भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 373

३४४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

नामोंका कीर्तन होता रहे, तो मैं इसीको भजन मानता हूँ। तुम्हारे मनमें भगवान्‌के दास्यभावका ही चिन्तन होना चाहिये।

किंतु जो मनुष्योंके शुभ आचरणोंसे भी द्वेष करते हैं और स्वयं अपने चित्तको दुराचारमें ही बाँधे रखते हैं, बड़े भारी अमंगलको पा करके भी निश्चिन्त रहते हैं और सदा ऐश्वर्य तथा विषयभोगके रसमें ही सुखका अनुभव करते हैं, वे मनुष्य वैष्णव नहीं हैं; वे तो बहुत ही निम्नश्रेणीके मनुष्य हैं। अपने हृदयरूपी कमलमें विराजमान परमानन्दमय श्रीहरिके स्वरूपका जो क्षणभर भी चिन्तन नहीं करते, उन्मत्तभावसे बैठे रहते हैं और अपने झूठे वचनोंके जालसे भगवान्‌के नामको भी निरन्तर आच्छादित किये रहते हैं, वे भी भगवान्‌के भक्त नहीं हैं। जिनके मनमें परायी स्त्री और पराये धनके लिये सदा लोभ बना रहता है, जो कृपण बुद्धिवाले हैं और सदा अपना ही पेट भरनेमें लगे रहते हैं, वे नरपशु विष्णुभक्तिसे सर्वथा रहित हैं। जो निरन्तर दुष्ट पुरुषोंके साथ अनुराग रखते हैं, दूसरोंका तिरस्कार और हिंसा करते हैं, जिनका स्वभाव अत्यन्त भयंकर है तथा जो भगवान् नृसिंहके चरणोंके चिन्तनसे विरक्त रहते हैं, उन मलिन मनुष्योंको दूरसे ही त्याग देना चाहिये।


राजा इन्द्रद्युम्नका पुरुषोत्तमक्षेत्रको प्रस्थान और महानदीके तटपर विश्राम

जैमिनिजी कहते हैं—ब्रह्मपुत्र देवर्षि नारदसे इस प्रकार उत्तम भगवद्भक्तिका वर्णन सुनकर राजा इन्द्रद्युम्न बहुत प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले—‘भगवन्! विद्वान् पुरुषोंने मुझे बताया था कि साधु पुरुषोंका संग संसाररूपी रोगका नाश करनेवाला है, ऐसा साधुसंग मुझे इसी समय प्राप्त हुआ है। आपके संगसे मेरे अज्ञानमय अन्धकारका नाश हो गया, क्योंकि मेरा चित्त इस समय नीलमाधवकी पूजा करनेके लिये अत्यन्त उतावला हो रहा है। अतः हम और आप दोनों ही रथपर बैठकर चलें और भगवान् नीलमाधवका दर्शन करें। यदि आपके मुखसे पुरुषोत्तमक्षेत्रके तीर्थोंका ज्ञान प्राप्त कर सकूँ, तो पहलेके कहे हुए महात्माओंके वचन भी सफल हो जायँ।'

नारदजीने कहा—राजन्! यह तो बड़े हर्षकी बात है। मैं तुम्हें पुरुषोत्तमक्षेत्र और वहाँके तीर्थोंके दर्शन कराऊँगा। उस तीर्थमें जो शक्तियाँ और शिव आदि हैं, उन्हें भी दिखाऊँगा। उस क्षेत्रके माहात्म्यका भी परिचय दूँगा। तुम वहाँ भक्तोंको आत्मसमर्पण करनेवाले देवेश्वर भगवान् जगन्नाथका साक्षात् दर्शन करोगे।

इस प्रकार वार्तालाप करके दोनोंने प्रसन्नतापूर्वक दिनका कृत्य समाप्त किया और ज्येष्ठ शुक्ला पंचमी बुधवारको पुष्य नक्षत्रमें उत्तम लग्न आनेपर यात्रा अनुकूल होगी, ऐसा निर्णय करके दोनोंने रातके समय एक ही स्थानपर शयन किया। फिर सबेरा होनेपर नृपश्रेष्ठ इन्द्रद्युम्नने भाइयोंसहित नीलाचलपर जानेके विषयमें अपने राज्यमें यह घोषणा करायी कि 'हमलोग जीवनपर्यन्त पुरुषोत्तमक्षेत्रमें निवास करेंगे। राजालोग अपनी रानियों, मन्त्रियों तथा परिकरोंसमेत रथ, हाथी, घोड़ा, खजाना और पैदल सेना साथ लेकर वहाँ चलें।' इस प्रकार आज्ञा देकर राजा इन्द्रद्युम्न अपने आगे खड़े हुए नारद मुनिकी परिक्रमा करके छड़ीदार सिपाहियोंसे घिरे हुए मध्यद्वारपर आये। उनके आगे-आगे अग्निहोत्रकी अग्नि ले जायी जा रही थी। वहाँ उन्होंने अपने दाहिनी ओर ब्राह्मणोंको खड़े हुए देखा, जो मांगल्‍यसूक्तका पाठ कर रहे थे। राजाने भक्तिसे विनीत होकर वस्त्र, आभूषण, माला, सुगन्ध और अनुलेपनके