भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 371

३४२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

समुद्र है जहाँ कोई भी सहारा देनेवाला नहीं है। सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंकी प्रचण्ड आँधीसे इसमें सदा तूफान आता रहता है, इस कारण यह अत्यन्त दुस्तर है। इस भवसागरमें डूबे हुए मनुष्योंके लिये भगवान् विष्णुकी भक्ति ही नौका मानी गयी है। एकमात्र माता भगवती विष्णुभक्तिका आश्रय लेकर सन्तुष्ट रहनेवाले साधुपुरुष कभी शोक नहीं करते। राजन्! देहधारियोंकी जो बड़ी भारी पापराशि है, वह विष्णुभक्तिरूपी महान् दावानलमें पतंगोंकी भाँति जल जाती है। प्रयाग, गंगा आदि तीर्थ, तपस्या, श्रेष्ठ अश्वमेध यज्ञ, महान् दान, व्रत, उपवास और नियम—इन सबका सहस्रों बार सेवन किया जाय और इनके पुण्यसमूहको कोटि-कोटि गुना करके एकत्र किया जाय तो भी वह विष्णुभक्तिके हजारवें अंशके बराबर भी नहीं बताया गया है १।'

नारदजीके बताये हुए विष्णुभक्ति-माहात्म्यको सुनकर राजा इन्द्रद्युम्नके मनमें विष्णुभक्तिका स्वरूप जाननेकी इच्छा हुई। अतः उन्होंने पूछा—'भगवन्! भक्तिका क्या स्वरूप है? उसके लक्षणका वर्णन कीजिये।'

नारदजीने कहा—राजन्! सावधान होकर सुनो। मैं भगवान् विष्णुकी सनातन भक्तिका सामान्य और विशेषरूपसे वर्णन करता हूँ। गुणोंके भेदसे भक्तिके तीन भेद हैं—सात्त्विकी, राजसी और तामसी। इनके अतिरिक्त एक चौथी भक्ति भी है, जो निर्गुणा मानी गयी है। राजन्! जो लोग काम और क्रोधके वशीभूत हैं और प्रत्यक्ष (इस जगत्)-के सिवा और किसी (परलोक आदि)-की ओर दृष्टि नहीं रखते, वे अपनेको लाभ और दूसरोंको हानि पहुँचानेके लिये जो भजन करते हैं, उनकी वह भक्ति तामसी कही गयी है। अधिक यशकी प्राप्तिके लिये अथवा दूसरेकी स्पर्धा (लाग-डाँट)-से, प्रसंगवश परलोकके लिये भी, जो भक्ति होती है, वह राजसी मानी गयी है। पारलौकिक लाभको स्थायी समझकर और इहलोकके समस्त पदार्थोंको नश्वर देखकर अपने वर्ण तथा आश्रमके धर्मोंका परित्याग न करते हुए आत्मज्ञानके लिये जो भक्ति की जाती है, वह सात्त्विकी है। यह जगत् जगन्नाथका ही स्वरूप है, उनसे भिन्न इसका दूसरा कोई कारण नहीं है, मैं भी भगवान्‌से भिन्न नहीं हूँ और वे भी मुझसे पृथक् नहीं हैं, ऐसा समझकर भेद उत्पन्न करनेवाली बाह्य उपाधियोंका त्याग करना और अधिक प्रेमसे भगवत्-स्वरूपका चिन्तन करते रहना—यह अद्वैत (निर्गुणा) नामवाली भक्ति है, जो मुक्तिका साक्षात् साधन है। यह अत्यन्त दुर्लभ है। २

अब मैं भगवान् विष्णुके भक्तोंका लक्षण बतलाता हूँ—जिनका चित्त अत्यन्त शान्त है, जो सबके प्रति कोमल भाव रखते हैं, जिन्होंने स्वेच्छानुसार अपनी इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर ली है तथा जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा कभी दूसरोंसे द्रोह करनेकी इच्छा नहीं रखते, जिनका चित्त दयासे द्रवीभूत होता है, जो चोरी और हिंसासे सदा ही मुख मोड़े रहते हैं, सद्गुणोंके संग्रह तथा दूसरोंके कार्यसाधनमें जो प्रसन्नतापूर्वक संलग्न रहते हैं, सदाचारसे जिनका जीवन सदा उज्ज्वल (निष्कलंक) बना रहता है, जो दूसरोंके उत्सवको अपना उत्सव मानते हैं, सब प्राणियोंके


१- अश्वमेधः क्रतुवरो दानानि सुमहन्ति च। व्रतोपवासनियमाः सहस्राण्यर्जिता अपि॥
समूह एषामेकत्र गणितः कोटिकोटिभिः। विष्णुभक्तेः सहस्रांशसमोऽसौ न हि कीर्तितः॥
(स्क० पु०, वै० उ० १०। ७३-७४)

२- जगच्चेदं जगन्नाथो नान्यच्चापि च कारणम्। अहं च न ततो भिन्नो मत्तोऽसौ न पृथक् स्थितः।
हानं बहिरुपाधीनां प्रेमोत्कर्षेण भावनम्। दुर्लभा भक्तिरेषा हि मुक्तयेऽद्वैतसंज्ञिता॥
(स्क० पु०, वै० उ० १०। ८६-८८)