भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 392
  • वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३६३

ही भगवान् नारायणके रथके समीप गये और उन जगदीशजीको प्रणाम करके तीन बार परिक्रमा करनेके पश्चात् आनन्दके समुद्रमें निमग्न हो गये। उनके शरीरमें रोमांच हो आया। उन्होंने गद्गद स्वरमें अपने ही स्वरूपभूत भगवान् जगन्नाथकी इस प्रकार स्तुति की—‘प्रभो! आपको नमस्कार है। मैं आप हूँ और आप मैं हूँ। यह सम्पूर्ण चराचर जगत् आपका ही स्वरूप है। महत्तत्त्वसे लेकर सम्पूर्ण प्राकृत जगत् आपकी ही मायाका विलास है। विश्वात्मन्! यह संसार आपमें ही अध्यस्त (आरोपित) है और आपके ही द्वारा इसमें परिणाम (परिवर्तन अथवा विकार) होता है। यह सम्पूर्ण प्रपंच, जो भासित हो रहा है, आपके तत्त्वको न जाननेके कारण ही है। आपके स्वरूपका यथार्थ बोध हो जानेपर यह आपमें ही विलीन हो जाता है। ठीक उसी तरह जैसे रज्जुके स्वरूपका निश्चय हो जानेपर उसमें भ्रमवश प्रतीत होनेवाला सर्प वहीं लीन हो जाता है। सत्ताके विचारसे यह सब कुछ सत्स्वरूप होनेके कारण अनिर्वचनीय ही है। प्रभो! आप अद्वितीय हैं। जगत्‌को आपसे ही प्रकाश मिलता है, आप स्वयंप्रकाश हैं। आपको नमस्कार है। संसारका समस्त आनन्द सहजानन्दस्वरूप आप परमात्माका एक तुच्छतम अंश है, जिसके सहारे सब प्राणी जीवन धारण करते हैं। आप प्रपंचशून्य, निराकार, निर्विकार और निराश्रय हैं। आप स्थूल हैं, सूक्ष्म हैं, अणु हैं और महान् हैं; साथ ही आप स्थूल, सूक्ष्म आदि सभी भेदोंसे रहित हैं। गुणोंसे अतीत होकर भी समस्त गुणोंके आधार हैं। त्रिगुणात्मन्! आपको नमस्कार है। मैं आपके नाभिकमलसे उत्पन्न हुआ हूँ। जैसे इस ब्रह्माण्डके मध्य मैं सृष्टिकर्ममें लगाया गया हूँ, वैसे आपके एक-एक रोममें ब्रह्माण्ड हैं और उन ब्रह्माण्डोंमें मुझ-जैसे करोड़ों ब्रह्मा हैं। आपकी महिमा अचिन्त्य है, आपको नमस्कार है। आपका स्वरूप चिन्मय है, आपको बार-बार नमस्कार है। आप देवताओंके अधिदेवता हैं, आपको नमस्कार है। देवदेव! आपको नमस्कार है। दिव्य और अदिव्य स्वरूपवाले आपको नमस्कार है। दिव्य रूपमें प्रकट होनेवाले आपको नमस्कार है। आप जरा और मृत्युसे रहित तथा मृत्युरूप हैं, आपको नमस्कार है। आप मृत्युकी भी मृत्यु हैं, शरणागतोंकी मृत्युका नाश करनेवाले हैं, सहज आनन्द आपका स्वरूप है, भक्ति आपको प्रिय है, आप जगत्‌के माता और पिता हैं, आपको बार-बार नमस्कार है। शरणागतोंकी पीड़ाका नाश करनेके लिये सदा उद्योग करनेवाले प्रभो! आपको नमस्कार है। आप दीनोंके प्रति करुणाके स्वाभाविक समुद्र हैं, आपको बार-बार नमस्कार है। आप पर हैं, पररूप हैं तथा परपार (भवसागरके दूसरे पार) हैं, आपको नमस्कार है। जिसको कहीं पार नहीं मिलता उसके पारस्वरूप आप ही हैं, आप ही ब्रह्मरूप हैं, आपको नमस्कार हैं, आप परमार्थस्वरूप तथा परहेतु (उत्कृष्ट कारण) हैं। आपको नमस्कार है। परम्परासे व्याप्त परमतत्त्वमें तत्पर रहनेवाले आपको नमस्कार है। प्रणतजनोंके दुःखका संहार करनेवाले आपको नमस्कार है। नाथ! यदि आप प्रसन्न हों, तो मेरे लिये कौन-सी वस्तु दुर्लभ है? अज्ञानरूपी अन्धकारसे आच्छन्न हुए इस विश्वरूपी कारागारके भीतर मुक्तिकी इच्छासे भटकनेवाला मनुष्य, आपके सिवा और कोई द्वार नहीं पाता। आप सम्पूर्ण विश्वके लिये एकमात्र वन्दनीय हैं, आपको नमस्कार है। देवता और दानव सभी आपके चरणारविन्दोंकी अर्चना करते हैं, आपको नमस्कार है। आप सन्ताप हरनेके लिये एकमात्र चन्द्रमा हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप कल्याणमय ज्ञानघनस्वरूप हैं, आपको बार-बार नमस्कार है। आप कल्पना करनेवालोंसे सदा ही दूर रहते हैं, आपको नमस्कार है। आप दुर्लभ कामनाओंको देनेवाले कल्पवृक्षरूप हैं, आपको