भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 376
  • वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३४७

राजाका एकाग्रक्षेत्र ( भुवनेश्वर )-में जाकर भगवान् शिवका पूजन करना और भगवान् शिवका नारदजीसे उनके कर्तव्यकार्योंका संकेत करना

जैमिनिजी कहते हैं—नारदजीके इस प्रकार आश्वासन देनेपर राजा इन्द्रद्युम्नने प्रसन्नचित्त होकर जब उत्तम बुद्धिसे विचार किया, तब अपने परिश्रमको सफल माना और सभासदोंको विदा करके मुनिका हाथ अपने हाथमें लेकर अन्तःपुरमें प्रवेश किया। फिर विधिपूर्वक उनकी पूजा करके उन्हें पलंगपर सुलाया और उन्हींके साथ बातचीत करते शेष रात्रि व्यतीत की। तदनन्तर निर्मल प्रभात होनेपर नित्यकर्म पूरा करके उन्होंने जगन्नाथजीका पूजन किया। तदनन्तर सब महानदीके पार उतरे। इसके बाद ओढ़्रदेशके राजाके बताये हुए मार्गसे राजा इन्द्रद्युम्न अपनी सेनाके साथ एकाग्रवन नामक क्षेत्रकी ओर चले। वहाँसे कुछ दूर आगे जानेपर मार्गमें 'गन्धवहा' नामवाली नदी मिली, जो बड़े वेगसे बह रही थी। उसको पार करके आगे बढ़नेपर शंख आदि वाद्योंकी ध्वनि सुनायी पड़ी। तब राजाने नारदजीसे पूछा—'महामुने! यह शब्द कहाँ हो रहा है?'

नारदजीने कहा—राजन्! यह अत्यन्त दुर्लभ क्षेत्र है, जिसे भगवान् विष्णुने गुप्त कर रखा है। तुम भाग्यवानोंमें श्रेष्ठ हो, इसीलिये तुम्हारे सौभाग्यसे जितेन्द्रिय पुरोहितने किसी प्रकार जाकर भगवान्‌का दर्शन किया है। यहाँसे तीसरे योजनपर नीलगिरि विद्यमान है और यह भगवान् गौरीपतिक एकाग्रवन नामक क्षेत्र है, जो अब अधिक दूर नहीं है। एक समय भगवान् शिवने लोकोंके आदिकारण अनादि पुरुषोत्तमका इस प्रकार स्तवन किया—'हे नारायण! हे परम धाम! हे परमात्मन्! हे परात्पर! हे सच्चिदानन्दमय वैभवसे युक्त निरंजन परमेश्वर! आपको मेरा नमस्कार है। आप संसारके कारण हैं और गुणोंके भेदसे सृष्टि, पालन तथा संहाररूप कर्म किया करते हैं। स्वप्रकाश परमात्मन्! आपने अपनी ही योगमायासे अपनेको गुप्त कर रखा है; आपको नमस्कार है। आप न भीतर हैं न बाहर, साथ ही बाहर भी हैं और भीतर भी। दूर होते हुए भी अत्यन्त निकट हैं; भारी, हलके, स्थिर, अत्यन्त सूक्ष्म और अतिशय स्थूल भी आप ही हैं; आपके लिये नमस्कार है। जिनके कटाक्षविलाससे कोटि-कोटि ब्रह्मा और अगणित रुद्र उत्पन्न होते हैं, उन कालात्मा श्रीहरिको नमस्कार है। जिनके एक-एक रोममें अनेकानेक ब्रह्माण्डोंका समुदाय भरा हुआ है तथा जिनका शरीर माँप-जोखके बाहर है, उन विश्वरूप भगवान्‌को नमस्कार है। जिनके स्वरूपभूत कालके परिमाणसे ब्रह्माकी सृष्टि और प्रलय होते हैं, मन्वन्तर आदिकी संघटना करनेवाले उन भगवान्‌को नमस्कार है।'

त्रिपुरासुरका दाह करनेवाले भगवान् शंकरने जब इस प्रकार स्तवन किया, तब शंख, चक्र, गदा धारण करनेवाले, वनमालाविभूषित, हार, कुण्डल, केयूर और मुकुट आदिसे सुशोभित कृपानिधान भगवान् गरुड़वाहन विष्णुने शिवजीसे कहा—'दक्षिण समुद्रके किनारे नीलाचलसे विभूषित जो दस योजन विस्तृत क्षेत्र चित्रोत्पला नदीसे लेकर समुद्रतक फैला हुआ है, उसके उत्तर 'एकाग्रवन' नामक सुन्दर वन है। वहीं पार्वतीजीके साथ आप निवास करें। यहाँ सब लोकोंकी सृष्टि करनेवाले ब्रह्माजी मेरे आदेशसे आपको कोटि लिंगोंके अधीश्वर पदपर अभिषिक्त करेंगे।'

भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर शिवजीने कहा—'देवदेव! जगन्नाथ! शरणागतदुःखभंजन!