संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 378, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें| * वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * | ३४९ |
|---|
हैं, किंतु सफलता नहीं पाते। और एक नीच मनुष्य अनायास होनेवाले कर्मसे मोक्ष पा जाता है। वनचर ग्वालोंके घरमें रहकर दही-दूध एवं जंगली फल-मूलोंसे जीविका चलानेवाली गोपियाँ भगवान्के स्नेह-सुखका उपभोग करके ही मुक्ति पा गयीं। निरन्तर भगवान्से द्रोह रखनेवाला शिशुपाल भी राजसूय यज्ञकी सभामें भगवान्को कटु वचन सुनाकर भी मोक्षको प्राप्त हुआ। भगवान्का चरित्र ऐसा है, वैसा है, इस प्रकारके निश्चयका विषय नहीं है। बहुत समयतक महान् प्रयत्न करते रहनेपर भी भगवान् विष्णुके दिव्य चरित्रके विषयमें कोई निर्णय नहीं दिया जा सकता। इस संसारमें पुरुषोत्तमक्षेत्रका निवास भगवान्की सायुज्यकी प्राप्ति करानेवाला है। भगवान् विष्णु इन्द्रद्युम्नके प्रसंगसे वहाँ सब लोगोंको प्रत्यक्ष दर्शन देंगे।
तदनन्तर महादेवजी 'तथास्तु' कहकर उसी क्षण अन्तर्धान हो गये।
राजा इन्द्रद्युम्नका नारदजीके साथ नृसिंहजी, कल्पवट तथा नीलमाधवके स्थानका दर्शन करना और आकाशवाणी सुनना
जैमिनिजी कहते हैं—तदनन्तर नारदजी और राजा इन्द्रद्युम्न पुरोहितके छोटे भाई विद्यापतिके साथ पुरुषोत्तमक्षेत्रमें नीलकण्ठ महादेवजीके समीप गये। वहाँ महादेवजीकी पूजा करके राजाने श्रीदुर्गाजीको भी प्रणाम किया। फिर सब लोग अपना उत्तम रथ छोड़कर अनुगामियोंसहित पैदल हो गये और अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए नीलगिरिपर चढ़नेके लिये आगे बढ़े। वह पर्वत नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे व्याप्त था। भाँति-भाँतिके पक्षी वहाँ कलरव करते थे। बड़ी-बड़ी चट्टानोंके कारण उस पर्वतका किनारा ऊँचा-नीचा एवं दुर्गम दिखायी देता था। वह नीलगिरि चारों ओरसे गोलाकार था। वे सब लोग उस मार्गसे गये, जहाँ काले अगुरु वृक्षके नीचे सब विपत्तियों और भयोंको हरनेवाले दिव्य सिंहरूपधारी भगवान् नृसिंह निवास करते हैं, जिनका दर्शन करके मनुष्योंकी कोटि-कोटि ब्रह्महत्याएँ विलीन हो जाती हैं। उनका मुख फैला हुआ है, दाँत बड़े भयंकर दिखायी देते हैं। कुछ पीले रंगके अयालों (गर्दनके बालों)-से उनका मुखमण्डल व्याप्त है। वे तीन नेत्रोंसे युक्त एवं भयानक हैं। अपनी जाँघोंपर उत्तान सोये हुए दैत्यके वक्षःस्थलको वज्रतुल्य कठोर नखोंसे विदीर्ण कर रहे हैं। मुखपर अट्टहासकी छटा है, जिसमें लपलपाती हुई लाल रंगकी जिह्वा शोभा पाती है। उनके हाथोंमें शंख और चक्र सुशोभित हैं। मस्तक किरीट-मुकुटसे उद्भासित हो रहा है। नेत्रोंसे आगकी चिनगारियाँ निकलती हैं, जिनसे समस्त दिशाएँ संत्रस्त हो रही हैं। प्रचण्ड आघातके कारण भगवान्के चरण-कमल धरतीमें धँस गये हैं। उन आदिमूर्ति भगवान् नृसिंहका दर्शन करके सबने प्रणाम किया। इन्द्रद्युम्नने भी भगवान् नृसिंहका दर्शन करके नारदजीके वचनोंपर विश्वास किया और कहा—'महर्षे! मैं कृतार्थ हो गया। आप तो ज्ञानकी निधि हैं। मैं तो भगवान्के दर्शनमात्रसे ही सब पातकोंसे छूट गया। दयासिन्धु भगवान्की नीलमणिमयी मूर्ति किस स्थानपर विराजमान है, जो दर्शनमात्रसे ही मुक्ति देनेवाली है। विप्रवर! उसीका मुझे दर्शन कराइये।' तब नारदजीने राजा इन्द्रद्युम्नको उस परम पावन स्थानका दर्शन कराया, जहाँ भगवान् विष्णु स्वर्णमयी बालुकासे आच्छादित हो गये थे। मुनिने वहाँ ले जाकर राजासे कहा—'महाराज!