भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३६२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

चाहिये। चक्रधारी श्रीकृष्णके रथका विस्तार सोलह हाथ, बलभद्रजीके रथका विस्तार चौदह हाथ और सुभद्राजीके रथका विस्तार बारह हाथका हो।' नारदजीके इस वचनको सुनकर एक दिनमें तीन रथ बनाये गये, जिनके धुरे, चक्के, खंभे और द्वार सभी सुन्दर थे। तीनों रथोंका विस्तार उत्तम था। सबमें सुन्दर ध्वजा-पताका लगी थी। नाना प्रकारकी चित्रकारीसे वे तीनों रथ बड़े मनोहर प्रतीत होते थे। उनमें लगाम और बागडोरसे युक्त वायुके समान वेगवाले सैकड़ों सफेद घोड़े जुते हुए थे। नारदजीने शास्त्रके अनुकूल विधिसे रथोंकी प्रतिष्ठा की।

तत्पश्चात् ब्रह्माजीकी प्रेरणासे उस उत्तम प्रासादके समीप शुभ मुहूर्तमें सब देवता आ पहुँचे। राजा इन्द्रद्युम्नकी आज्ञासे विश्वकर्माने एक बहुत बड़ी रत्नमयी शाला तैयार की। उसमें प्रतिष्ठाकालिक पूजनोपयोगी वस्तु, हविष्य, समिधा, कुशा तथा अनेक प्रकारके भोजन और सम्पत्तिका संचय करके रखा गया।

उस समय पृथ्वीपर 'गाल' नामक राजा राज्य करते थे। उन्होंने भी माधवकी एक प्रस्तरमूर्ति बनवायी और उसके लिये एक छोटा-सा मन्दिर तैयार कराकर उसमें उसकी स्थापना और पूजा की। फिर दूतके मुखसे राजा इन्द्रद्युम्नके उद्योगको सुनकर राजाको क्रोध हुआ और वे सेनासमेत कुपित हो नीलाचलपर आये। वहाँ आनेपर उन्होंने प्रतिष्ठाका ऐसा आयोजन देखा, जो मनुष्योंके लिये स्वप्नमें भी दुर्लभ था। उसे देखकर राजाके मनमें बड़ा विस्मय हुआ। वहाँके सब वृत्तान्तको जानकर राजा गालने अपनेको कृतार्थ माना और यह अनुभव किया कि इससे बढ़कर कल्याणकारक कर्म न हुआ है और न होगा। फिर तो वे हाथ जोड़कर राजा इन्द्रद्युम्नके समीप गये और बोले—'देव! आप राजाओंके राजा तथा जीवन्मुक्त हैं। मैं आपकी क्या स्तुति करूँ। आप मुझपर प्रसन्न होइये।'

इस प्रकार निवेदन करते हुए श्रेष्ठ राजा गालसे इन्द्रद्युम्नने कहा—'राजन्! आप अपनी तुच्छताका अधिक बखान क्यों करते हैं? आप भी सार्वभौम सम्राट् और भगवान् विष्णुके भक्त हैं। प्रजाओंके पालनमें तत्पर रहनेवाला राजा प्रजाके रक्षारूप उत्तम मार्गपर चलकर इस लोकमें कीर्ति और धर्मका उपार्जन करता है। आप तो भगवान्‌के भक्त हैं। अतः आपको विशेषरूपसे सफलता मिलेगी। राजन्! काष्ठरूपमें अवतीर्ण हुए साक्षात् भगवान् विष्णुका यह प्रासाद है। चार स्वरूपोंमें व्यक्त हुए भगवान् जनार्दनकी इस मन्दिरमें स्थापना करके मैं यह मन्दिर आपको ही सौंपकर चला जाऊँगा। आप ही इसमें पूजा आदिकी व्यवस्था करेंगे।' यह सब सुनकर राजा गाल बहुत प्रसन्न हुए। इन्द्रद्युम्नने जो-जो आदेश दिया, उसका वे बड़ी शीघ्रताके साथ पालन करने लगे। इस प्रकार सब सामग्री जुट जानेपर देवताओंसे घिरे हुए सिंहासनपर विराजमान राजा इन्द्रद्युम्न इन्द्रकी भाँति शोभा पाने लगे। इतनेमें ही देवताओंके जय-जयकारसे स्तुति किये जाते हुए साक्षात् ब्रह्माजी दिखायी पड़े। राजा इन्द्रद्युम्नने दोनों हाथ जोड़कर भक्तिभावसे उन्हें मस्तक झुकाया तथा गालराज और नारदजीके साथ भूमिपर सिर रखकर साष्टांग प्रणाम किया। फिर उठकर प्रसन्नताका अनुभव करते हुए अपनेको कृतार्थ माना। उस समय उनके सब अंगोंमें रोमांच हो आया था।

जैमिनिजी कहते हैं—राजा इन्द्रद्युम्नको अपने चरणोंमें प्रणाम करते देख प्रजापति ब्रह्माजीने मुसकराते हुए कहा—'राजन्! अपना सौभाग्य तो देखो—ये सब देवता, ऋषि, पितर और सिद्ध-विद्याधर आदि मुझे आगे करके तुम्हारे लिये यहाँ एकत्र हुए हैं।' ऐसा कहकर ब्रह्माजी शीघ्र