भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 390, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 390
  • वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३६१

और संरक्षक हैं। परमेश्वर ! भयानक रूप धारण करके सृष्टिका संहार करनेवाले भी आप ही हैं। आप ही यज्ञ, यज्ञांश, यज्ञेश तथा परात्पर परमात्मा हैं। आप शब्दब्रह्मसे परे और शब्दब्रह्मरूप ही हैं। जगन्नाथ ! आप ही विश्वराट्, स्वराट् और विराट् हैं। जगत्पते ! आप जगत्स्वरूप हैं। आपने ही ऊपर-नीचे तथा दायें-बायें सम्पूर्ण विश्वको व्याप्त कर रखा है। आपका यजन करनेवाले याज्ञिक पुरुष परम धामको प्राप्त होते हैं। आप ही भोज्य, भोक्ता, हविष्य, होता, हवन और उसके फलदाता हैं। प्रभो! आप समस्त कर्मोंके भोक्ता, सर्वकर्मस्वरूप, सब कर्मोंके उपकरण तथा सम्पूर्ण कर्मोंके फल देनेवाले हैं। आप ही सत्कर्मोंके लिये प्रेरणा करते हैं। धर्म, अर्थ और कामकी सिद्धि देनेवाले भी आप ही हैं। हृषीकेश ! मुक्ति देनेवाला भी आपके सिवा दूसरा कौन है? आपको नमस्कार है। आपका कहीं अन्त नहीं है। आपके सहस्रों रूप, सहस्रों पैर, नेत्र, मस्तक, ऊरु और भुजाएँ हैं। आपको नमस्कार है। सहस्रों कोटि युगोंको धारण करनेवाले और सहस्रों नामोंवाले आप सनातन पुरुषको नमस्कार है। प्रभो! संसारसमुद्रमें गिरे हुए प्राणीको शरण देनेवाले एकमात्र आप ही हैं। आपकी सृष्टिमें आपके समान दीनोंकी रक्षा करनेवाला दूसरा कोई नहीं है। दीनों और अनाथोंके एकमात्र आश्रय आप हैं। प्रभो! आप ही इस जगत्के पिता, पालक, पोषक और सम्पूर्ण आपत्तियोंका निवारण करनेवाले हैं। जगन्नाथ ! विष्णो ! हमारी रक्षा कीजिये। परमेश्वर ! हमारी रक्षा कीजिये। कमलाकान्त ! आपके सिवा कौन हमारी रक्षा करनेमें समर्थ है? अन्तर्यामिन् ! आपको नमस्कार है। सर्वतेजोनिधे ! आपको नमस्कार है।

इस प्रकार स्तुति करके देवताओंने बार-बार प्रणाम किया और इन्द्रद्युम्नके साथ बाहर निकलकर सब-के-सब भगवान् नृसिंहके क्षेत्रमें गये। वहाँ साष्टांग प्रणाम और नमस्कार करके परम भक्तिपूर्वक उन्होंने श्रीनृसिंहदेवका पूजन किया। उसके बाद वे नीलाचलके शिखरपर, जहाँ उत्तम प्रासादका निर्माण हुआ था, गये। देवताओंने आकाशमण्डलमें व्याप्त उस उच्चतम मन्दिरको देखा। राजा इन्द्रद्युम्नने विचार किया कि यह पूर्ण हुआ भगवान्‌का उत्तम मन्दिर दीर्घकालके बाद मेरे दृष्टिपथमें आया है। यह सब भगवान्‌के अनुग्रहसे हुआ है, इसमें मनुष्यका कोई पुरुषार्थ नहीं है। तदनन्तर उन्होंने अपने सहायकोंसे कहा—'जब काष्ठमय शरीर धारण करके स्वयं भगवान् यहाँ प्रकट हुए थे, उस समय आकाशवाणीने मुझसे कहा था कि तुम नीलाचलके शिखरपर जगन्नाथजीकी प्रतिष्ठाके लिये एक हजार हाथका मन्दिर बनाओ, उसकी स्थापनाके समय स्वयं ब्रह्माजी सिद्धों, ब्रह्मर्षियों और देवताओंके साथ पधारेंगे।'

तत्पश्चात् राजाने नारदजीसे पूछा—मुनिश्रेष्ठ ! मैं प्रतिष्ठाविधिकी वस्तुओंके विषयमें कोई जानकारी नहीं रखता। जो-जो एकत्र करनेयोग्य वस्तुएँ हों, उन सबको क्रमसे बतलाइये।

राजाके इस प्रकार कहनेपर नारदजीने शास्त्रके अनुसार विचार करके सब सामग्रीकी सूची एक पत्रपर लिखकर उन्हें दे दी। राजाने वह पत्र पद्मनिधिको दिया और कहा—'इसमें लिखी हुई वस्तुएँ एकत्र करो। ब्रह्माजीके लिये दिव्य भवनका निर्माण करो। ब्रह्मर्षियों, इन्द्रादि देवताओं, सिद्धों, मनुष्यों तथा मुनीश्वरोंके लिये यथायोग्य स्थान बनाओ।' इस प्रकार आदेश देते हुए राजा इन्द्रद्युम्नसे नारदजीने कहा—'राजन् ! तीन रथ तैयार कराइये। भगवान् वासुदेवके रथपर गरुड़ध्वज फहरा रहा हो और सुभद्राजीके रथके ऊपर कमलके चिह्नसे युक्त ध्वजा लगायी गयी हो। श्रीबलभद्रजीके रथपर तालध्वज या हलके चिह्न-युक्त ध्वज होना चाहिये। श्रीविष्णुके रथमें सोलह, बलभद्रके रथमें चौदह और सुभद्राके रथमें बारह पहिये होने

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