संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 374, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें* वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३४५
द्वारा उन ब्राह्मणोंका पूजन किया। इसी समय एक ही साथ सैकड़ों शंख बज उठे। उनके साथ और भी बहुत-से बाजोंकी तुमुल ध्वनि महाराजने सुनी। तदनन्तर वे मन्दिरमें भगवान् विष्णुका दर्शन करनेके लिये गये, जिनका स्मरण करनेसे मनुष्य सब प्रकारके कल्याणका भागी होता है। दिव्य सिंहासनपर बैठे हुए उन्हीं भगवान् विष्णुका दूरसे दर्शन करके उन्होंने साष्टांग प्रणाम किया और उपनिषदोंकी दिव्य वाणीसे उनकी स्तुति करके दुर्गाजीके चरणोंमें भी मस्तक झुकाया। तत्पश्चात् उन दोनों देवताओंकी परिक्रमा करके उन्हें पालकीमें बिठाया और उनको आगे करके प्रस्थान किया। बाहरके दरवाजेपर पहुँचकर उन्होंने अपना रथ तैयार देखा और परिक्रमा करके वे नारदजीके साथ उस रथपर बैठे। इन्द्रद्युम्नके रथके दोनों ओर उनके अधीन राजाओंके अनेकों रथ शोभा पा रहे थे, जो नाना प्रकारके अस्त्र-शास्त्रोंसे संयुक्त तथा ध्वजा-पताकाओंसे अलंकृत थे। उसी समय पुरवासी भी अपना-अपना सामान लेकर तैयार हो गये और घोड़े, खच्चर तथा ऊँट आदि वाहनोंपर चढ़कर वहाँसे चल दिये। राजाओंकी सैकड़ों रानियाँ, नपुंसक सिपाहियोंसे घिरी हुई अनेक प्रकारकी सवारियोंपर चढ़कर राजभवनसे बाहर निकलीं। बड़े-बड़े राज्याधिकारी तथा विशाल सैनिक भी उनकी रक्षामें तत्पर थे। राजाके सामन्त, मन्त्री, सेवक, पुरोहित, ऋत्विग् तथा राजाके व्यक्तिगत सेवक भी सब प्रकारके उपयोगी सामान साथ लेकर चले। कोषके संरक्षणमें नियुक्त किये गये राजकर्मचारी सारा खजाना साथ लेकर शीघ्र ही प्रस्थित हुए, जो अवसरके अनुसार राजसेवामें उपस्थित होते थे। सामान बेचकर जीविका चलानेवाले सेठ, व्यापारी, माली आदि भी अपनी-अपनी विक्रयकी वस्तुएँ लेकर राजाज्ञाका पालन करते हुए चले। जिसके लिये जो मार्ग सीधा प्रतीत हुआ, वह उसीसे गया। नीलाचलपर पहुँचानेवाले कठिन-से-कठिन मार्गके द्वारा भी लोगोंने यात्रा की। महाराज इन्द्रद्युम्न समस्त पुरवासियों तथा हर्षमें भरी हुई चतुरंगिणी सेनासे घिरे हुए थे। जंगलका रास्ता जाननेवाले पुरुष जो मार्ग बतलाते, उसीसे राजा यात्रा करते थे। मार्गके दोनों ओर आनेवाले देशों और वनोंको देखते हुए वे बड़ी शीघ्रतासे यात्रा कर रहे थे। महानदीके तटपर जहाँ वृक्ष बहुत कम थे तथा पर्वतीय गुफाओंके कारण जो स्थान बहुत प्रसिद्ध था, वहाँ उन्होंने अपराह्नकालका आवश्यक कृत्य करनेके लिये अपनी सेनाका पड़ाव डाला। फिर अपने पुरोहितके साथ नदीके जलमें उतरे और स्नान करके देवताओं तथा पितरोंका तर्पण किया। तत्पश्चात् विधिपूर्वक भगवान् विष्णुकी पूजा करके नारदजीके साथ बैठकर भोजन किया। जब सूर्य अस्ताचलके शिखरपर पहुँचे, तब सायंकालकी उपासना पूरी करके राजा सभामें बैठे। उस समय उन्होंने श्रेष्ठ वैष्णवोंका चन्दन, माला और ताम्बूलोंसे पूजन किया। तदनन्तर भगवान्के सर्वपापापहारी चरित्रका श्रवण करनेके लिये सिंहासनपर बैठे हुए मुनिवर नारदजीसे राजा इस प्रकार कहा—'भगवन् ! आप वेद और वेदांगोंकी निधि हैं, भगवान्के प्रिय