भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 379

३५० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


इस दो योजन ऊँचे और एक योजनतक फैले हुए वटवृक्षको देखो। यह प्रलयकालमें भी स्थिर रहता है और मनुष्योंको मोक्ष प्रदान करनेवाला है। इसकी छायामें जानेसे ही मानव पापसे मुक्त हो जाता है। इसकी जड़में प्राण त्याग करनेवाला मनुष्य मोक्षको प्राप्त होता है। फिर जो इसकी पूजा और स्तुति करता है, उसके लिये तो कहना ही क्या है। इसके मूलभागसे पश्चिम और नृसिंहजीसे उत्तर भगवान् नीलमाधव विराजमान थे। वे ही तुमपर अनुग्रह करनेके लिये अब चार स्वरूपोंमें यहाँ प्रकट होंगे। जैसे श्वेतद्वीपके भीतर भगवान्‌का अपना धाम है, उसी प्रकार जम्बूद्वीपके अन्तर्गत यह पुरुषोत्तमक्षेत्र ही भगवान्‌का अपना धाम है। राजन्! जो मोक्षका अधिकारी है, वही इसकी महिमाको समझ पाता है। अन्य मनुष्योंके विशेषतः पापकर्मियोंके लिये यह विश्वासकी भूमि नहीं है। भगवान् जगन्नाथका अन्तर्धान होना या छिप जाना किसी विशेष कारणसे होता है, परंतु वे साधुपुरुषोंपर अनुग्रह करनेके लिये प्रत्येक युगमें प्रकट होते रहते हैं। राजन्! भगवान् मत्स्य, कच्छप आदि अनेक अवतारोंके द्वारा जब अवतारका उद्देश्य पूर्ण कर देते हैं, तब कारणकी निवृत्ति हो जानेसे वे अन्तर्धान हो जाते हैं। परंतु वे ही दयासागर भगवान् इस पुरुषोत्तमक्षेत्रमें बिना किसी कारणके नित्य निवास करते हैं। जैसे श्वेतद्वीपसे जाकर भगवान् विष्णु अन्यत्र अवतार लेते हैं, उसी प्रकार यहाँ रहते हुए भी वे द्वारिका, कांची और पुष्कर आदिमें कृपापूर्वक प्रकट होते हैं। राजन्! अनेकानेक तीर्थ, देश, क्षेत्र और मन्दिरोंमें भगवान् विराज रहे हैं।'

महात्मा नारदजीके दिखाये हुए उस स्थानको महाराज इन्द्रद्युम्नने साष्टांग प्रणाम किया और भगवान्‌को वहाँ प्रत्यक्ष स्थित मानकर इस प्रकार स्तवन किया—'देवदेव! जगन्नाथ! शरणागतोंकी पीड़ा दूर करनेवाले कमलनयन नारायण! मैं भवसागरमें डूबा हुआ हूँ, मेरा उद्धार कीजिये। परमेश्वर! एकमात्र आप ही दुःखराशिका विध्वंस करनेवाले हैं। क्षुद्र मनुष्य लेशमात्र सुखकी लिप्सासे क्षुद्र देवताओंकी सेवा करते हैं। भगवन्! आप भक्तिभावसे आराधना करनेपर मनुष्योंको साक्षात् मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं। अजामिल ब्राह्मणने अपने वर्णाश्रमोचित कर्मोंका परित्याग करके कौन-सा पाप नहीं किया था? किंतु नाथ! वह भी आपके नामका उच्चारण करनेमात्रसे मुक्त हो गया। आपके स्मरणमात्रसे ही पाश हाथमें लेकर आये हुए यमदूतोंने उसे छोड़ दिया। देवेश्वर! समस्त शास्त्रीय उपाय आपके दर्शनके लिये ही बताये गये हैं। आपका साक्षात्कार हो जानेपर हृदयके सभी संशय नष्ट हो जाते हैं, उसी क्षण मनुष्य सन्देहरहित हो जाता है। प्रभो! आप ही सबको आश्रय देनेवाले हैं। मुझ दीनपर अनुग्रह कीजिये। मैं आपसे केवल इतनी ही भीख माँगता हूँ कि आपकी जो मूर्ति यहाँ विराजमान है, उसका मैं इस नेत्रसे दर्शन करूँ। इसके सिवा दूसरा कोई प्रयोजन नहीं है।'

इस प्रकार हाथ जोड़े हुए राजा इन्द्रद्युम्नने भगवान् मधुसूदनकी स्तुति करके पृथ्वीपर लोटकर उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। उस समय उनके नेत्रोंमें आँसू भर आये थे। इसी समय आकाशवाणी हुई, जिसे इन्द्रद्युम्नने भी सुनी—'राजन्! चिन्ता न करो, मैं तुम्हें प्रत्यक्ष दर्शन दूँगा। देवर्षि नारदने ब्रह्माजीका जो वचन तुमसे कहा है, उसके अनुसार कार्य करो।' उस दिव्य वाणीको सुनकर राजाने नारदजीसे कहा—'मुने! आपने ब्रह्माजीकी आज्ञासे जो कुछ कहा था, इस आकाशवाणीने भी उसीका अनुमोदन किया है। ब्रह्माजी साक्षात् जगन्नाथ हैं। इन दोनोंमें कुछ भी भेद नहीं है। आप ब्रह्माजीके पुत्र हैं, आपका वचन भगवान्‌का ही वचन है; अतः मुझे उसका प्रयत्नपूर्वक पालन करना चाहिये।'


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