भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 386, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 386
  • वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३५७

होता है। भक्तवत्सल भगवान् अब उसी रूपमें अवतीर्ण हो रहे हैं। तुम्हारे ही सौभाग्यसे सर्वपापापहारी भगवान् यहाँ सब लोगोंके नेत्रोंके अतिथि बनेंगे। अब यज्ञान्तस्नान समाप्त करके वृक्षरूपमें प्रकट हुए यज्ञेश्वर भगवान् विष्णुको तुम इस महावेदीपर स्थापित करो।' इस प्रकार विचार करके नारद और इन्द्रद्युम्न दोनों प्रसन्नतापूर्वक वहाँ गये और उस वृक्षको देखकर 'इसके रूपमें साक्षात् ब्रह्म भगवान् विष्णु प्रकट हो गये'—ऐसा मानते हुए सब लोग बड़े प्रसन्न हुए। चार शाखाओंसे युक्त उस चतुर्भुज वृक्षका दर्शन करके राजाने अपने परिश्रमको सफल माना। फिर नीलमणि माधवके अन्तर्धान होनेका जो शोक था, उसे उन्होंने त्याग दिया और बार-बार उस वृक्षको प्रणाम करके नेत्रोंसे आनन्दके आँसू बहाते हुए राजाने ब्राह्मणोंसे उस वृक्षको मँगवाया। वे लोग माला और चन्दनसे विभूषित विष्णुके उस दिव्य वृक्षको महावेदीपर ले आये। नारदजीके कहनेके अनुसार राजाने उस वृक्षका पूजन किया और पूजा समाप्त करके मुनिश्रेष्ठ नारदजीसे पूछा—'मुने! भगवान् विष्णुकी कैसी प्रतिमाएँ बनेंगी और उन्हें कौन बनायेगा?' नारदजीने उत्तर दिया—'राजन्! भगवान्‌की लीला सब लोकोंसे परे है, उसे कौन जान सकता है।' इस प्रकार बातचीत हो ही रही थी कि ऊपरसे आकाशवाणी सुनायी दी—'भगवान् विष्णु अत्यन्त गुप्त रखी हुई महावेदीपर स्वयं अवतीर्ण होंगे। पंद्रह दिनोंतक इसे ढक दिया जाय। हाथमें हथियार लेकर उपस्थित हुआ जो यह बूढ़ा बढ़ई है, इसे भीतर प्रवेश कराकर सब लोग यत्नपूर्वक दरवाजा बंद कर लें। जबतक मूर्तियोंकी रचना हो, तबतक बाहर बाजे बजते रहें; क्योंकि रचनाका शब्द कानमें पड़नेपर वह बहरा बना देनेवाला है। कोई भी भीतर प्रवेश न करे और न कभी देखनेकी चेष्टा करे; क्योंकि वहाँ काम करनेवालेके अतिरिक्त जो भी देखेगा, उसके दोनों नेत्र अन्धे हो जायँगे।'

तत्पश्चात् राजाने जिस प्रकार आकाशवाणीने कहा था, वैसी ही व्यवस्था कर दी। क्रमशः पंद्रहवाँ दिन आते ही भगवान् स्वयं चार विग्रहोंमें प्रकट हुए। बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शनचक्रके साथ भगवान् जनार्दन दिव्य सिंहासनपर विराजमान हुए। भगवान्‌के चार दिव्य रूप सम्पन्न हो जानेपर सम्पूर्ण विश्वके उपकारके लिये पुनः आकाशवाणी हुई—'राजन्! इन चारों प्रतिमाओंको वस्त्रोंसे भलीभाँति आच्छादित करके इन्हें अपने-अपने स्वाभाविक रंगकी प्राप्ति कराओ। भगवान् जनार्दन नीलमेघके समान श्यामवर्ण धारण करें, भगवान् बलभद्र शंख और चन्द्रमाके समान गौर वर्णसे विराजमान हों, सुदर्शन चक्रका रंग लाल होना चाहिये और सुभद्रादेवी कुंकुमके समान अरुण वर्णकी होनी चाहिये। इन विग्रहोंपर पहलेका किया हुआ रंग आदि संस्कार छूटनेपर प्रतिवर्ष नूतन संस्कार कराना चाहिये। केवल दिव्य वल्कल-लेप रहने देना चाहिये। यदि कोई प्रमादवश इस लेपको दूर करेगा तो राज्यमें दुर्भिक्ष और महामारी फैलेगी। राजन्! तुम्हें भी नग्न रूपमें इन मूर्तियोंका दर्शन नहीं करना चाहिये। अन्य मनुष्य भी यदि नग्न रूपमें देखेंगे तो उनके लिये भी ये भय उपस्थित करनेवाली होंगी। नाना प्रकारके लेपसे लिप्त एवं विचित्र शृंगारोंसे युक्त मूर्तियोंका ही दर्शन करना चाहिये। राजन्! तुम्हारे ऊपर कृपा करके भगवान् प्रकट हुए हैं और तुम्हारे ही प्रसादसे वे सब जीवोंको धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष प्रदान करेंगे। नीलाचलपर कल्पवृक्षके वायव्य कोणमें सौ हाथकी दूरीपर और भगवान् नृसिंहके उत्तर भागमें जो बहुत बड़ा मैदान है, उसमें अत्यन्त सुदृढ़ और हजार हाथ ऊँचा मन्दिर बनवाकर उसीमें भगवान्‌की स्थापना करो। पहले इस पर्वतपर जो प्रतिदिन भगवान् नील-

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