संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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प्रभो ! जगत्पते ! आप पुरुषोत्तमक्षेत्रमें जानेके लिये जो आज्ञा दे रहे हैं, उसे शिरोधार्य करके मैं उस मोक्षदायक कल्याणमय तीर्थमें जाऊँगा।' यों कहकर भगवान् शंकर उस क्षेत्रमें पधारे। साक्षात् ब्रह्माजीने वहाँ भगवान् शंकरकी स्थापना की। राजन् ! अब हम सब लोग वहाँ चलेंगे और त्रिपुरविनाशक शिवजीका दर्शन करेंगे। यह जो शिवजीका क्षेत्र है, इसे तमोगुणका नाशक बताया गया है। जो रजोगुणको धो डालनेवाला क्षेत्र है, वह 'विरजमण्डल' नामसे प्रसिद्ध है। सत्त्वगुणकी अधिकताके कारण पुरुषोत्तमक्षेत्र मुक्तिदायक बताया गया है। महाराज ! जिनका चित्त पापकर्मोंसे मलिन हो गया है, उनका विश्वास इस क्षेत्रपर नहीं जमता।
नारदजीकी बात सुनकर राजाका चित्त प्रसन्न हो गया और वे बोले—'ब्रह्मन् ! आपने मुझे परम पावन क्षेत्रका परिचय दिया। जहाँपर साक्षात् भगवान् उमापति विराजमान हैं वहाँपर हम अवश्य चलेंगे।' इस निश्चयके अनुसार देवर्षि नारद और राजा इन्द्रद्युम्न दोपहरके समय सेनाके साथ एकास्रवन नामक क्षेत्रमें पहुँच गये। वहाँ बिन्दुतीर्थमें स्नान करके उसके तटपर विद्यमान भगवान् पुरुषोत्तमका उन्होंने विधिपूर्वक पूजन किया। उसके बाद वे कोटीश्वर महालयको गये। वहाँके जलसे भलीभाँति आचमन करके सात्त्विक धर्ममें स्थित राजाने त्रिभुवनेश्वर (भुवनेश्वर) नामक लिंगका महास्नानकी विधिसे पूजन किया। फिर अनन्यचित्तसे भगवान् शंकरका ध्यान करते हुए वे खड़े रहे। तब परमेश्वर भगवान् शंकरने प्रसन्न होकर स्पष्ट वाणीमें कहा—'महाराज इन्द्रद्युम्न ! थोड़े ही समयमें तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा।' तत्पश्चात् उन्होंने नारदजीसे कहा—'महाभाग ! ब्रह्माजीने जो आज्ञा दी है, उसे इस राजाद्वारा अश्वमेध यज्ञ कराते हुए पूर्ण करो। पुरुषोत्तमक्षेत्र साक्षात् भगवान् विष्णुका स्वरूप है। उसमें भी परम पुण्यमयी अन्तर्वेदी भगवान् विष्णुके हृदयके समान मानी गयी है, जिसकी रक्षाके लिये श्रीविष्णुने आठ स्वरूपोंमें मुझे स्थापित किया है। शंखाकार पुरुषोत्तमक्षेत्रके अग्रभागमें दुर्गा देवीके साथ मैं नीलकण्ठ नामसे निवास करता हूँ, वहीं इस राजाको ले चलो। इस समय नीलमणिमय विग्रहवाले भगवान् श्रीहरि अन्तर्धान हो गये हैं। वहाँ मेरी आज्ञासे भगवान् श्रीनृसिंहदेवका क्षेत्र बनाओ। उस क्षेत्रमें हमारे समीप नृपश्रेष्ठ इन्द्रद्युम्न एक सहस्र अश्वमेध यज्ञ करें। यज्ञ समाप्त होनेपर इन्हें वह अद्भुत ब्रह्मस्वरूप वृक्ष दिखलाओ। उसके द्वारा विश्वकर्मा चार प्रतिमाओंका निर्माण करेंगे और उन प्रतिमाओंकी स्थापनाके समय ब्रह्माजी स्वयं पधारेंगे। तदनन्तर ये राजा समस्त पापोंका नाश करनेवाले और सम्पूर्ण जगत्के आधारभूत भगवान् विष्णुका दर्शन करेंगे। काष्ठमय शरीर धारण करके प्रकट हुए भगवान् दर्शनमात्रसे मोक्ष प्रदान करनेवाले होंगे। नारद ! भगवान् विष्णु अपनी आज्ञाके पालन एवं भक्तिसे प्रसन्न होते हैं।'
नारदजी भी जगद्गुरु महादेवजीको प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोले—प्रभो ! आपने जो आदेश दिया है वैसा ही करनेके लिये ब्रह्माजीने भी मुझे आज्ञा दी है। नाथ ! आप और ब्रह्माजी परमात्मा श्रीहरिसे भिन्न नहीं हैं। इन राजा इन्द्रद्युम्नकी भाग्य-समृद्धि महान् है, इसीसे इन्हें आप तीनों देवताओंका वह विशाल अनुग्रह प्राप्त हुआ, जिसको मनके द्वारा सोचा भी नहीं जा सकता था। जिनके प्रसंगसे पापी मनुष्य भी भवसागरसे तर जाते हैं, वे भूतभावन भगवान् विष्णु अचिन्त्य महिमावाले हैं। वे भगवान् कितनी भक्तिसे प्रसन्न होते हैं, यह बात बुद्धिमें नहीं आ सकती। वेदोंके स्वाध्याय आदि साधनोंद्वारा चिरकालतक विद्वान् पुरुष यत्न करते रह जाते