भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 385
३५६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

है। जगदात्मन्! आपको नमस्कार है। कैवल्यस्वरूप! त्रिगुणातीत! गुणांजन! आपको नमस्कार है। आप विशुद्ध निर्मल ज्ञानस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। शब्दब्रह्म नामसे प्रसिद्ध आपको नमस्कार है। जगत्स्वरूप! आपको नमस्कार है। संसारसागरमें गिरे हुए दीन-दुःखी मनुष्योंके दुःखका नाश करनेवाले आपको नमस्कार है। हृदयकी दुर्भेद्य ग्रन्थियोंका भेदन करनेवाले आपको नमस्कार है। आप चौदह भुवनरूपी भवनके मूलस्तम्भ हैं। आपको नमस्कार है। कोटि-कोटि ब्रह्माण्डोंकी रचना करनेवाले शिल्पीरूप आप भगवान् चक्रपाणिको नमस्कार है। आप करुणारूपी अमृतसिन्धुको बढ़ानेवाले चन्द्रमा हैं, आपको नमस्कार है। दीनोंका उद्धार करनेके लिये एकमात्र गुप्त दयासिन्धु-स्वरूप आपको नमस्कार है। जगत्को प्रकाशित करनेवाले जो सूर्य आदि ज्योतिर्मय ग्रह और नक्षत्र हैं, उनकी भी ज्योति आप हैं; आपको नमस्कार है। आप अन्तःकरणके पापोंको जलानेके लिये प्रदीप्त अग्निरूप हैं, आपको नमस्कार है। आप सबको पवित्र करनेवाले हैं। पवित्र वस्तुओंमें सबसे अधिक पवित्र हैं आपको बार-बार नमस्कार है। आप सबसे अधिक भारी, सबसे महान् और सबसे अधिक | विस्तारयुक्त हैं, आपको बार-बार नमस्कार है। आप अतिशय निकट, बहुत ही दूर और अत्यन्त छोटे हैं, आपको बार-बार नमस्कार है। नारायण! आप सबसे श्रेष्ठ और परम पवित्र हैं, आपको नमस्कार है। जगन्नाथ! मेरी रक्षा कीजिये। दीनबन्धो! आपको नमस्कार है। प्रभो! आपको सुखदायिनी नौकाके रूपमें पाकर मैं भवसागरके पार हो गया। रमानाथ! आपका दर्शन होनेसे मेरे सब क्लेश दूर हो गये। आप सच्चिदानन्दस्वरूप हैं। आपको प्राप्त हुए मनुष्योंके दुःखोंका सर्वथा नाश हो जाता है।<br><br>इस प्रकार ध्यानमें स्थित हुए राजा इन्द्रद्युम्नने जगदीश्वर भगवान् विष्णुकी यों स्तुति करके उन्हें प्रणाम किया। फिर ध्यानके अन्तमें राजाको अपने-आपका भान हुआ। वे सोचने लगे— यहाँपर भगवान् विष्णु कैसे स्वयं मेरे प्रत्यक्ष होंगे? इस चिन्तासे उनका मन व्याकुल हो उठा। उन्होंने नारदजीसे सब बातें कहीं। तब नारदजीने आश्वासन देते हुए कहा—'राजन्! अब तुम्हारा शोक समाप्त हो गया। इस यज्ञके अन्तमें भगवान् तुम्हें यहाँ प्रत्यक्ष दर्शन देंगे। ये सब बातें दूसरे किसीके आगे प्रकाशित न करना।'

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अश्वमेधकी पूर्ति, आकाशवाणी, भगवान्‌की काष्ठमयी प्रतिमाका निर्माण, संस्कार तथा स्तवन

**जैमिनिजी कहते हैं—**तदनन्तर राजाके अश्वमेध यज्ञमें सुत्या (सोमरस निकालने)-का उत्सव प्रारम्भ हुआ। उसमें दीनोंको बेरोक-टोक मनोवांछित दान दिये जाने लगे। उस समय नारदजीने नृपश्रेष्ठ इन्द्रद्युम्नसे कहा—'राजन्! अब पूर्णाहुतिका कार्य समाप्त हो, जिससे यह यज्ञ सफल हो | जाय। पहले ध्यानमें तुमने जो कुछ देखा है, उसके अनुसार तुम्हारे भाग्योदयका समय समीप आ गया है। श्वेतद्वीपमें जिन विश्वमूर्ति अविनाशी विष्णुका तुमने दर्शन किया है, उनके शरीरसे गिरा हुआ रोम वृक्षभावको प्राप्त हो जाता है। वह इस पृथ्वीपर स्थावररूपमें भगवान्‌का अंशावतार