भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 389, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 389
३६०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

परम उज्ज्वल प्रतीत होता था। कहीं स्फटिकशिलाका योग होनेसे उसकी छवि शरद्-ऋतुके बादलोंकी-सी श्वेत जान पड़ती थी। कहीं काले पत्थरकी बनी हुई दीवार बादलोंकी काली घटा-सी दिखायी पड़ती थी। इस प्रकार परम सुन्दर बने हुए भगवान् विष्णुके मनोहर प्रासादमें विधिपूर्वक गर्भप्रतिष्ठा करके बिजली गिरने आदि उपद्रवोंसे मन्दिरको कोई क्षति न पहुँचे, इसके लिये शिल्पशास्त्रोंमें निश्चित विधानके अनुसार अपने पुरुषार्थसे उपार्जित की हुई मणि आदिको यथायोग्य स्थानोंपर लगाया गया। फिर मन्दिर-निर्माणके लिये आवश्यक सामग्रीके अनुरूप बहुमूल्य वस्तुओंका वहाँ यत्नपूर्वक संग्रह करवाया। तीनों लोकोंके राजा मनसे भी जिसकी सम्भावना नहीं कर सकते थे, ऐसे मनोहर एवं कीर्ति बढ़ानेवाले मन्दिरका निर्माण होने लगा। उसके तैयार हो जानेपर राजा इन्द्रद्युम्नने मुनिवर नारदजीसे कहा— 'देवताओं और असुरोंके लिये भी जो असम्भव था, वह सब मेरा कार्य भगवत्कृपासे सम्पन्न हो गया।' यह कहकर उन्होंने नारदजीके चरणोंमें प्रणाम किया। नारदजीने भी राजाको उठाकर उनका सत्कार किया और कहा— 'राजन् ! इस समय तुम जीवन्मुक्त हो गये हो। भगवान्‌के चरणारविन्दोंमें अनन्य भक्तिपूर्वक तुम्हारा चित्त जिस प्रकार लगा हुआ है, उससे बढ़कर मनुष्यके लिये और कौन-सा पुरुषार्थ हो सकता है? भूपाल! तीर्थ, मन्त्र, जप, दान, बहुत दक्षिणावाले यज्ञ, व्रत, स्वाध्याय और तपस्यासे भी जिसे प्राप्त करना असम्भव है, वही केवल भक्तिसे तुम्हारे हाथमें आ गया है। राजेन्द्र! तुम दीर्घकालतक पृथ्वीपर स्थित रहकर बड़े-बड़े उत्सवों और उपचारोंसे जगन्नाथजीकी उत्कृष्ट पूजा करो।'

तत्पश्चात् इन्द्रद्युम्नने जगन्नाथजीको दण्डवत्-प्रणाम किया और इस प्रकार स्तुति की— 'ब्रह्मण्यदेव भगवान्‌को नमस्कार है। गौओं और ब्राह्मणोंके हितैषी, शरणागतोंका दुःख दूर करनेवाले तथा चार पुरुषार्थोंके एकमात्र हेतु भगवान् श्रीहरिको नमस्कार है। हिरण्यगर्भरूप पुरुष और प्राकृत व्यक्त जगत् दोनों आपके स्वरूप हैं। आपको नमस्कार है। शुद्ध ज्ञानस्वरूप सच्चिदानन्दमय भगवान् वासुदेवको नमस्कार है।' इस प्रकार स्तुति करते हुए राजाके नेत्रोंमें आँसू भर आया। उन्होंने परिक्रमा करके बार-बार भगवान्‌को प्रणाम किया। तदनन्तर जो अन्य देवता वहाँ आये थे, वे प्रसन्नतापूर्वक भगवान्‌को प्रणाम करके हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे।

देवता बोले—परब्रह्म और परमात्माके नामसे जिसकी महिमाका गान किया जाता है, वह पुरुष ही भूत, वर्तमान और भविष्य सब कुछ है। इतनी इसकी महिमा (अपार वैभव) है। यह परम पुरुष श्रीहरि सबसे ज्येष्ठ और सबका स्वामी है। सम्पूर्ण विश्व इसके एक अंशमें स्थित है। इसका शेष तीन अंश विशुद्ध अमृतस्वरूप है, जो परम व्योममें विराजमान है। भगवन्! वह अमृतमय पुरुष आप ही हैं। आपसे ही वेद प्रकट हुए हैं, यज्ञमय पुरुष भी आपसे ही उत्पन्न हैं। आपसे ही घोड़े, गौ और भेड़ आदि पशु उत्पन्न हुए हैं। ब्राह्मण आपके मुखसे प्रकट हुए हैं, क्षत्रिय आपकी भुजाओंसे उत्पन्न हैं, वैश्योंका जन्म आपके ऊरुसे हुआ है तथा शूद्र आपके चरणोंसे प्राप्त हुए हैं। आपके मनसे चन्द्रमा, नेत्रसे सूर्य, कानों और प्राणोंसे वायु तथा जिह्वासे अग्निकी उत्पत्ति हुई है। आपकी नाभिसे आकाश, मस्तकसे स्वर्ग, पैरोंसे पृथ्वी और कानोंसे आठों दिशाएँ प्रकट हुई हैं। आपहीसे यज्ञकुण्डकी सात परिधियाँ (मेखलाएँ) तथा इक्कीस समिधाएँ प्रकट हुई हैं। समस्त चराचर भाव आपसे ही उत्पन्न हुए हैं। आप ही सम्पूर्ण जगत्‌के स्वामी

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