संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
नमस्कार है। दीनों, असहायों और शरणागतोंकी दुःखराशिका संहार करनेके लिये एकमात्र आप ही सदा कमर कसे रहते हैं, आपको नमस्कार है। जगन्नाथ! दुःखके समुद्रमें डूबे हुए प्राणियोंपर आप प्रसन्न होइये। करुणाकर! आप लीलापूर्वक कृपाकटाक्ष करके उन सबका उद्धार कीजिये।'
इस प्रकार वेदार्थोंद्वारा श्रीजगन्नाथकी स्तुति करके ब्रह्माजी धरणीधर शेषके अवतारभूत बलभद्रजीका दर्शन करनेके लिये गये और अतिशय भक्तिपूर्वक प्रणाम करके उन्होंने उनका भी स्तवन किया—'देवेश! आकाश आपका मस्तक है और जल आपका शरीर है। पृथ्वी चरण है, अग्नि मुख है और वायुदेवता श्वास हैं। मन चन्द्रमा, नेत्र सूर्य और भुजा सम्पूर्ण दिशाएँ हैं। नाथ! ज्ञानदर्पण! आपको नमस्कार है। चौदहों भुवनोंके मूल स्तम्भरूप आप हलधरको नमस्कार है। जो आपके चरणारविन्दोंकी शरण लेते हैं, उनकी पापराशिको आप विदीर्ण कर डालते हैं; आपको नमस्कार है। आपके मुख, नेत्र, कान, चरण और भुजाएँ अनन्त हैं। अनादि, महामूल, अज्ञानान्धकार-राशिका विनाश करनेके लिये सूर्यस्वरूप आप बलभद्रजीको नमस्कार है। वेदत्रयी आपका स्वरूप है। तीन प्रकारके दोषोंका नाश करनेके लिये त्रिविध अवतार धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। भगवन्! ये नारायणदेव जो वेदान्तोंमें गाये जाते हैं, आपसे भिन्न नहीं हैं। आप शय्या हैं और वे शयन करनेवाले हैं। वे आच्छादनीय हैं और आप उनका आच्छादन करनेवाले हैं। जो कृष्ण हैं, वे बलराम हैं; जो बलराम हैं, वे ही कृष्ण हैं। आप दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है। जगन्मय! आप प्रसन्न होइये।'
इस प्रकार परमेश्वर बलभद्रजीको प्रणाम करके ब्रह्माजी जगदीश्वरी सुभद्राका दर्शन करनेके लिये उनके रथके समीप गये और इस प्रकार बोले—'जगदम्ब! देवि! तुम्हारी जय हो। परमेश्वरि! तुम्हीं सर्वशक्ति हो, तुम्हें नमस्कार है। कैवल्य मोक्ष प्रदान करनेवाली सुभद्रा देवी! मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ। कल्याणमयी सुभद्रे! तुम्हारी जय हो।'
इस प्रकार ब्रह्माजीने कल्याणमयी सुभद्राकी स्तुति करके उन्हींके समीप रथपर विराजमान भगवान् विष्णुके चौथे स्वरूप चक्र सुदर्शनको भी प्रणाम किया। तत्पश्चात् बड़ी भक्तिसे उसकी इस प्रकार स्तुति की—'हे सुदर्शन! आप महाज्वालामय हैं। आपकी प्रभा करोड़ों सूर्योंके समान है। जो अज्ञानरूपी अन्धकारसे अन्धे हो रहे हैं, उन्हें वैकुण्ठका मार्ग दिखानेवाले आप ही हैं। आप नित्य शोभाशाली तथा वैष्णवोंके अपने धाम हैं। आप भगवान् विष्णुके ही एक स्वरूप हैं। मैं आपको प्रणाम करता हूँ।'
इस प्रकार प्रणाम और स्तुति करके ब्रह्माजी देवताओंके साथ मन्दिरके समीप गये और वहाँ उन्होंने अपने मनको अनुकूल प्रतीत होनेवाली परम सुन्दर शाला देखी। तदनन्तर वे राजाके दिये हुए दिव्य सिंहासनपर आसीन हुए। ब्रह्माजीकी आज्ञासे राजा इन्द्रद्युम्नने शान्तिकर्म करनेके लिये महामुनि भरद्वाजका वरण किया। प्रतिष्ठाकर्ममें भेंट-पूजा चढ़ानेके लिये जो-जो देवता अभीष्ट माने गये हैं तथा होमकर्ममें जिन-जिन देवताओंके लिये आहुति देनेका विधान है, वे सभी ध्यान करनेपर ब्रह्माजीकी आज्ञासे चारों दिशाओंमें आकर स्वयं उपस्थित हो गये। फिर गन्ध, पुष्प, माला, अलंकार और आभूषण आदिके द्वारा उनकी भलीभाँति पूजा की गयी। तत्पश्चात् बुद्धिमान् भरद्वाजजीने देवाधिदेव ब्रह्मा तथा सब देवताओंके समक्ष कर्म आरम्भ किया। राजा इन्द्रद्युम्नने बड़ी प्रसन्नताके साथ सबका पूजन किया। भगवान्के विग्रहस्वरूप उस मनोहर मन्दिरकी, जिसमें अत्यन्त महान् ध्वज फहरा रहा था, प्रतिष्ठा करके भरद्वाजजीने भगवद्विग्रहोंमें प्राणप्रतिष्ठाके लिये ब्रह्माजीसे अनुरोध किया। तब ब्रह्माजी