संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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माधवका पूजन करता था, वह विश्वावसु नामवाला शबर (भील) वैष्णवोंमें श्रेष्ठ है। उसके साथ तुम्हारे पुरोहितकी मित्रता हो चुकी है। इन्हीं दोनोंकी सन्ततिको भावी उत्सवोंमें भगवान्के विग्रहपर लेप और संस्कार करनेके कार्यमें लगाया जाय।'
इतना कहकर वह दिव्य आकाशवाणी मौन हो गयी। उसका उपदेश सुनकर राजाने प्रसन्नतापूर्वक उसका पालन किया। जब बलराम, श्रीकृष्ण, सुभद्रा तथा सुदर्शन चक्रपर आकाशवाणीके कथनानुसार लेप आदि संस्कार हो गया, तब उनकी आकृति बड़ी ही सुन्दर हो गयी। उसके बाद राजाने महावेदीका पर्दा खुलवा दिया। फिर सबने रत्नसिंहासनपर विराजमान भगवान्की झाँकी की। (वस्त्रालंकारोंसहित) उन भगवद्विग्रहोंका दर्शन करके राजा इन्द्रद्युम्न आनन्दके समुद्रमें डूब गये और नेत्रोंको कुछ-कुछ बंद किये, प्रेमके आँसू बहाते हुए हाथ जोड़कर खम्भेके समान खड़े रहे। तब नारदजीने राजासे कहा— 'नृपश्रेष्ठ! कमलके समान नेत्रोंवाले इन भगवान् जगन्नाथका दर्शन करो। ये भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये सम्पूर्ण ज्ञानकी निधि हैं। इन्हीं श्रीहरिको देखनेके लिये योगीलोग मनको संयममें रखकर सदा प्रयत्न करते रहते हैं। वे ही भगवान् विष्णु आज काष्ठमय शरीरमें स्थित हो तुमपर अनुग्रह करनेके लिये प्रत्यक्ष हुए हैं। इन करुणासागर भगवान्की स्तुति करो।'
नारदजीके द्वारा इस प्रकार सचेत किये जानेपर राजा इन्द्रद्युम्ने करुणामय जगन्नाथका स्तवन किया— 'दयासागर मुरारे! कहाँ तो ब्रह्मा, रुद्र तथा इन्द्रके मुकुटोंमें मग्न हुए आपके निर्मल युगलचरणारविन्द और कहाँ मल, मूत्र, रक्त, मांस एवं हड्डियोंसे बना और चमड़ेसे ढका हुआ मुझ दीनका यह अधम शरीर? ईश! इस असार संसारमें भटकते रहनेके कारण मैं श्रमसे व्याकुल हूँ। भला आपको कैसे जानूँ? देव! मैंने अपने कर्मोंद्वारा सुख भोगनेके लिये जिन विषय-भोगोंका संग्रह किया, वे ही परिणाममें मेरे लिये दुःखरूप हो गये। अतः मेरे समान दुःखी दूसरा कोई नहीं है। प्रभो! यदि मैंने पहले कभी मनसे भी आपकी उपासना की होती तो दुःख भोगनेके लिये बार-बार नाना प्रकारके जन्म मुझे क्यों प्राप्त होते? मुरारे! क्या आपके चरणारविन्दोंसे दूर रहनेका ही यह फल नहीं है? सम्पूर्ण पृथ्वीके धनसे भरा हुआ मेरा खजाना, सेना, मनके अनुकूल सैकड़ों स्त्रियाँ और निष्कण्टक राज्य यह सब कुछ आपके तत्त्वज्ञानसे शून्य पशुके तुल्य मुझ अधमके लिये बड़ा भारी भार हो रहा है। इसमें सदा कष्ट ही प्राप्त हुआ करता है। दीनोंपर दया करनेवाले प्रभो! आपके स्मरण करनेमात्रसे ही जीवकी मुक्ति होती है। इस संसारमें आपके सिवा मेरा कोई बन्धु नहीं है। मेरी बुद्धि आपके चरणारविन्दोंसे कभी अलग न हो। आप सच्चिदानन्दमय परिपूर्ण सिन्धु हैं। जो सहस्रों जन्मोंका भाग्योदय होनेपर आपको पा गये हैं, वे क्या कभी लेशमात्र सुख और अनन्त दुःखोंसे भरे हुए विषय-भोगरूपी इन्द्रजालकी ओर आँख उठाकर देखते हैं? कहाँ तो जिसमें लेशमात्र सुख और अनन्त दुःखोंकी खानरूप सैकड़ों ग्रन्थियाँ हैं, ऐसे कर्मोंका अटूट बन्धन और कहाँ अनन्त, अनादि, एक एवं आनन्दप्रद आपके पवित्र चरणारविन्द? सबपर स्वभावतः कृपा करनेवाले प्रभो! मूलभूत आप परमेश्वरको न पाकर तुच्छ कार्यके लिये बहुत भटकनेवाले क्लेशके ही भाजनरूप मुझ अत्यन्त दीनकी रक्षा कीजिये। सम्पूर्ण विश्वके एकमात्र वन्दनीय विष्णुदेव! वेदान्तवेद्य! अव्यय! विश्वनाथ! आप ही समस्त पापराशियोंका नाश करनेमें समर्थ हैं।