमें अपने तपोबलका बखान करने लगा। उसने कहा—'मैं बुद्धिमान् हूँ, मैंने भगवान् शिवसे दस मुख माँगे हैं। अधिक मुखोंसे शिवजीकी अद्भुत स्तुति की जा सकती है। तुम्हारे इस वानरतुल्य मुखसे क्या होगा? तुम्हें किसीने खोटी सलाह दी होगी; तुमने शंकरजीसे यह वानरका मुख व्यर्थ माँगा है।' देवताओ! रावणका यह उपहासपूर्ण वचन सुनकर मैंने उसे शाप देते हुए कहा—'जब कोई महातपस्वी श्रेष्ठ मानव उन वानरोंके साथ मुझे आगे करके तुमपर आक्रमण करेगा, उस समय वह तुम्हें अवश्य मार डालेगा।' इस प्रकार सारे संसारको रुलानेवाले रावणको मैंने शाप दे डाला। देवाधिदेव महादेवजी साक्षात् विष्णुरूप हैं, अतः आपलोग भगवान् विष्णुसे प्रार्थना करें।'

नन्दीकी यह बात सुनकर सब देवता मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने वैकुण्ठमें आकर अपनी वाणीद्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति आरम्भ की।

देवता बोले—देवदेव जगदीश्वर! आप छहों ऐश्वर्योंसे युक्त होनेके कारण भगवान् कहलाते हैं। आपको नमस्कार है। यह सम्पूर्ण चराचर जगत् आपके आधारपर टिका हुआ है। यह जगत् एक लिंग है, जिसे आपने आधारपीठरूप होकर धारण किया है। प्रभो! हमलोगोंके लिये पहले भी आपने अनेक बार अवतार धारण किया है। आपने ही मत्स्यरूप धारण करके ब्रह्माजीके मुखमें वेदोंकी स्थापना की है। आपने ही हयग्रीवरूपसे मधु और कैटभ नामक दैत्योंको मारा है। कच्छप अवतार धारण करके आपने ही अपनी पीठपर मन्दराचल पर्वत उठाया था। वाराहरूप धारण कर आपने हिरण्याक्ष दैत्यका वध किया तथा नरसिंहरूपसे हिरण्यकशिपुको मौतके घाट उतारा है। वामन अवतार धारण कर आपने ही दैत्यराज बलिको बाँधा और भृगुकुलमें परशुरामरूपसे प्रकट होकर आपने ही कार्तवीर्य अर्जुनका वध किया है। विष्णो! आपने बहुत-से दैत्योंका संहार किया है। आप