भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 370
  • वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * | ३४१ ---|---

धारण करके खड़े हुए देखा है। सुदर्शनके पीछे गरुड़जी हाथ जोड़े खड़े हैं। इस प्रकार अद्भुत रूप धारण करनेवाले साक्षात् लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुका दर्शन करके मेरा मन बार-बार उन्हींकी ओर दौड़ रहा है मानो कोई इसे रस्सियोंमें बाँधकर अपनी ओर खींच रहा हो। तीर्थस्नान, तप, दान, देवयज्ञ और व्रतोंके द्वारा भी कोई वैसे दिव्यरूपमें भगवान्‌का दर्शन नहीं कर सकता। जो लोग निर्मल आकाशकी भाँति प्रतीत होनेवाले पुरुषोत्तमतीर्थनिवासी नील-विग्रह भगवान् विष्णुका ध्यान करते हैं वे सब प्रकारके बन्धनोंसे रहित होकर भगवान् विष्णुके धाममें प्रवेश करते हैं। जिसने नीलाचलनाथ भगवान्‌का दर्शन कर लिया है, वही दानी, वही यज्ञकर्ता, वही सत्यवादी, वही धर्मात्मा तथा वही सम्पूर्ण गुणोंसे श्रेष्ठ और समस्त जगत्में महान् है। राजन्! वहाँ जगदीश्वर माधवके जो सेवक हैं, उन्हींसे मैंने भगवान्‌के इस माहात्म्यका परिचय प्राप्त किया। वहाँ आदिसृष्टिकी परम्परासे चला आता हुआ पुरातन एवं सुप्रसिद्ध आख्यान सुनकर मैं यहाँ आया हूँ। महाराज! आपकी ही आज्ञासे श्रीपुरुषोत्तमका दर्शन करके वहाँका सब वृत्तान्त आपसे निवेदन किया है। अब आपकी जैसी इच्छा हो वैसा करें।

इन्द्रद्युम्न बोले—भगवान्! आपका वचन मेरे लिये सर्वथा विश्वसनीय है। आपके मुखसे भगवान्‌के पापहारी स्वरूपका वर्णन सुनकर तथा इस दिव्य प्रसादमालाका संयोग पाकर मैं कृतकृत्य हो गया। अनेक जन्मोंमें उपार्जित मेरी समस्त पापराशि आज नष्ट हो गयी। अब मैं भगवान् लक्ष्मीपतिके दर्शनका अधिकारी हो गया। सर्वतोभावेन वहाँकी यात्रा करूँगा और इस राज्य एवं बढ़ी हुई समृद्धिके द्वारा पुरुषोत्तमतीर्थमें निवासस्थान, नगर और दुर्ग बनवाऊँगा। भगवान् विष्णुकी प्रीतिके लिये सौ अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान करूँगा और प्रतिदिन सैकड़ों उपचारोंसे श्रीनाथजीकी पूजा करूँगा, व्रत, उपवास और नियमोंद्वारा जगद्गुरु भगवान्‌को प्रसन्न करूँगा, जिससे वे मुझ सन्तप्त प्राणीको अपने वचनामृतसे अभिषिक्त करेंगे। भगवान् नारायण दीनोंपर अनुग्रह करनेवाले हैं।

इस प्रकार राजा इन्द्रद्युम्न श्रद्धा और भक्तिसे भगवान् जगदीश्वरकी स्तुति कर रहे थे। इतनेमें ही सम्पूर्ण भुवनोंको देखनेकी उत्सुकता रखनेवाले देवर्षि नारदजी वहाँ आ पहुँचे। विष्णुभक्तोंमें श्रेष्ठ ब्रह्मपुत्र नारदजीको आते देख राजा सहसा उठकर खड़े हो गये और पाद्य, अर्घ्य एवं आचमनीय निवेदन करके उन्हें उत्तम आसनपर बैठाकर प्रणामपूर्वक हाथ जोड़कर बोले—‘आज मेरे सम्पूर्ण यज्ञ, दान, स्वाध्याय और तप सफल हो गये; क्योंकि मेरे घरपर ब्रह्माजीके द्वितीय स्वरूप देवर्षि नारद कृपापूर्वक पधारे हैं। मुने! आपने यहाँतक आनेकी कृपा की, इतनेसे ही यद्यपि मैं कृतार्थ हो गया हूँ तथापि आपकी प्रसन्नताके लिये आपकी क्या सेवा करूँ, आपकी किस आज्ञाका पालन करूँ? कौन-सा प्रयोजन लेकर आपने मेरे इस घरको पवित्र किया है?’

भक्ति और विनयसे सनी हुई राजाकी यह कोमल वाणी सुनकर नारदजीने मुसकराते हुए कहा—‘नृपश्रेष्ठ! तुम्हारे निर्मल गुणोंसे ब्रह्मा आदि सम्पूर्ण देवता, सिद्ध और मुनि अत्यन्त प्रसन्न हैं। तुमने बहुत अच्छा निश्चय किया। हजारों जन्मोंके अभ्याससे नीलाचलगुहानिवासी भगवान् माधवमें भक्ति होती है। परम बुद्धिमान् ब्रह्माजीने उन्हीं भगवान् जगदीश्वरकी आराधना करके इस सृष्टिका निर्माण किया और पितामहकी पदवी पायी है। तुम भी उन्हींके वंशमें उत्पन्न हुए हो, अतः भगवान्‌के प्रति तुम्हारी ऐसी भक्ति होनी उचित ही है। पग-पगपर दुःख और संकटोंसे व्याप्त इस संसाररूपी वनमें भटकते हुए मनुष्योंके लिये एकमात्र भगवान् विष्णुकी भक्ति ही सुख देनेवाली है। यह संसार एक