संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३६४
- संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
नमस्कार है। दीनों, असहायों और शरणागतोंकी दुःखराशिका संहार करनेके लिये एकमात्र आप ही सदा कमर कसे रहते हैं, आपको नमस्कार है। जगन्नाथ! दुःखके समुद्रमें डूबे हुए प्राणियोंपर आप प्रसन्न होइये। करुणाकर! आप लीलापूर्वक कृपाकटाक्ष करके उन सबका उद्धार कीजिये।'
इस प्रकार वेदार्थोंद्वारा श्रीजगन्नाथकी स्तुति करके ब्रह्माजी धरणीधर शेषके अवतारभूत बलभद्रजीका दर्शन करनेके लिये गये और अतिशय भक्तिपूर्वक प्रणाम करके उन्होंने उनका भी स्तवन किया—'देवेश! आकाश आपका मस्तक है और जल आपका शरीर है। पृथ्वी चरण है, अग्नि मुख है और वायुदेवता श्वास हैं। मन चन्द्रमा, नेत्र सूर्य और भुजा सम्पूर्ण दिशाएँ हैं। नाथ! ज्ञानदर्पण! आपको नमस्कार है। चौदहों भुवनोंके मूल स्तम्भरूप आप हलधरको नमस्कार है। जो आपके चरणारविन्दोंकी शरण लेते हैं, उनकी पापराशिको आप विदीर्ण कर डालते हैं; आपको नमस्कार है। आपके मुख, नेत्र, कान, चरण और भुजाएँ अनन्त हैं। अनादि, महामूल, अज्ञानान्धकार-राशिका विनाश करनेके लिये सूर्यस्वरूप आप बलभद्रजीको नमस्कार है। वेदत्रयी आपका स्वरूप है। तीन प्रकारके दोषोंका नाश करनेके लिये त्रिविध अवतार धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। भगवन्! ये नारायणदेव जो वेदान्तोंमें गाये जाते हैं, आपसे भिन्न नहीं हैं। आप शय्या हैं और वे शयन करनेवाले हैं। वे आच्छादनीय हैं और आप उनका आच्छादन करनेवाले हैं। जो कृष्ण हैं, वे बलराम हैं; जो बलराम हैं, वे ही कृष्ण हैं। आप दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है। जगन्मय! आप प्रसन्न होइये।'
इस प्रकार परमेश्वर बलभद्रजीको प्रणाम करके ब्रह्माजी जगदीश्वरी सुभद्राका दर्शन करनेके लिये उनके रथके समीप गये और इस प्रकार बोले—'जगदम्ब! देवि! तुम्हारी जय हो। परमेश्वरि! तुम्हीं सर्वशक्ति हो, तुम्हें नमस्कार है। कैवल्य मोक्ष प्रदान करनेवाली सुभद्रा देवी! मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ। कल्याणमयी सुभद्रे! तुम्हारी जय हो।'
इस प्रकार ब्रह्माजीने कल्याणमयी सुभद्राकी स्तुति करके उन्हींके समीप रथपर विराजमान भगवान् विष्णुके चौथे स्वरूप चक्र सुदर्शनको भी प्रणाम किया। तत्पश्चात् बड़ी भक्तिसे उसकी इस प्रकार स्तुति की—'हे सुदर्शन! आप महाज्वालामय हैं। आपकी प्रभा करोड़ों सूर्योंके समान है। जो अज्ञानरूपी अन्धकारसे अन्धे हो रहे हैं, उन्हें वैकुण्ठका मार्ग दिखानेवाले आप ही हैं। आप नित्य शोभाशाली तथा वैष्णवोंके अपने धाम हैं। आप भगवान् विष्णुके ही एक स्वरूप हैं। मैं आपको प्रणाम करता हूँ।'
इस प्रकार प्रणाम और स्तुति करके ब्रह्माजी देवताओंके साथ मन्दिरके समीप गये और वहाँ उन्होंने अपने मनको अनुकूल प्रतीत होनेवाली परम सुन्दर शाला देखी। तदनन्तर वे राजाके दिये हुए दिव्य सिंहासनपर आसीन हुए। ब्रह्माजीकी आज्ञासे राजा इन्द्रद्युम्नने शान्तिकर्म करनेके लिये महामुनि भरद्वाजका वरण किया। प्रतिष्ठाकर्ममें भेंट-पूजा चढ़ानेके लिये जो-जो देवता अभीष्ट माने गये हैं तथा होमकर्ममें जिन-जिन देवताओंके लिये आहुति देनेका विधान है, वे सभी ध्यान करनेपर ब्रह्माजीकी आज्ञासे चारों दिशाओंमें आकर स्वयं उपस्थित हो गये। फिर गन्ध, पुष्प, माला, अलंकार और आभूषण आदिके द्वारा उनकी भलीभाँति पूजा की गयी। तत्पश्चात् बुद्धिमान् भरद्वाजजीने देवाधिदेव ब्रह्मा तथा सब देवताओंके समक्ष कर्म आरम्भ किया। राजा इन्द्रद्युम्नने बड़ी प्रसन्नताके साथ सबका पूजन किया। भगवान्के विग्रहस्वरूप उस मनोहर मन्दिरकी, जिसमें अत्यन्त महान् ध्वज फहरा रहा था, प्रतिष्ठा करके भरद्वाजजीने भगवद्विग्रहोंमें प्राणप्रतिष्ठाके लिये ब्रह्माजीसे अनुरोध किया। तब ब्रह्माजी
- वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३६५
उठे। उन्होंने नारद आदि ऋषियों तथा विद्वान् ब्राह्मणोंके साथ स्वयं स्वस्तिवाचन किया। ब्राह्मणलोग वैदिक सूक्तोंका पाठ करने लगे। भाँति-भाँतिके मंगल वाद्य बजने लगे। उस समय सबने रथके समीप जाकर सीढ़ियोंके मार्गसे सावधानीके साथ भगवद्विग्रहोंको उतारा। दोनों बगलमें, भुजाओंमें, मस्तकपर तथा दोनों चरणोंमें हाथ लगाकर लोग धीरे-धीरे भगवान् नारायणको रूईदार गद्देपर विश्राम कराते हुए मन्दिरके समीप ले गये। ऊपर-ऊपरसे पारिजात पुष्पोंकी वर्षा होने लगी। ब्रह्माजी इस प्रकार स्तुति करने लगे—'जगन्नाथ श्रीकृष्ण! आपकी जय हो। सब पापोंका नाश करनेवाले प्रभो! आपकी जय हो। लीलासे काष्ठ-विग्रह धारण करनेवाले नारायण! आपकी जय हो। सबको मनोवांछित फल देनेवाले माधव! आपकी जय हो। संसार-सागरमें डूबे हुए जीवोंका लीलापूर्वक उद्धार करनेवाले अविनाशी परमेश्वर! आपकी जय हो, जय हो। करुणासागर! आपकी जय हो। दीनोद्धार-परायण! आपकी जय हो। अच्युत! अनन्त! ईशान! आपकी जय हो, जय हो, जय हो। प्रभो! आपको नमस्कार है।' यह स्तुति होते समय नारदजी बड़ी प्रसन्नताके साथ वीणा बजाते थे। भगवान्के मस्तकपर पीछेकी ओरसे दो रत्नमय छत्र लगाये गये। दोनों पार्श्वभागमें चामरग्राही देवता पंक्तिबद्ध खड़े थे, जो धीरे-धीरे चँवर डुला रहे थे। इसी प्रकार सब लोग बड़े कौतूहलके साथ बलभद्र, सुभद्रा तथा सुदर्शन चक्रके विग्रहोंको भी ले गये। मन्दिरके मुख्यद्वारपर रत्नमय स्तम्भोंसे सुशोभित मण्डप तैयार किया गया था। उसमें अभिषेकके लिये भगवान्को पधराया गया। उन सब विग्रहोंके सामने दर्पण रख दिये गये। फिर रत्नोंके कलशोंमें रखे हुए तीर्थोंके जलसे क्रमशः पुरुषसूक्त और श्रीसूक्त पाठ करते हुए स्वयं ब्रह्माजीने लोकशिक्षाके लिये अभिषेक किया। तत्पश्चात् अलंकार धारण कराकर भगवद्विग्रहोंको गन्ध और माला आदिसे सुशोभित करके ब्रह्माजीने स्वयं ही आरती उतारी और मन्त्र पढ़ते हुए उन सब विग्रहोंको रत्नमय सिंहासनोंपर स्थापित किया।
ब्रह्माजी बोले—सम्पूर्ण जगत्के आधार तथा समस्त लोकोंमें प्रतिष्ठित सर्वव्यापी जनार्दन! आप इस मन्दिरमें सुस्थिर भावसे विराजमान होइये। यह प्रतिष्ठा सुप्रतिष्ठा हो। नाथ! आपके प्रतिष्ठित होनेपर हम सब यहाँ प्रतिष्ठित होंगे। आपकी आज्ञा और आपके प्रसादसे यह प्रतिष्ठा परिपूर्ण हो।
इस प्रकार जगन्नाथकी स्थापना करके ब्रह्माजीने उनके हृदय-कमलका स्पर्श करते हुए आनुष्टुभ मन्त्रराज*का एक सहस्र जप किया। वैशाखमासके शुक्ल पक्षमें अष्टमी तिथिको पुष्य नक्षत्रके योगमें उत्तम बृहस्पतिके दिन भगवान् जगन्नाथकी प्रतिष्ठा की गयी। इसलिये वह दिन परम पवित्र एवं सब पापोंका नाश करनेवाला है। उसमें किया हुआ स्नान, दान, तप, होम आदि सब पुण्यकार्य अक्षय होता है। जो मनुष्य उस दिन भक्तिभावसे भगवान् श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्राजीका दर्शन करते हैं, वे निःसन्देह मोक्षके भागी होते हैं। वैशाखमासमें जो शुक्ल पक्षकी अष्टमी आती है, उसमें यदि बृहस्पतिवार और पुष्य नक्षत्रका योग हो तो उस दिन किया हुआ जगन्नाथजीका पूजन कोटि जन्मोंके पापोंका नाश करनेवाला होता है।
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* मन्त्रराज आनुष्टुभ इस प्रकार है—
उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम् ॥
३६६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
ब्रह्माजीके द्वारा भगवत्स्वरूपकी एकताका प्रतिपादन तथा भगवान्का राजा इन्द्रद्युम्नको अपनी सेवाका आदेश देना
जैमिनिजी कहते हैं—तदनन्तर राजा इन्द्रद्युम्नने मन-ही-मन आश्चर्यसे चकित होकर ब्रह्माजीसे पूछा—'भगवन् ! यज्ञके अन्तमें भगवान् विष्णुने वैसे ही काष्ठनिर्मित स्वरूप धारण किये थे, जो रथपर विराजमान थे। आपने मन्दिरके भीतर भी उन्हीं विग्रहोंके रूपमें भगवान्की प्रतिष्ठा की है। पहले आकाशवाणीने भी मुझसे यही कहा था कि इस अपौरुषेय वृक्षसे भगवान् चार स्वरूपोंमें अभिव्यक्त होंगे। परंतु इस समय ये एक सच्चिदानन्दघन ब्रह्मरूपमें प्रतिष्ठित दिखायी देते हैं। प्रभो ! यदि आप मुझे इस रहस्यको सुननेका अधिकारी समझते हैं तो ठीक-ठीक बताइये।'
ब्रह्माजीने कहा—राजन् ! यह काष्ठकी मूर्ति है, ऐसा सोचकर तुम्हारे मनमें इसके प्रति साधारण प्रतिमा-बुद्धि न हो। वास्तवमें यह परब्रह्मका स्वरूप है। जो विदारण करे या दान दे उसको दारु कहते हैं। परब्रह्म परमात्मा स्वभावसे ही सब दुःखोंका विदारण और अखण्ड आनन्दका दान करते हैं। इसलिये उनका नाम दारु है। इस प्रकार चारों वेदोंके अनुसार भगवान् श्रीहरि दारुमय हैं। वे जगत्के स्रष्टा हैं। इसलिये उन्होंने अपनेको भी दारुमय स्वरूपमें प्रकट कर लिया। शब्दब्रह्म और परब्रह्ममें कोई भेद नहीं है। प्रलयके समय दोनों एक हैं। केवल सृष्टिकालमें व्यावहारिक भेद रहता है। शब्द और अर्थ दोनों एक-दूसरेकी अपेक्षा रखनेवाले हैं। अर्थके अभावमें शब्द नहीं और शब्दके अभावमें अर्थबोध नहीं होता। इसलिये चारों वेद जैसे शब्द हैं, वैसे ही अर्थ भी हैं। भगवान् हलधर ऋग्वेद-स्वरूप हैं। नृसिंहजी सामवेदरूप हैं। सुभद्रादेवी यजुर्वेदकी मूर्ति हैं और यह सुदर्शन चक्र अथर्ववेदका स्वरूप माना गया है। वेद चार हैं—यह भेद दृष्टि है। अभेद दृष्टिसे सम्पूर्ण वेद एक ही राशि हैं। अतः तुम्हारे मनमें सन्देह नहीं होना चाहिये। एक ही सर्वव्यापी भगवान् अनेक रूपोंमें व्यक्त होते हैं। अन्य अवतारोंमें भी वे इसी न्यायसे बर्ताव करते हैं। राजन् ! इस प्रकार मैंने तुमसे भगवान् जगन्नाथके भेद और अभेद—दोनों ही बताये हैं। जिससे तुम्हारे मनको सन्तोष हो, उसी दृष्टिसे भक्तिपूर्वक भगवान्की आराधना करो। भगवान् सर्वरूपमय हैं तथा सर्वमन्त्रमय हैं। जो जिस प्रकार उनकी आराधना करता है, उसे वे उसी प्रकार फल देते हैं। इसी महिमासे भगवान् विष्णु यहाँ प्रकट हुए हैं। जिसका जितना विश्वास है, उसे उतनी सिद्धि प्राप्त होती है। तुम शुद्ध चित्तसे मन, वाणी और क्रियाद्वारा यहाँ दारु-विग्रह (काष्ठमय स्वरूप) धारण करनेवाले भगवान् गोविन्दकी आराधना करो और इस मन्त्रराजके द्वारा श्रीहरिकी पूजा किया करो। इस मन्त्रसे बढ़कर दूसरा कोई मन्त्र न हुआ है, न होगा। इससे पूजित होनेपर भगवान् विष्णु तत्काल प्रसन्न होते हैं तथा भक्तवत्सल भगवान् अपना परम धाम देते हैं। राजन् ! मैं तुमसे एक तत्त्वकी बात कहता हूँ, ध्यान देकर सुनो। समुद्रके तटपर वटवृक्षके मूलके समीप नीलाचल पर्वतके शिखरपर निवास करनेवाले जो काष्ठमयी मूर्तिके व्याजसे साक्षात् अमृतमय परब्रह्म हैं, उनका दर्शन करके मनुष्य निश्चय ही मोक्षको प्राप्त होता है।
ब्रह्माजीने लोकशिक्षाके लिये राजासे यह सब कहकर पहले प्रकाशमें आये हुए भगवान् विष्णुके
- वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३६७
चतुर्विध स्वरूपको प्रकट किया। रथसे उतारते समय जो चार मूर्तियाँ देखी गयी थीं, अब वे ही सिंहासनके ऊपर विराजमान हो गयीं, यह सब लोगोंने प्रत्यक्ष देखा। तत्पश्चात् ब्रह्माजीने द्वादशाक्षर मन्त्रसे बलभद्रजीकी, पुरुषसूक्तसे भगवान् नारायणकी, देवीसूक्तसे सुभद्राजीकी तथा द्वादशाक्षर (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) मन्त्रसे सुदर्शन चक्रकी पूजा की। उसके बाद राजापर अनुग्रह करनेके लिये उन्होंने भगवान्से इस प्रकार निवेदन किया।
ब्रह्माजी बोले—भगवन्! भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले देवदेवेश्वर! इन्द्रद्युम्न दीर्घकालसे आपकी भक्ति करते आ रहे हैं और अब इन्हें आपका दर्शन हुआ। भगवन्! यद्यपि आपका दर्शन सायुज्य मुक्तिका कारण है तो भी ये भक्तियोगके द्वारा आपकी पूजा करनेकी ही अभिलाषा रखते हैं। इसलिये इन्हें आज्ञा दीजिये, जिससे ये भक्तियोगके द्वारा देशकालोचित व्रत आदि तथा भाँति-भाँतिके उपचारोंसे आपकी पूजा करते रहें।
ब्रह्माजीके द्वारा इस प्रकार निवेदन करनेपर काष्ठमय शरीर धारण किये होनेपर भी भगवान्ने मुसकराते हुए गम्भीर वाणीमें कहा, 'इन्द्रद्युम्न! मैं तुम्हारी भक्ति तथा निष्काम कर्मोंसे बहुत प्रसन्न हूँ। मुझमें तुम्हारी स्थिर भक्ति हो। करोड़ोंका धन लगाकर जो तुमने मेरा मन्दिर बनवाया है, इसके भंग हो जानेपर भी मैं इस स्थानका परित्याग नहीं करूँगा। कालान्तरमें भी जो कोई दूसरा पुरुष यहाँ मन्दिर बनवायेगा, तुम्हारे प्रेमसे उसमें भी मेरी स्थिति रहेगी। मन्दिर भंग होनेपर भी मैं इस स्थानका कभी त्याग नहीं करूँगा। जबतक ब्रह्माजीका दूसरा परार्ध पूरा होगा तबतक इस काष्ठमय विग्रहसे ही मैं यहाँ निवास करूँगा। सत्ययुगके प्रथम ज्येष्ठमें यज्ञका प्रारम्भ हुआ और ज्येष्ठकी अमावस्याको* मैंने अवतार लिया है। वही मेरा पवित्र जन्मदिन है। उस दिन महास्नानकी विधिसे प्रत्यर्चामें अधिवासपूर्वक मुझे स्नान कराना चाहिये। ऐसा करनेसे मैं कोटि जन्मोंमें उपार्जित पापराशिका विनाश कर डालूँगा। उस दिन मेरा दर्शन करनेवालोंको सम्पूर्ण तीर्थों, यज्ञों और दानोंका फल प्राप्त होगा। वटवृक्षके उत्तर एक सर्वतीर्थमय कूप है, उसे खोदकर प्रकाशमें लाओ। ज्येष्ठकी अमावस्याको प्रातःकाल मुझको, बलभद्रजीको और सुभद्राको उस कूपके जलसे स्नान कराकर मनुष्य मेरे लोकको प्राप्त कर लेगा। आषाढ़ मासकी शुक्ला द्वितीया यदि पुष्य नक्षत्रसे युक्त हो तो वह इस तीर्थमें मोक्षदायिनी मानी गयी है। नक्षत्रके अभावमें भी मेरी प्रसन्नताके लिये उस तिथिको यात्रा करनी चाहिये। आषाढ़ शुक्ल पक्षकी पुष्य नक्षत्रयुक्त द्वितीया तिथिको मुझको, बलभद्रजीको, सुभद्राको रथपर बिठाकर महान् उत्सवके लिये बहुत-से ब्राह्मणोंको तृप्त करके 'गुण्डिचामण्डप' नामक स्थानको ले जाना चाहिये, जहाँ पहले मैं प्रकट हुआ था। सहस्र अश्वमेध यज्ञकी महावेदी उस समय वहीं थी। उससे बढ़कर पवित्र स्थान इस पृथ्वीपर दूसरा नहीं है। जैसे ब्रह्माके अनुरोधसे और तुम्हारे बनवाये हुए इस महामन्दिरसे इस समय यह नीलाचलका शिखर मेरी अत्यन्त प्रसन्नताका कारण हो रहा है, उसी प्रकार नृसिंह क्षेत्रमें तुम्हारे यज्ञकी वह महावेदी तथा मेरी उत्पत्तिका वह मण्डप मुझे अत्यन्त प्रसन्नता देनेवाला है। मैं बहुत समयतक वहाँ स्थित रहा हूँ, इसलिये उसपर मेरा बहुत प्रेम है। मैं यहाँ तुम्हारी भक्तिसे सदैव स्थित रहूँगा। मेरे उत्थान (हरिबोधिनी एकादशी), मेरे शयन (हरिशयनी एकादशी), मेरे करवट बदलने
* यह तिथि गुजरातके हिसाबसे है। अन्य कई प्रान्तोंकी गणनासे यह आषाढ़ कृष्णा अमावस्या होती है। शुक्ल पक्षमें सब प्रान्तोंकी गणना समान है।
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(भाद्रपद शुक्ला एकादशी), मेरे मार्ग प्रावरण तथा पुष्य स्नानका महोत्सव करें। फाल्गुनकी पूर्णिमाको मेरे लिये दोलोत्सव करना चाहिये। | जो दोलामें दक्षिणाभिमुख पूजित हुए मेरा दर्शन करते हैं, वे ब्रह्महत्या आदि सब पापोंसे मुक्त हो जाते हैं।'
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समुद्रमें स्नानकी विधि और भगवद् विग्रहोंका वर्णन
मुनियोंने पूछा—महर्षे! इन्द्रद्युम्नने भगवान् लक्ष्मीपतिके जन्मस्नानका उत्सव किस विधिसे किया? इसके अतिरिक्त भगवान्के अन्य सब उत्सवोंका भी विधिपूर्वक वर्णन कीजिये।
जैमिनिजी बोले—मुनिवरो! इस समय मैं ज्येष्ठस्नानका वर्णन करता हूँ। ज्येष्ठ शुक्ला दशमीको व्रतसंकल्प करके मौन रहे। प्रातःकाल उठकर ‘मार्कण्डेयावट’ नामक तीर्थको जाय और आचमन करके दोनों हाथ जोड़कर मार्कण्डेयेश्वरको प्रणाम करके भगवान् भैरवसे भी आज्ञा ले। फिर तीर्थमें प्रवेश करके वरुणदेवता सम्बन्धी पाँच वैदिक मन्त्रोंसे, तीन आवृत्ति करके अघमर्षण सूक्तसे तथा निम्नांकित मन्त्रसे स्नान करे—
संसारसागरे मग्नं पापग्रस्तमचेतनम्।
त्राहि मां भगनेत्रघ्न त्रिपुरारे नमोऽस्तु ते॥
‘भगनेत्रविनाशक भगवान् त्रिपुरारि! आपको नमस्कार है। मैं पापग्रस्त मूढ़ मानव संसार-सागरमें डूबा हुआ हूँ, मेरी रक्षा कीजिये।’
इस प्रकार स्नान करके बाहर निकले और भगवान् शंकरका दर्शन करके मौनभावसे भगवान् नारायणके समीप जाय। मार्कण्डेयेश्वरसे दक्षिण दिशामें जो विष्णुस्वरूप उत्तम वटवृक्ष स्थित है, वह दर्शनमात्रसे पाप-राशिका नाश करनेवाला है। उसका दर्शन करके उसमें भगवान् पुरुषोत्तमकी भावना करते हुए दूरसे ही प्रणाम करे। फिर निम्नांकित मन्त्रका उच्चारण करते हुए उसकी परिक्रमा करे—
अमरस्त्वं सदा कल्प विष्णोरायतनं महत्।
न्यग्रोध हर मे पापं विष्णुरूप नमोऽस्तु ते॥
नमोऽस्त्वव्यक्तरूपाय महाप्रलयस्थायिने।
एकाश्रयाय जगतां कल्पवृक्षाय ते नमः॥
‘हे कल्पवट! आप सदाके लिये अमर हैं। भगवान् विष्णुके महान् निवासस्थान हैं। हे विष्णुरूप वट! मेरे पापको हर लीजिये, आपको नमस्कार है। आप अव्यक्तस्वरूप, महाप्रलय कालमें भी स्थिर रहनेवाले, जगत्के एकमात्र आश्रय तथा कल्पवृक्ष हैं। आपको नमस्कार है।’
इस प्रकार स्तुति करके मनुष्य उस वृक्षके नीचे भक्तिपूर्वक भगवान् विष्णुके नामोंका जप करे। इससे वह सौ करोड़ जन्मोंके पापोंसे भी मुक्त हो जाता है। उसकी छायामें चलनेमात्रसे भी मनुष्यके पाप दूर हो जाते हैं। तत्पश्चात् भगवान्के वाहनरूप गरुड़जीको, जो भगवान् श्रीहरिके आगे भक्तिसे नतमस्तक होकर हाथ जोड़े खड़े हैं, प्रणाम करे। उसके बाद—
छन्दोमय जगद्धामन् यानरूप त्रिवृद्वपुः।
यज्ञरूप जगद्व्यापिन् प्रीयमाणाय ते नमः॥
‘हे गरुड़! आप छन्दोमय, जगत्के आश्रय, भगवान्के वाहनरूप, वेदत्रयीमय शरीरवाले, यज्ञरूप और विश्वव्यापी हैं। सदा प्रसन्न रहनेवाले आपको मेरा नमस्कार है।’
इस प्रकार गरुड़की स्तुति करके भगवान्के मन्दिरमें प्रवेश करे और उसकी तीन बार परिक्रमा करके मन्त्रराज आनुष्टुभसे या पुरुषसूक्तसे अथवा द्वादशाक्षर (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) मन्त्रसे—जिसमें जिसकी रुचि हो उससे, पूजन करे। पंचोपचारकी विधिसे परमेश्वर जगन्नाथजीकी पूजा करे। पूजाके पश्चात् हाथ जोड़कर इस प्रकार
- वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * | ३६९ ---|---
स्तुति करे—'देवदेव जगन्नाथ! आप संसार-समुद्रसे तारनेवाले हैं। भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले जगदीश्वर! आपके चरणोंमें प्रणाम करता हूँ, आप सदा मेरी रक्षा करें। श्रीकृष्ण! आपकी जय हो। जगन्नाथ! आपकी जय हो। आप सबके पापोंका नाश करनेवाले हैं। आपके युगल चरणारविन्द विश्वके लिये वन्दनीय हैं। आपको नमस्कार है। कोटि-कोटि ब्रह्माण्डोंके ईश्वर! आपकी जय हो। वेद आपके निःश्वास वायु हैं, समस्त जगत्के आधारभूत परमात्मन्! आपको नमस्कार है। प्रभो! आप शरणमें आये हुए ब्रह्मा, इन्द्र तथा रुद्र आदि देवताओं और प्रणतजनोंकी पीड़ाको दूर करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। समस्त संसारके निवासस्थान आपकी जय हो। अन्तर्यामिन्! आपको नमस्कार है। अकारण करुणासागर! दीनदयालु! आपकी जय हो। दीनों और अनाथोंको एकमात्र शरण देनेवाले विश्वसाक्षी परमेश्वर! आपको नमस्कार है। देवेश्वर! जिसमें मोहरूपी भँवर उठते हैं, जो अत्यन्त दुस्तर है, क्षुधा-पिपासा आदि छहों ऊर्मियोंके कारण जिसके दूसरे किनारेतक पहुँचना अत्यन्त कठिन है, कुकर्मरूपी ग्राहोंके कारण जो अत्यन्त भयानक दिखायी देता है, जहाँ कोई आश्रय अथवा अवलम्ब नहीं दिखायी देता, जो सर्वथा निस्सार और दुःखरूपी फेनसे युक्त है, उस संसारसमुद्रके जलमें मैं आपकी मायाके गुणोंसे आबद्ध होकर विवश अवस्थामें पड़ा हूँ। आप अपनी कृपाकटाक्षपूर्ण दृष्टिसे देखकर वहाँसे मेरा उद्धार कीजिये। सुरश्रेष्ठ! आप अपनी परम प्रसन्नताके प्रकाशक हैं। जगन्नाथ! संसारभयसे डरनेवाले जीवोंके सहायक बन्धु एकमात्र आप ही हैं। भूख और प्यास प्राणके, शोक और मोह मनके तथा जरा और मृत्यु शरीरके कष्ट हैं। ये ही संसार-सागरकी छः ऊर्मियाँ हैं। इनसे रक्षा कीजिये। भगवन्! आपकी सृष्टिमें आपके समान दीनोंका पालन करनेवाला दूसरा कोई नहीं है, अतः सब लोगोंपर कृपा करनेके लिये आप स्वयं अवतीर्ण हुए हैं। अन्यथा आप पूर्णकाम परमेश्वरके इस पृथ्वीपर आनेका और क्या कारण हो सकता है? जगत्पते! आपके चरणकमलोंकी शरणमें आ जानेसे कोई चिन्ता नहीं रह जाती, क्योंकि आपके चरणारविन्द चारों पुरुषार्थोंके एकमात्र साधक हैं—दर्शनमात्रसे सबके समस्त मनोवांछित फल देनेवाले हैं।'
तदनन्तर शेषसम्बन्धी मन्त्रसे भगवान् बलभद्रजीकी पूजा करे। द्वादशाक्षर मन्त्रसे अथवा आदिमें प्रणव लगाकर नाम मन्त्रसे भी पूजा कर सकते हैं। फिर एकाग्रचित्त होकर प्रणाम करके स्तुतिपाठके द्वारा उन्हें प्रसन्न करे—'सदा सत्पुरुषोंको सुख देनेवाले सच्चिदानन्दस्वरूप बलरामजी! आपकी जय हो। आपकी निर्मल आकृति अविद्यामय पंकसे रहित है, आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण जगत्का भार धारण करके भी कभी थकित न होनेवाले बलभद्र! आपकी जय हो। आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक—तीनों तापोंका विकर्षण (विनाश) करनेके लिये आप सदा अपने हाथमें हल लिये रहते हैं। शरणागतों और दीनोंकी रक्षाके लिये आपके नेत्र सदा खुले रहते हैं। ईश्वर! आप ही दूसरोंके समस्त पापोंका नाश करनेमें समर्थ हैं। निर्मल करुणासागर! दीनबन्धु! आपको नमस्कार है। आपने अपने फणके अग्रभागसे समस्त चराचरसहित इस पृथ्वीको धारण कर रखा है। प्रभो! जिसके पार जाना कठिन है, उस अपार भवसागरसे मेरा उद्धार कीजिये। आप पर और अपर—सबसे श्रेष्ठ हैं। परमेश्वर! आपको नमस्कार है।'
मुसलधारी नागराज बलभद्रकी इस प्रकार स्तुति करके जगत्की आदिकारणरूपा कल्याणमय नेत्रोंवाली सुभद्रा देवीकी पूजा करे। फिर चरणोंमें प्रणाम करके उन विजयस्वरूपा भगवतीको स्तुतिद्वारा इस प्रकार प्रसन्न करे—'देवि! सुभद्रे! आपकी जय हो। संसारसे पार उतारनेवाली
३७० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
महादेवी! आप प्रसन्न होइये। शरणागतोंको सुख देनेवाली तथा सबको सन्तुष्ट करनेवाली देवि! आपकी जय हो। परमात्माके सृष्टि, पालन और संहार आदि कर्मोंकी सिद्धि करनेवाली उनकी अनुपम शक्ति एकमात्र आप ही हैं। आप ही सब लोकोंकी जननी, भगवान् विष्णुकी माया, तपस्विनी तथा भद्ररूपा सुभद्रा हैं। आपको नमस्कार करता हूँ। जगत्की मूलभूता सुभद्रा देवीको मैं प्रणाम करता हूँ।'
इसके बाद समुद्रस्नानके लिये भगवान् पुरुषोत्तमकी प्रार्थना करे—'विश्वव्यापी! चराचरस्वरूप भगवान् विष्णु! आपको नमस्कार है। प्रभो! मेरा समुद्रस्नान निर्विघ्न पूर्ण हो। शंख-चक्र-गदाधारी जगदीश्वर! मुझे स्नानके लिये आज्ञा दीजिये।' तदनन्तर भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए एकाग्रचित्त एवं मौन होकर समुद्रके समीप जाय और तीर्थराजके आत्माका चिन्तन करते हुए हाथ जोड़कर इस मन्त्रका उच्चारण करे—
सुदर्शन नमस्तेऽस्तु कोटिसूर्यसमप्रभ।
अज्ञानतिमिरान्धस्य विष्णोर्मार्गं प्रदर्शय॥
'कोटि-कोटि सूर्योंके समान प्रकाशमान सुदर्शन! आपको नमस्कार है। मैं अज्ञानान्धकारसे अन्धा हो रहा हूँ, मुझे भगवान् विष्णुका मार्ग दिखाइये।'
इस प्रकार सुदर्शनकी प्रार्थना करके तीर्थराज समुद्रके जलके समीप पृथ्वीपर घुटने टेककर भक्तिभावसे प्रणाम करे और—
तीर्थराज नमस्तुभ्यं जलरूपाय विष्णवे।
जीवनाय च जन्तूनां परं निर्वाणहेतवे॥
'हे तीर्थराज! आप जलरूपी विष्णु हैं, समस्त जन्तुओंके जीवनदाता हैं और परम शान्तिके हेतु हैं। आपको नमस्कार है।'
यह मन्त्र पढ़ते हुए जलके भीतर प्रवेश करे। समुद्रके जलमें डूबकर मन्त्र-जप करनेका विधान नहीं है। समुद्रमें स्नान करके उठे और विधिपूर्वक आचमन करके प्रार्थना करे—'जगत्पते! तीर्थराज! तुम्हें नमस्कार है। पहलेके कोटिसहस्र जन्मोंमें जिस पाप-राशिका संचय किया गया है, वह सब नष्ट हो जाय।' इस प्रकार स्नान करके तटपर आ जाय और आचमन करके मौन हो दो उज्ज्वल वस्त्र धारण करे। फिर भू-देवी और लक्ष्मी-देवीके साथ शंख-चक्र-गदाधारी चतुर्भुज भगवान् नारायणका ध्यान करके उन्हें मानसिक पूजासे सन्तुष्ट करे। तत्पश्चात् बाहर आवाहन करके भी पूजा करे, जिसकी विधि इस प्रकार है—भगवान्के लिये भावनाद्वारा रत्नसिंहासन देकर यह चिन्तन करे कि भगवान् इसपर विराजमान हैं। फिर उनके दोनों चरणारविन्दोंमें पाद्य निवेदन करे। वह पाद्य श्यामाक, कमल, दूर्वा और अपराजिता लतासे युक्त हो तथा मूलमन्त्रसे उसका संस्कार किया गया हो। पाद्य अर्पण करनेके पश्चात् सोने, चाँदी, ताँबे अथवा शंखके पात्रमें जल, चन्दन, फूल, यव, दूर्वा, कुशाग्र, फल, सरसों और तिलसे विधिपूर्वक अर्घ्यका संस्कार करे। दूर्वा और कुशके अग्रसे अर्घ्य करे। जल लेकर भगवान्के मस्तकपर सींचे। फिर बचे हुए जलको उन्हींके आगे पृथ्वीपर गिरा दे। यह अर्घ्यकी विधि बतायी गयी। उसके बाद जायफल, कंकोल और लवंगसे संस्कार किये हुए जलको भगवान्के आचमनके लिये दे। पुनः अपनी शक्तिके अनुसार पाट, रेशम अथवा कपासके बने हुए दो वस्त्र अर्पण करने चाहिये। फिर यथाशक्ति हार, केयूर, मुकुट और कण्ठा आदि आभूषण भगवान्के अंगोंमें पहनावे। सूतके बने हुए यज्ञोपवीतको गन्ध एवं चन्दनसे चर्चित करके अर्पण करे। तत्पश्चात् कपूर, चन्दन, कस्तूरी और कुंकुमसे अनुलेपन करे। चमेली, कमल, चम्पा, अशोक, पुन्नाग, नागकेसर तथा अन्य सुगन्धित पुष्पोंसे बनी हुई माला अथवा माल्य
- वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३७१
और तुलसीदलकी माला पहनावे तथा कुछ छूटे फूल भी भगवान्के मस्तकपर बिखेरे। जो गलेसे लेकर पैरोंतक लंबी हो, उसका नाम माला है और जिसकी लंबाई कण्ठसे लेकर जंघातक हो, उसे माल्य कहते हैं। जो केशोंके मध्यमें पहनाया जाय, वह गर्भक कहा गया है। उसके बाद मस्तकपर पुष्पांजलि बिखेरनी चाहिये। पुष्पांजलिके पश्चात् गुग्गुल, अगुरु, खस, शक्कर, घी, मधु और चन्दनके द्वारा सुगन्धित धूप तैयार करके दे। उसके बाद गायके घीसे सुन्दर दीप जलाकर दे अथवा कर्पूरयुक्त बत्तीके साथ तिलके तेलसे दीपक जलाकर दे। तदनन्तर घीमें तैयार किया हुआ सुगन्धित अन्न, गायका दही, गायके दूधमें पकाकर शक्कर मिलाया हुआ केला, नाना प्रकारके व्यंजनोंसे युक्त पूआ और भाँति-भाँतिके फल—इन सबके सहित मनोरम सुगन्धयुक्त सरस एवं नूतन नैवेद्य तैयार करके भगवान्को समर्पित करे। धूप, दीप, नैवेद्य, स्नान, अर्घ्य, मधुपर्क, वस्त्र तथा यज्ञोपवीत—इनमेंसे प्रत्येकके अर्पण करनेपर भगवान्को आचमन करावे। अन्य कर्मोंमें आचमनके लिये केवल जल देना चाहिये। परंतु नैवेद्यके अन्तमें संस्कार किया हुआ उपचारयुक्त आचमन देना चाहिये। साथ ही करोद्वर्तनके लिये सुगन्धित चन्दन भी देना चाहिये। उसके बाद कपूर, लवंग, इलायची, जायफल और सुपारीके साथ ताम्बूल अर्पण करे। तत्पश्चात् एक सौ आठ बार मूल मन्त्रका जप करके अनन्य भावसे स्तुतिपाठ करे। फिर प्रदक्षिणा करके भगवान् पुरुषोत्तमकी प्रार्थना करे—‘समस्त तीर्थोंके प्रवर्तक देवाधिदेव जगन्नाथ! आप सर्वतीर्थमय तथा सर्वदेवमय हैं। पापकी राशिमें डूबे हुए मुझ सेवककी रक्षा कीजिये। आपको नमस्कार है।'
इस प्रकार देवेश्वर भगवान् नारायणकी पूजा करके तीर्थराज समुद्रमें स्नान करनेवाला मनुष्य सब तीर्थोंका फल पाता है। कोटि गोदानसे, कोटि यज्ञसे, कोटि ब्राह्मणभोजनसे तथा कोटि महादानोंसे कर्म करनेवालोंके लिये जो पुण्य बताया गया है, वह इस समुद्रस्नानपूर्वक भगवत्-पूजनसे प्राप्त हो जाता है। अन्य तीर्थोंमें किया हुआ पाप समुद्रके किनारे नष्ट होता है और समुद्रके किनारे किया हुआ पाप समुद्रमें स्नान करनेसे नष्ट होता है। ब्रह्महत्यारा, शराबी, गोघाती आदि पाँच प्रकारके महापातकी मनुष्य भी समुद्रस्नान करनेसे निःसन्देह उन पापोंका प्रायश्चित्त कर लेते हैं। जो मनुष्य अपने जन्म, जीवन और शास्त्राध्ययनको सफल बनाना चाहे वह समुद्रतटपर आकर देवताओं और पितरोंका तर्पण अवश्य करे। कृच्छ्र और चान्द्रायण आदि तप सुलभ हैं, बहुत दक्षिणावाले अग्निष्टोम आदि यज्ञ भी सुलभ हैं, परंतु सिन्धुके जलसे पितरोंका तर्पण अत्यन्त दुर्लभ है। स्नानके आदि और अन्तमें जगन्नाथजीका पूजन और बीचमें तीर्थराजके जलमें स्नान करके मनुष्य मोक्षका भागी होता है। तदनन्तर शुद्ध चित्तवाला मनुष्य श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्राको नमस्कार करके उनके स्वरूपका चिन्तन करे।
इन्द्रद्युम्न-सरोवरमें स्नान, नृसिंहजीका दर्शन-पूजन तथा भगवद्विग्रहोंके ज्येष्ठ-स्नानका वर्णन
जैमिनिजी कहते हैं— इसके बाद अपनेको कृतार्थ मानता हुआ मनुष्य अश्वमेध यज्ञके अंगसे उत्पन्न हुए इन्द्रद्युम्न-सरोवरके समीप जाय। उसीके तटपर नृसिंहका स्वरूप धारण करनेवाले भगवान् श्रीहरि निवास करते हैं। वहाँ नृसिंहजीकी प्रार्थना करके विधिपूर्वक स्नान करे। प्रार्थना इस प्रकार
३७२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
है—'हे भगवान् नृसिंह! आपको नमस्कार है। आपके उत्तम क्षेत्रमें आपके ही प्रसादसे नृपश्रेष्ठ इन्द्रद्युम्नने एक सहस्र अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान किया था। प्रभो! उस यज्ञके अंगसे प्रकट हुए इस सरोवरमें स्नान करनेके लिये मुझे आज्ञा दीजिये।'
इस प्रकार भगवान्की प्रार्थना करनेके पश्चात् सरोवरके किनारे जाकर हाथ धो आचमन करके अंजलि बाँधे प्रार्थना करे—'हे तीर्थप्रवर! अश्वमेध यज्ञके अंगभूत दानके लिये लायी हुई करोड़ों गौओंके खुरसे आपकी भूमि खोदी गयी है। उन गौओंके मूत्र, फेन और दानके जलसे परिपूर्ण होनेके कारण आप सबको पवित्र करनेवाले हैं। मैं आपके सर्वतीर्थमय पवित्र जलमें स्नान करनेके लिये आया हूँ। आप स्नानसे मेरे सब पापोंको छुड़ा दीजिये।'
तत्पश्चात् स्नान करे। जलके भीतर डुबकी लगाकर तीन बार अघमर्षण मन्त्रका जप करे। उसके बाद पुनः तीर्थकी प्रार्थना करे—'अश्वमेधके अंगसे प्रकट हुए सर्वपापनाशक तीर्थ! तुममें स्नान करनेसे मेरे पाप नष्ट हो जायँ।' इस प्रकार तीन बार कहकर तीन बार जलमें गोता लगावे। नृसिंहाकारधारी भगवान् विष्णुका स्मरण करे। देवताओं, ऋषियों और पितरोंका विधिपूर्वक तर्पण करे। फिर पश्चिमाभिमुख विराजमान भगवान् नृसिंहके समीप जाय और अथर्ववेदके मन्त्रसे उनकी पूजा करे। वह अथर्ववेदोक्त मन्त्रराज पूर्वकालमें नारदजीके द्वारा प्रतिष्ठित हुआ। तत्पश्चात् राजा इन्द्रद्युम्नने दीर्घकालतक उस मन्त्रकी उपासना की। नृसिंहाकार भगवान्की उपासनाके लिये उसके समान दूसरा मन्त्र नहीं है। उसके उच्चारणमात्रसे भगवान् नृसिंह प्रसन्न हो जाते हैं। ब्रह्माजीने इसी मन्त्रसे काष्ठविग्रहधारी जगदीशजीकी भी स्थापना की है। पूर्वोक्त उपचारोंसे तथा लाल जवापुष्प और अन्यान्य सुगन्धित पुष्पोंसे भगवान् नृसिंहकी पूजा करे। मिश्री और गायका घी मिलाकर गोदुग्धमें तैयार की हुई खीर, घीमें पकाकर बनाये हुए खाँड़ और कपूरसे युक्त मोदक, संयाव (हलवा), घीमें बने हुए पूए, नाना प्रकारके फल, शक्कर और दही मिलाये हुए चावल आदि नैवेद्य निवेदन करे। भगवान् नृसिंहका दर्शन, चरणस्पर्श, नमस्कार और पूजन करके मनुष्य अपने-अपने मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है।
फिर पूर्णिमाको प्रातःकाल पूर्वोक्त विधिसे तीर्थराजके जलमें स्नान करके शुद्ध आहारका सेवन तथा इन्द्रियोंका संयम करते हुए मनुष्य भगवत्प्रीतिकाके लिये पाँच दिनोंतक केवल एक समय भोजन करे। तत्पश्चात् मन्दिरमें प्रवेश करके मंचपर विराजमान पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्राजीका दर्शन करके मनुष्य पापसे मुक्त हो जाता है। जो ज्येष्ठकी अमावास्याको सर्वतीर्थमय कूपसे लाये हुए सुगन्धित जलके द्वारा स्नान कराये जाते हुए श्रीहरिका दर्शन करता है, उसके तन-मनमें पापका सम्पर्क नहीं रहता।
चतुर्दशीको तृण अथवा काष्ठका सुदृढ़ एवं सुन्दर मंच बनवाकर हरी-हरी घासवाली भूमिपर स्थापित करे। उसके ऊपर सुन्दर चंदोवा लगाकर उसे भलीभाँति सजा दे। नाना प्रकारकी मणियोंकी मालासे बन्दनवार बनावे। इस प्रकार मंचको स्थापित करके उसके दक्षिण भागमें कुएँसे जल निकालकर कलशोंमें भरकर शास्त्रोक्त विधिसे उन्हें शालाके भीतर रखे। फिर उन कलशोंमें पावमानी ऋचाके द्वारा सुवासित जल भरे। यह कर्म चतुर्दशीकी आधी रातमें करनेयोग्य बताया गया है। तदनन्तर धीरे-धीरे भगवान् बलभद्र और श्रीकृष्णको राजासे सम्मानित ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ले जायँ। चँवर और ताड़के पंखेसे उनपर निरन्तर हवा करते रहें। भगवान्के शरीरपर जो पहले किया हुआ कच्चा लेप हो, उसे न छुड़ावे। जिस प्रकार सुगन्धित लेपसे प्रतिदिन भगवान्का अंग पुष्ट हो, वैसा प्रयत्न करे। भगवान्को ले
- वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * | ३७३ ---|---
जानेवाले मनुष्य सावधान और सदाचारी हों। उन्हें ले जाकर मंचपर विराजमान करें। फिर शान्तिपूर्वक अधिवासित कलशोंके जलसे समुद्रज्येष्ठा मन्त्रके द्वारा भगवद्विग्रहोंको स्नान करावे। यह स्नान दर्शन करने तथा अभिषेक करनेवाले मनुष्योंको कृतकृत्य करनेवाला है। जो मनुष्य वहाँ खड़े होकर प्रसन्नतापूर्वक भगवान्के ज्येष्ठस्नान और यात्राका उत्कण्ठित चित्तसे दर्शन करते हैं, वे संसारसमुद्रमें नहीं गिरते। श्रीहरिके इस स्नानका दर्शन करनेवाले पुरुषोंकी जान-बूझकर या अनजानमें की हुई | अनादिसंचित पापराशि तत्काल नष्ट हो जाती है। स्नान-दर्शन करनेमें जो पुण्य बताया गया है, वही मंचपर विराजमान श्रीहरिका दर्शन करनेसे भी प्राप्त होता है। ब्राह्मणो ! वहाँ एक ही जगन्नाथजी तीन विग्रहोंमें स्थित हैं। उनमेंसे एक-एकका भी स्नान-दर्शन; भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला है। जो भगवान्के स्नानके समय 'जय रामभद्र ! जय सुभद्रे ! जय कृष्ण ! जय जगन्नाथ !' इस प्रकार प्रसन्नतापूर्वक उच्चारण करता है, वह मोक्षको प्राप्त होता है।
<div align="center">~~~~~</div>श्रीजगन्नाथजीकी रथयात्रा, गुण्डिचा-महोत्सव तथा पुनः मन्दिरप्रवेश सम्बन्धी यात्रा एवं उत्सवकी महिमा
जैमिनिजी कहते हैं—तदनन्तर श्रद्धासे युक्त प्रस्तुत किये हुए उपचारोंद्वारा बलभद्र, श्रीकृष्ण और सुभद्राजीका पूजन करे। उसके बाद जैसे पहले मन्दिरसे ले आते समय उत्सव किया गया था, उसी प्रकार महान् उत्सव करके उन सब भगवत्स्वरूपोंको पुनः दक्षिणाभिमुख ले जाय। उस समय जो मनुष्य दक्षिणाभिमुख जाते हुए श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्राका दर्शन करता है, वह स्नान-दर्शनजनित समस्त पुण्य-फलको प्राप्त करता है। मन्दिरके समीप पहुँचनेपर बलभद्र और सुभद्राके साथ जगन्नाथजीकी आरती उतारकर मन्दिरके भीतर प्रवेश करावे और फिर किसी प्रकार उन्हें न देखे।<br><br>ज्येष्ठ मासके शुक्लपक्षमें जो पूर्णिमा आती है, उसमें ज्येष्ठा नक्षत्रके एक ही अंशमें चन्द्रमा और बृहस्पति हों, बृहस्पतिका ही दिन हो और शुभ योग भी हो तो वह महाज्येष्ठी पूर्णिमा कहलाती है, जो सब पापोंका नाश करनेवाली है। महाज्येष्ठी पूर्णिमा महापुण्यमयी तथा भगवान्की प्रीतिको बढ़ानेवाली है। उसमें करुणासिन्धु देवेश्वर जगन्नाथजीका पूजन और | उनके स्नानका दर्शन करके मनुष्य पापराशिसे मुक्त हो जाता है।<br><br>वैशाखके शुक्लपक्षमें जो पापनाशिनी तीज आती है, उसमें रोहिणी नक्षत्रका योग होनेपर राजा पवित्रभावसे संकल्पपूर्वक एक आचार्यका वरण करे। फिर जिन्होंने काष्ठ कर्म देखा और जाना हो, ऐसे एक या तीन बढ़इयोंसे पूर्वोक्त प्रकारसे श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्राजीके लिये तीन रथ तैयार करावे, जिनमें बैठनेके लिये सुन्दर आसन हों और जो सुन्दर कलापूर्ण ढंगसे बनाये गये हों। रथोंका निर्माण हो जानेपर राजा शास्त्रोक्त विधिसे मन्त्रके अनुसार पूर्ववत् उनकी प्रतिष्ठा करे। मार्गका भलीभाँति संस्कार करावे। मार्गके दोनों ओर फूलोंके गुच्छे, माल्य, सुन्दर वस्त्र, चँवर, गुल्मलता आदि और फूलोंके द्वारा मण्डल बनावे। देखनेपर ऐसा मालूम हो कि वहाँ सुन्दर फूलोंसे सुशोभित वन-पंक्ति शोभा पा रही है। रास्तेकी भूमि बराबर कर देनी चाहिये। वहाँ कीचड़ नहीं रहना चाहिये, जिससे भगवान्का रथ सुखपूर्वक चल सके। पग-पगपर रास्तेके दोनों पाश्र्वोंमें दिशाओंको सुगन्धित करनेवाले धूपपात्र
३७४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
रखे जायँ। सड़कपर चन्दनके जलका छिड़काव हो। नगाड़ा और ढक्का आदि बाजे बजाये जायँ। सोने-चाँदीके ध्वज, जिनके बीचमें चित्रकारी की गयी हो, लगाये जायँ और उनपर पताकाएँ फहराती रहें। भूमिपर बहुत-सी वैजयन्ती मालाएँ बिछी हों। अनेकों कसे-कसाये हाथी-घोड़े प्रस्तुत किये जायँ, जिनका भलीभाँति श्रृंगार किया गया हो। इस प्रकार सामग्री एकत्र करके उत्तम भक्तिसे युक्त राजा महान् उत्सव करे।
आषाढ़के शुक्लपक्षमें पुष्य नक्षत्रसे युक्त द्वितीया तिथि आनेपर उसमें अरुणोदयके समय भगवान्की पूजा करे। ब्राह्मणों, वैष्णवों, तपस्वी और यतियोंके साथ स्वयं भी हाथ जोड़कर राजा देवाधिदेव भगवान्से यात्राके लिये निवेदन करे— ‘प्रभो! आपने पूर्वकालमें राजा इन्द्रद्युम्नको जैसी आज्ञा दी है उसके अनुसार रथसे गुण्डिचामण्डपके प्रति विजययात्रा कीजिये। आपकी कृपा-कटाक्षपूर्ण दृष्टिसे दसों दिशाएँ पवित्र हों तथा स्थावर-जंगम समस्त प्राणी कल्याणको प्राप्त हों। आपने यह अवतार लोगोंके ऊपर दयाकी इच्छासे ग्रहण किया है। इसलिये भगवन्! आप प्रसन्नतापूर्वक पृथ्वीपर चरण रखकर पधारिये।’
इसके बाद कुछ लोग मंगलगीत गावें। कोई जय-जयकार करें और ‘जितं ते पुण्डरीकाक्ष०’ इत्यादि मन्त्रका उच्च स्वरसे जप करें। सूत, मागध आदि हर्षमें भरकर भगवान्के पवित्र यशका गान करें। भगवान्के दोनों पार्श्वमें सुवर्णमय दण्डसे सुशोभित व्यजनोंकी पंक्ति धीरे-धीरे डुलती रहे। कृष्णागरुकी धूपसे सम्पूर्ण दिशाएँ और वहाँका आकाश सुवासित रहे। झाँझ, करताल, वेणु, वीणा, माधुरिका आदि वाद्य गोविन्दकी इस विजययात्राके समय मधुर स्वरसे बजते रहें। इस प्रकार उत्सव आरम्भ होनेपर बलभद्र, श्रीकृष्ण और सुभद्राको ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य लोग धीरे-धीरे पैर रखते हुए ले जायँ। बीच-बीचमें रूईदार बिछौनोंपर उन्हें विश्राम करावें और इस प्रकार उन सबको रथपर ले जायँ। फिर उस उत्तम रथको घुमाकर बलभद्र, कृष्ण तथा सुभद्राको सुन्दर चँदोवायुक्त मण्डपसे सुशोभित रथमें विराजमान करें। उन सबको रूईदार गद्दोंपर बैठाकर भक्तिपूर्वक भाँति-भाँतिके वस्त्र, आभूषण और मालाओंसे विभूषित करें। नाना प्रकारके उपचारोंसे उनकी पूजा भी करें। उस समय रथपर विराजमान होकर यात्रा करते हुए श्रीजगन्नाथजीका जो लोग भक्तिपूर्वक दर्शन करते हैं, उनका भगवान्के धाममें निवास होता है। भगवान् श्रीहरिके उस उत्सवका माहात्म्य क्या बतलाऊँ। जिनके नामका संकीर्तन करनेमात्रसे सौ जन्मोंका पाप नष्ट हो जाता है, रथमें स्थित हो महावेदीकी ओर जाते हुए उन पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्राजीका दर्शन करके मनुष्य अपने करोड़ों जन्मोंके पापोंका नाश कर लेता है। मेघोंके द्वारा जलकी वर्षाके संयोगसे रथका मार्ग जब कीचड़युक्त हो जाता है, उस समय भी वह श्रीकृष्णकी दिव्यदृष्टि पड़नेसे समस्त पापोंका नाश करनेवाला होता है। उस पंकिल रथमार्गमें जो उत्तम वैष्णव भगवान्को साष्टांग प्रणाम करते हैं, वे अनादिकालसे अपने ऊपर चढ़े हुए पापपंकको त्याग कर मुक्त हो जाते हैं। जो भगवान् वासुदेवके आगे जय शब्दका उच्चारण करते हुए स्तुति करते हैं, वे भाँति-भाँतिके पापोंपर निःसन्देह विजय पा जाते हैं। जो श्रेष्ठपुरुष वहाँ नृत्य करते और गाते हैं, वे उत्तम वैष्णवोंके संसर्गसे मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। जो भगवान्के नामोंका कीर्तन करता हुआ उस यात्रामें साथ-साथ जाता है तथा गुण्डिचा नगरको जाते हुए श्रीकृष्णकी ओर देखकर भक्तिपूर्वक ‘जय कृष्ण, जय कृष्ण, जय कृष्ण’ का उच्चारण करता है, वह माताके गर्भमें निवास करनेका दुःख कभी नहीं भोगता। जो मनुष्य रथके आगे खड़ा होकर चँवर, व्यजन, फूलके गुच्छों अथवा वस्त्रोंसे भगवान् पुरुषोत्तमको हवा करता है, वह
- वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३७५
ब्रह्मलोकमें जाकर मोक्ष पाता है। जो पवित्र सहस्रनामका पाठ करते हुए रथकी प्रदक्षिणा करते हैं, वे भगवान् विष्णुके समान होकर वैकुण्ठधाममें निवास करते हैं। जो मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णके उद्देश्यसे दान देता है, उसका वह थोड़ा भी दान मेरुदानके समान अक्षय फल देनेवाला होता है। जो भगवान्के आगे रहकर उनके मुखारविन्दका दर्शन करते हुए पग-पगपर प्रणाम करते हैं और मार्गकी धूलि या कीचड़में लोटते हैं, वे क्षणभरमें मुक्तिरूपी फलको पाकर श्रीविष्णुके उत्तम धाममें जाते हैं।
इस प्रकार बलभद्र और सुभद्राके साथ भगवान् श्रीकृष्ण उत्तम रथपर विराजमान हो चारों दिशाओंको प्रकाशित करते हुए और अपने अंगोंका स्पर्श करके बहनेवाली वायुके द्वारा समस्त देहधारियोंके पापोंका नाश करते हुए यात्रा करते हैं। वे बड़े दयालु और भक्तोंके पालक हैं। जो अज्ञानी और अविश्वासके पात्र हैं, उनके मनमें भी विश्वास उत्पन्न करनेके लिये भगवान् विष्णु प्रतिवर्ष यात्रा प्रारम्भ करते हैं।
इस प्रकार गुण्डिचा नगरमें जाकर भगवान् बिन्दुतीर्थके तटपर सात दिन निवास करते हैं; क्योंकि प्राचीन कालमें उन्होंने राजा इन्द्रद्युम्नको यह वर दिया था कि 'मैं तुम्हारे तीर्थके किनारे प्रतिवर्ष निवास करूँगा। मेरे वहाँ स्थित रहनेपर सभी तीर्थ उसमें निवास करेंगे। उस तीर्थमें विधिपूर्वक स्नान करके जो लोग सात दिनोंतक गुण्डिचामण्डपमें विराजमान मेरा, बलरामका और सुभद्राका दर्शन करेंगे, वे मेरा सायुज्य प्राप्त कर लेंगे।' अतः परम पवित्र, सर्वपापनाशक, अकेले ही सब तीर्थोंका फल देनेवाले तथा श्रीविष्णुकी प्रसन्नता बढ़ानेवाले उस शुभ तीर्थमें स्नान करके पितरों और देवताओंका विधिपूर्वक तर्पण करनेके पश्चात् जो तटवर्ती नृसिंह भगवान्का दर्शन, पूजन और उन्हें नमस्कार करता है तथा पुनः महावेदीके समीप जाकर पूर्ववत् भक्तिपूर्वक भगवान्का पूजन और वन्दन करता है, वह पुरुष हो या स्त्री, उसे भगवान् विष्णुकी सायुज्यमुक्ति प्राप्त हो जाती है।
मघा नक्षत्र पितरोंका है, अतः वह पितरोंको अधिक प्रीति प्रदान करनेवाला है। उस नक्षत्रमें पुत्रोंद्वारा दिया हुआ श्राद्धका दान पितरोंको विशेष तृप्त करता है। उक्त सर्वतीर्थमय सरोवरके तटपर भगवान् विष्णुके समीप नृसिंह और नीलकण्ठके मध्यवर्ती अतिपवित्र स्थानमें यदि मनुष्य श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करे तो अपनी सौ पीढ़ियोंका उद्धार करता है। आषाढ़के शुक्ल पक्षमें पंचमी तिथि, मघा नक्षत्र और जगन्नाथजीका महावेदीपर आगमन—ये तीनों योग यदि इन्द्रद्युम्न-सरोवरपर प्राप्त हों तो वह पितरोंको अक्षय प्रीति देनेवाला चतुष्पादयोग माना गया है। भाद्रपद मासकी अमावास्याको अथवा चारों युगादि तिथियोंमें जो पितरोंके उद्देश्यसे अश्वमेधांग-सम्भूत इन्द्रद्युम्न-सरोवरपर श्राद्ध करता है, उसका किया हुआ वह श्राद्ध सब पापोंका नाश करनेवाला है। सात दिनोंतक मौनभावसे तीनों काल स्नान करे और तीनों संध्याओंमें
३७६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
कलशपर भक्तिपूर्वक भगवान्की पूजा करे। गायके घी अथवा तिलके तेलसे दीपक जलावे और उसे भगवान्के आगे रखकर रात-दिन उसकी रक्षा करे। दिनमें मौन रहे और रातमें जागरण करके भगवत्सम्बन्धी मन्त्रका जप करे। इस प्रकार सात दिन बिताकर आठवें दिन प्रातःकाल उठकर प्रतिष्ठा करावे। इस व्रतराजका विधिपूर्वक पालन करके मनुष्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंको अपनी रुचिके अनुसार प्राप्त करता है।
सात दिनोंतक वहाँ रथकी भलीभाँति रक्षा करके आठवें दिन उन सब रथोंको पुनः दक्षिणाभिमुख कर दे और वस्त्र, माला, पताका तथा चँवर आदिसे उनकी पुनः सजावट करे। आषाढ़ शुक्ला नवमीको प्रातःकाल उन सब भगवद्विग्रहोंको रथपर विराजमान करे। भगवान् विष्णुकी यह दक्षिणाभिमुख यात्रा अत्यन्त दुर्लभ है। भक्ति और श्रद्धासे युक्त मनुष्योंको इस यात्रामें प्रयत्नपूर्वक भाग लेना चाहिये। जैसे पहली यात्रा है उसी प्रकार यह दूसरी भी है। दोनों ही मोक्षदायिनी हैं। यात्रा और मन्दिरप्रवेश—ये दोनों मिलाकर भगवान्का एक ही उत्सव माना गया है। यह पूरी यात्रा नौ दिनकी होती है। जिन लोगोंने तीन अंगोंवाली इस यात्राकी पूर्णतः उपासना की है, उन्हींके लिये यह महावेदी महोत्सव सम्पूर्ण फल देनेवाला होता है। गुण्डिचामण्डपसे रथपर बैठकर दक्षिण दिशाकी ओर आते हुए श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्राका जो दर्शन करते हैं, वे मोक्षके भागी होते हैं, अर्थात् भगवान्के वैकुण्ठधाममें जाते हैं।
मुनिवरो! इस प्रकार मैंने तुमसे महावेदी महोत्सवका वर्णन किया, जिसके कीर्तनमात्रसे मनुष्य निर्मल हो जाता है। जो प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर इस प्रसंगका पाठ करता है अथवा सावधान होकर सुनता है और भगवत्प्रतिमाका चित्र लेकर भी उसे रथपर बैठाकर भक्तिभावसे इस रथयात्राको सम्पन्न करता है, वह भी भगवान् विष्णुकी कृपासे गुण्डिचामहोत्सवके फलस्वरूप वैकुण्ठधाममें जाता है।
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पुरुषोत्तमक्षेत्रमें चातुर्मास्यकी महिमा, राजा श्वेतपर भगवत्कृपा तथा भगवत्प्रसादका माहात्म्य
जैमिनिजी कहते हैं—सूर्यके कर्क राशिपर रहते हुए आषाढ़ शुक्ला एकादशीसे लेकर कार्तिक शुक्ला एकादशीतक वर्षाकालिक चार महीनोंमें भगवान् विष्णुका शयन होता है। यह श्रीहरिकी आराधनाका परम पवित्र समय है। वर्षाके चार महीनोंमें जितने दिन मनुष्य जनार्दनके समीप रहकर व्यतीत करता है, उतने समयतक वह प्रतिदिन अश्वमेधयज्ञके फलका भागी होता है। समुद्रके पवित्र जलमें स्नान करके श्रीपुरुषोत्तमका दर्शन करते हुए चातुर्मास्य व्रतका पालन करना मुक्तिका साधन माना गया है। इसलिये मनुष्य बड़े यत्नसे पुण्यमय पुरुषोत्तमक्षेत्रमें निवास करे। चातुर्मास्यमें भगवान् शेषशय्यापर शयन करते हैं। आठ महीने पुरुषोत्तमक्षेत्रमें निवास करके प्रतिदिन भगवान् विष्णुका दर्शन करनेसे मनुष्य जिस फलको पाता है, उसीको चातुर्मास्यमें एक दिनके निवास और दर्शनसे प्राप्त कर लेता है। जो सब प्रकारके पापोंमें आसक्त, सम्पूर्ण सदाचारोंसे भ्रष्ट तथा समस्त धर्मोंसे बहिष्कृत हो, वह भी पुरुषोत्तमक्षेत्रमें निवास करे। जो दूध पीकर अथवा शाकाहार करके यहाँ चातुर्मास्य व्यतीत करता है, वह यहाँ प्रचुर सुख भोगकर अन्तमें परम शान्तिको प्राप्त होता है। देवाधिदेव भगवान्की प्रसन्नताके लिये मनुष्य यहाँ भीष्मपंचक नामक उत्तम व्रतका पालन करे और जंगली फल-मूल खाकर रहे। यह व्रत भगवान्की प्रसन्नताको
- वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३७७
बढ़ानेवाला, सब पापोंका नाश करनेवाला और वैकुण्ठधामरूपी सद्गति देनेवाला है। मुनीश्वरो! यह सब तुम्हें रहस्यकी बातें बतायी गयी हैं। ये जितने भी व्रत हैं, वे भगवद्भक्तिहीन मनुष्योंके लिये निष्फल होते हैं, यह अच्छी तरह जान लो। तीर्थोंका तथा सात्त्विक दान और तपस्याओंका जो उत्तम फल है, वह सब केवल विष्णुभक्तिसे मनुष्य प्राप्त कर लेता है।
प्राचीन कालकी बात है, त्रेतायुगमें श्वेत नामक एक महान् राजा हो गये हैं। उन्होंने व्रतमें स्थित होकर भगवान् पुरुषोत्तममें बड़ी भक्ति की। राजा इन्द्रद्युम्नके द्वारा निश्चित किये हुए भोगोंकी मात्राके अनुसार वे प्रतिदिन प्रसन्नतापूर्वक भगवान् लक्ष्मीपतिके लिये भोग प्रस्तुत करते थे। अनेक प्रकारके भक्ष्य, भोज्य पदार्थ, भलीभाँति संस्कार किये हुए छहों रस, विचित्र माल्य, सुगन्ध, अनुलेपन तथा बहुत प्रकारके राजोचित उपचार अवसर-अवसरपर भगवान्की सेवामें समर्पित करते थे। एक दिन राजा श्वेत प्रातःकाल पूजाके समय भगवान्का दर्शन करनेके लिये गये और पूजा होते समय उन्होंने श्रीहरिका दर्शन किया। देवाधिदेव भगवान्को प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़े प्रसन्नतापूर्वक वे मन्दिरके द्वारके समीप खड़े रहे। अपने ही द्वारा तैयार किये हुए उत्तम उपचारों तथा सहस्रों उपहारकी सामग्रियोंको राजाने भगवान्के सामने उपस्थित देखा। तब वे कुछ ध्यानस्थ होकर मन-ही-मन सोचने लगे—‘क्या भगवान् श्रीहरि यह मनुष्यनिर्मित भोग ग्रहण करेंगे? यह बाह्यपूजनकी सामग्री भावदूषित होनेके कारण निश्चय ही भगवान्को प्रसन्न करनेवाली न होगी।’
इस प्रकार विचार करते हुए राजाने देखा— दिव्य सिंहासनपर साक्षात् भगवान् विष्णु विराजमान हैं और दिव्य सुगन्ध, दिव्य वस्त्र एवं दिव्य हारोंसे विभूषित साक्षात् लक्ष्मीदेवी उनके आगे अन्न-पान आदि भोजनसामग्री परोस रही हैं और भगवान् भोजन कर रहे हैं। यह अद्भुत झाँकी देखकर राजाने अपनेको कृतार्थ माना तथा आँखें खोल दीं। फिर उन्हें पहले देखी हुई सब बातें दिखायी दीं। इससे राजाको बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ। भगवान्को निवेदित किये हुए प्रसादको ही खानेवाले व्रतशील राजाने बड़ी भारी तपस्या की। उस तपस्याका उद्देश्य यह था कि मेरे राज्यमें किसीकी अकालमृत्यु न हो और मरे हुए प्राणियोंकी मुक्ति हो जाय। शरणागतोंके लिये कल्पवृक्षस्वरूप मन्त्रराज आनुष्टुभका उन्होंने नित्य नियमपूर्वक जप किया। इस प्रकार सौ वर्षतक जप और तपस्याके पश्चात् राजाने समस्त पापोंका अपहरण करनेवाले साक्षात् भगवान् नृसिंहका दर्शन प्राप्त किया। वे योगासनपर कमलके ऊपर विराजमान थे। उनके वामभागमें भगवती लक्ष्मी शोभा पा रही थीं। देवता, सिद्ध और मुक्त पुरुष उनकी स्तुतिमें लगे थे। ऐसे भगवान्को उपस्थित देखकर आश्चर्यसे चकित होकर राजा श्वेत हर्ष-गद्गद वाणीमें ‘हे नाथ! प्रसन्न होइये’ ऐसा कहते हुए धरतीपर गिर पड़े। तपस्यासे दुर्बल तथा चरणोंमें पड़े हुए निष्पाप राजा श्वेतसे भक्तवत्सल भगवान् नृसिंहने कहा—‘वत्स! उठो, मुझे भक्तिसे प्रसन्न जानो और कोई अभीष्ट वर माँगो।’ भगवान्का यह वचन सुनकर राजा उठे और दोनों हाथ जोड़कर भक्तिसे विनम्र होकर बोले—‘स्वामिन्! यदि मुझपर आपकी अत्यन्त दुर्लभ कृपा है, तो मैं मरनेके बाद आपके समान रूप प्राप्त करके आपके समीप ही सेवामें रहूँ तथा जबतक इस पृथ्वीपर मैं राजाके पदपर रहूँ, तबतक मेरे राज्यमें कोई भी मनुष्य अकालमृत्युको न प्राप्त हो और जिसकी कालमृत्यु हो, उसकी भी सायुज्य मुक्ति हो जाय।’
यह सुनकर भगवान्ने परम उत्तम राजा श्वेतसे कहा—‘श्वेत! तुम्हारा मनोरथ पूर्ण हो। एक
भगवान् विष्णुको लक्ष्मीदेवी भोजन परोस रही हैं।
राजा श्वेतको भगवान् लक्ष्मी-नृसिंहके दिव्यदर्शन
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हजार वर्षोंतक तुम अपने समृद्धिशाली राज्यका उपभोग करो। प्रतिदिन मेरे नैवेद्यका भोजन करनेसे तुम्हारी सारी पापराशि नष्ट हो जायगी और अन्तःकरण अत्यन्त शुद्ध हो जायगा। तत्पश्चात् तुम मेरी सायुज्य मुक्ति प्राप्त कर लोगे। तुम्हारे राज्यमें जो लोग मेरे निर्माल्यका भोजन करेंगे, उनकी कभी अकालमृत्यु नहीं होगी।'
इस प्रकार राजा श्वेतको वरदान देकर भगवान् नृसिंह अन्तर्धान हो गये। यहाँ अमृतके समान स्वादिष्ट एवं सुपक्व अन्नको सबके स्वामी भगवान् नारायण भोजन करते हैं। उनके प्रसादका उपभोग सब पापोंका क्षय करनेवाला है। भगवान् जगन्नाथजीके मन्दिरमें पहुँचकर भगवान्को भोग लग जानेपर जैसे भगवान् विष्णु नित्य शुद्ध हैं वैसे ही उनका प्रसाद भी शुद्ध है। व्रतपरायण विधवा स्त्रियाँ, वर्णाश्रम-धर्ममें तत्पर रहनेवाले मनुष्य, यज्ञमें दीक्षित पुरुष तथा अग्निहोत्री भी भगवान् पुरुषोत्तमके प्रसादको खाकर पवित्र होते हैं। दरिद्र, कृपण, गृहस्थ, प्रभु, स्वदेशी, परदेशी, जो भी वहाँ आते हैं, उन्हें चाहिये कि वे कोई भी भगवान् विष्णुका प्रसाद ग्रहण करनेमें अहंकार न दिखावें। भक्तिसे, लोभसे, कौतूहलसे अथवा क्षुधा-शान्तिके निमित्त आकण्ठ भोजन किया हुआ भगवत्प्रसाद सब पापोंको पवित्र कर देता है। जो पण्डितमानी मूर्ख अमित तेजस्वी भगवान् विष्णुके उस अमृतमय प्रसादकी निन्दा करते हैं, उनकी निश्चय ही दुर्गति होती है। उस प्रसादको बेचना या मोल लेना भी अच्छा नहीं माना गया है। मैं जगन्नाथजीके प्रसादका भोजन करके और कुछ नहीं खाऊँगा, इस प्रकार सच्ची प्रतिज्ञा करके जो प्रतिदिन प्रसाद ग्रहण करता है, वह मनुष्य सब पापोंसे मुक्त एवं शुद्धचित्त होकर विशुद्ध वैकुण्ठधामको जाता है। भगवान्का प्रसाद यदि चिरकालका रखा हो, सूख गया हो अथवा दूर देशसे लाया गया हो, जिस किसी प्रकार भी उसका उपयोग करनेपर वह सब पापोंका नाश करनेवाला है। जगन्नाथजीके प्रसादका अन्न और गंगाजल दोनों बराबर हैं। उनको भोजन करनेसे सब पापोंका नाश हो जाता है। वहाँ काष्ठरूपी परब्रह्म सबके नेत्रोंके समक्ष प्रकाशित हैं। थोड़े पुण्यवाले मनुष्योंका उस प्रसादमें विश्वास नहीं होता, उसकी महिमाको कोई नहीं जानता। भयंकर कलिकालमें धर्मके तीन चरणोंका नाश हो जाता है, उसका एक ही पाद रह जाता है। उस समय प्रायः सब लोग असत्यवादी, दम्भी और शठवृत्तिके होते हैं, धर्मसे विमुख तथा जिह्वा और उपस्थके भोगोंमें तत्पर रहते हैं। ध्यान, तपस्या और व्रत कभी नहीं करते, सभी अत्यन्त अधर्मी, लोभी और हिंसक होते हैं। अपना कोई प्रयोजन न होनेपर भी दूसरोंकी निन्दासे सन्तुष्ट होते हैं, प्रसंग अथवा कौतूहलवश भी दूसरोंके कार्यकी हानि करते हैं और अपने छोटेसे कार्यके लिये भी दूसरोंके महत्त्वपूर्ण कार्योंमें बाधा उपस्थित करते हैं। धर्मतः प्राप्त होकर अपने घरमें आयी हुई सुन्दरी स्त्रीकी भी अवहेलना करके दूसरोंकी निन्दनीय स्त्रीमें आसक्त होते हैं। अग्निहोत्र आदि कर्म अथवा दूसरा कोई व्रत भी कहीं पालित नहीं होता। यदि कहीं है तो वह ब्राह्मणोंकी जीविकाके रूपमें है। जो पारलौकिक कर्म हैं वे भी यथार्थरूपसे सम्पादित न होनेके कारण फलदायक नहीं होते। कलियुगमें राजालोग प्रायः प्रजाकी रक्षासे मुँह मोड़े रहते हैं। वे सदा कर वसूल करते हैं, प्रायः पापिष्ठ और चोरीकी वृत्तिवाले होते हैं। कलियुगमें प्रायः सब लोग वर्णसंकर और शूद्रके तुल्य हो जाते हैं। राजा ही प्रजाका धन अपहरण करते और शूद्र राजसेवक होते हैं। वैदिक और स्मार्त आदि कर्मोंका कलिमें भलीभाँति अनुष्ठान नहीं किया जाता। उस समय दान-धर्म सबसे उत्तम है। कलियुग प्राप्त होनेपर यहाँ भगवान् विष्णु ही सबकी गति हैं। शालग्राम आदि क्षेत्रमें भगवान्का स्मरण और कीर्तन किया जाता है, परंतु यह पुण्यक्षेत्र नीलाचल तो उन क्षेत्रज्ञ परमात्माका
- वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३८१
शरीर है। काष्ठके बहाने सबके जीवनरूप विष्णु साक्षात् शरीर धारण करके यहाँ विराजमान हैं। पापियोंके कलिकालजनित पापका नाश करनेके लिये ही यहाँ भगवान्का प्राकट्य हुआ है। वे यहाँ अपने दर्शन, स्तवन और प्रसादभोजनसे मोक्षदायक होते हैं। भगवान्के प्रसादसे जिसका शरीर व्याप्त है, वह उस विशुद्ध आहारसे विशुद्धात्मा होनेके कारण पातकोंमें लिप्त नहीं होता। भगवान् जगदीश इसी तीर्थमें अर्पित किये हुए नैवेद्यका साक्षात् भोजन करते हैं।
भगवान् विष्णुके श्रीअंगोंसे उतारी हुई तुलसीकी मालाको जो भक्त अपने मस्तक या गलेमें धारण करता है अथवा जो उसे हृदयसे लगाये रखता है या भगवत्प्रसादरूप तुलसीदल भक्षण करता है, वह भगवान् विष्णुके धाममें जाता है। तुलसीदलसे मिश्रित भगवत्प्रसाद भोजन करके मनुष्य निश्चय ही मोक्ष पाता है। भगवान् विष्णुके आचमन, चरणोदक तथा स्नान-जल सब पापोंका नाश करनेवाले हैं। शव आदि अपवित्र वस्तुओंके स्पर्शजनित दोषका भी उनके द्वारा नाश होता है। इतना ही नहीं, वे समस्त दीक्षाओं और व्रतोंके फल देनेवाले तथा ऐश्वर्यकी वृद्धि करनेवाले हैं। भगवान्का चरणामृत अकालमृत्युका निवारण, रोगसमूहका संहार तथा पापराशिका नाश करनेवाला है। इस प्रकार पुरुषोत्तमतीर्थमें लक्ष्मीजीके साथ निवास करनेवाले भगवान् विष्णु सब लोगोंपर अनुग्रह करनेकी इच्छासे निवास करते हुए अनायास ही मोक्ष देते हैं।
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भगवान् पुरुषोत्तमके पार्श्व-परिवर्तन, उत्थापन और प्रावरण आदि उत्सवोंका महत्त्व
जैमिनिजी कहते हैं—जगन्मय भगवान् पुरुषोत्तम सब प्रकारसे इस संसारका कल्याण करनेके लिये ही अनेक प्रकारके रूप और लीलाएँ करते हुए नाना शरीर धारण करके प्रकट होते हैं। अहंकारके बिना कर्मका फल नहीं भोगना पड़ता। अहंकारसे मनुष्य इस संसाररूपी कारागारमें बाँधे जाते हैं। बुद्धि और अहंकारसे युक्त होकर मनुष्य जो कर्म करता है, उसके अनुसार शुभाशुभ फलको पाता है। उन कर्म करनेवाले मनुष्योंमें जो सात्त्विक बुद्धिके लोग हैं, वे फलप्राप्तिकी इच्छा न रखकर मुमुक्षुभावसे केवल भगवान्की प्रसन्नताके लिये ही कर्म करते हैं। उन सात्त्विक पुरुषोंके द्वारा दर्शन, ध्यान अथवा स्मरण भी करनेपर सर्वभावन भगवान् जगन्नाथ उन्हें मोक्ष प्रदान करते हैं।
भाद्रपदके शुक्ल पक्षकी एकादशीको जगन्नाथजीके शयनगृहके दरवाजेपर धीरे-धीरे जाकर उसमें प्रवेश करे और शय्यापर सोये हुए उन जगदीश्वरको नमस्कार करके उपचारोंद्वारा उनके चरणोंकी पूजा करे। तत्पश्चात् भक्तिपूर्वक प्रणाम करके गुह्य उपनिषदोंसे स्तुति करे। फिर निम्नांकित प्रार्थना करते हुए भगवान्की करवट बदलकर उन्हें उत्तरकी ओर मुँह करके सुला दे। उस समय इस प्रकार प्रार्थना करे—'देवाधिदेव जगन्नाथ ! आप अनेकानेक कल्पोंका परिवर्तन करनेवाले हैं, आपसे ही यह स्थावर-जंगमरूप सम्पूर्ण जगत् परिवर्तित होता है। भगवन् ! आपने स्वेच्छासे स्वीकार की हुई जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्तिरूप चेष्टाओंद्वारा जगत्का हित करनेके लिये ही शयन किया है। अब इस समय करवट बदल लीजिये; क्योंकि जगत्का पालन करनेके लिये यह आपके करवट बदलनेका समय प्राप्त हुआ है।'
इस प्रकार भगवान्की प्रार्थना करके व्यजन और चँवर डुलावे तथा सुगन्धित चन्दनका भगवान्के
७. वैष्णवखण्ड (कार्तिकमास-माहात्म्य)
३८२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
सब अंगोंपर लेपन करे। तत्पश्चात् स्वादयुक्त मिठाई, खीर, हलुवा, भाँति-भाँतिके फल, अन्य स्वादिष्ट व्यंजन, घीके बने हुए पूए तथा ताम्बूलपत्र आदि सब सामग्री शयनगृहके द्वारपर रखकर भक्तिपूर्वक निवेदन करे। उस दिन यदि भगवान्के स्वरूपका दर्शन हो जाय तो बड़ा भारी फल होता है।
कौमुदी नामक महोत्सवके अवसरपर जगन्नाथजीकी पूजा करके उसी पूर्णिमाकी रातको उत्सवपूर्वक नारियल आदि द्रव्यों तथा पिष्टक (पीठी)-से भगवान् विष्णुकी पूजा करे। तत्पश्चात् सबेरे कार्तिकमास आरम्भ होनेपर उत्तम व्रतका संकल्प ले शुक्लपक्षकी एकादशीतक उसी व्रतके नियमसे रहे। एकादशी आनेपर सोये हुए भगवान् जगदीश्वरको उठावे। पहलेकी भाँति आधी रातके समय जगद्गुरु भगवान्की पूजा करके निम्नांकित मन्त्रका उच्चारण करते हुए प्रसन्नतापूर्वक भगवान्को जगावे—
उत्तिष्ठ देवदेवेश तेजोराशे जगत्पते।
वीक्षस्व सकलं देव प्रसुप्तं तव मायया॥
प्रफुल्लपुण्डरीकश्रीहारिणा नयनेन वै।
त्वया दृष्टं जगदिदं पवित्रं परमेष्यति॥
'देवदेवेश्वर! उठिये। तेजःपुंज जगदीश्वर! देव! सम्पूर्ण जगत् आपकी मायासे सो रहा है, इसकी ओर दृष्टिपात कीजिये। प्रभो! खिले हुए कमलकी शोभाका अपहरण करनेवाले आपके नेत्रसे देखा जानेपर यह जगत् अत्यन्त पवित्र हो जायगा।'
इस प्रकार जगदीशजीको जगाकर शंख, धौंसा, ढोल आदि वाद्यों, नृत्य और गीतों, जय-जयकारके शब्दों तथा नाना प्रकारके स्तोत्रोंके साथ नृत्यमण्डपमें ले जाय। वहाँ सुगन्धित तेलसे उबटन करके जगन्नाथजीको पंचामृत, फलोंके रस तथा नारियलके जलसे स्नान करावे। उसके बाद सुगन्धयुक्त आँवले और जौके चूर्णसे भगवान्के शरीरपर लेप करे। तुलसीके चूर्णसे उनके शरीरको मले और सुगन्धित चन्दनका लेप करे। उस समय जो लोग हर्षपूर्वक श्रीजगदीशजीका दर्शन करते हैं वे अनेक जन्मोंके सुदृढ़ पापपंकको धो डालते हैं। तत्पश्चात् बड़े-बड़े उपचारोंसे भगवान्की विधिवत् पूजा करके उनकी आरती उतारे और हाथ जोड़कर बड़ी प्रसन्नताके साथ प्रार्थना करे—'प्रभो! यह सम्पूर्ण चराचर जगत् केवल आपकी ही शरणमें है, जगद्गुरो! अपनी कृपासुधासे परिपूर्ण दृष्टिद्वारा इसे पवित्र कीजिये।' तदनन्तर शेष रात्रि भगवत्सम्बन्धी नृत्य-गीतको देखते हुए व्यतीत करे। जो लोग शयनसे उठे हुए भगवान् गदाधरका दर्शन करते हैं वे अपनी मोहमयी निद्राका भेदन करके शान्त ज्योतिःस्वरूप श्रीहरिको प्राप्त होते हैं।
शालग्रामशिलामें स्थित भगवान् श्रीहरिकी चक्रमूर्तिका शुद्धचित्त होकर पूजन करे। पूजाके समय भगवान्का ध्यान इस प्रकार करे—दामोदर-स्वरूपधारी भगवान्के चार भुजाएँ हैं। उन्होंने हाथोंमें शंख और कमल धारण कर रखा है। उनके वामभागमें कमलके आसनपर लक्ष्मीजी बैठी हैं और वे बायें हाथसे उनका स्पर्श करके बैठे हैं। भगवान् अपने दाहिने हाथसे भक्तोंको वर देनेके लिये उद्यत हैं। उनकी नासिका, ललाट, उनके दोनों नेत्र और कान सभी बहुत सुन्दर हैं। उनका वक्षःस्थल विशाल है, वे सम्पूर्ण लावण्यसे सुशोभित हैं, समस्त अलंकारोंको धारण करके वे बड़े ही मनोहर प्रतीत होते हैं। उनके श्रीअंगोंपर दिव्य पीताम्बर शोभा पा रहा है।
मार्गशीर्षके शुक्ल पक्षमें षष्ठी तिथिको मनुष्य भक्तिभावसे प्रावरणोत्सव अथवा उस उत्सवका दर्शन करके भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। पंचमीकी रात्रिमें भगवान्का वस्त्राधिवास करे, भगवान्को वस्त्रोंके मध्यमें स्थापित करके अन्य वस्त्रसे आच्छादित करे और पुरुषोत्तमके स्मरणपूर्वक उनका स्पर्श करके इस प्रकार प्रार्थना करे—'हे वस्त्र! जो अविनाशी भगवान् विष्णु अपने
- वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३८३
तेजसे सम्पूर्ण जगत्को आच्छादित करनेवाले हैं, उनका भी वसन (आच्छादन) करनेसे तुम्हारा नाम वस्त्र है। तुम जगदीश्वरके वासस्थानमें निवास करो।' तत्पश्चात् चन्दन और पुष्पसे भगवान्का पूजन करे और नृत्य-गीतके द्वारा जागरणपूर्वक रात्रि व्यतीत करे। फिर अरुणोदयकालमें प्रातः-सन्ध्याके समीप पूर्ववत् एकाग्रचित्त हो पुनः भगवान्की पूजा करे। उसके बाद तीन बार मन्दिरकी परिक्रमा करके भगवान्को भी तीन बार घुमावे और उस आच्छादित वस्त्रको हटाकर दर्शन आदिके द्वारा संस्कार करे। तदनन्तर दूर्वा और अक्षतसे पूजा करके भगवान्की आरती उतारे।
हेमन्त ऋतुके आनेपर जो लोग उत्तम वस्त्रोंद्वारा भगवान् नृसिंहको आच्छादित करते हैं अथवा जो आच्छादन-महोत्सवका दर्शन करते हैं वे कभी मोहसे आच्छादित नहीं होते। देवाधिदेव भगवान्के इस प्रावरण-महोत्सवका जो लोग भक्तिपूर्वक दर्शन करते हैं, वे सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्त कर लेते हैं।
पुष्यस्नानोत्सव, उत्तरायणोत्सव तथा दोलारोहणोत्सवका वर्णन
जैमिनिजी कहते हैं—पौषके महीनेमें पूर्णिमाको जब पुष्य नक्षत्र हो, तब भगवान्का पुष्यस्नानोत्सव करे। चतुर्दशीकी रातमें ८१ कलशोंका अधिवासन (स्थापन) करे। भगवान्के आगे सर्वतोभद्रमण्डल बनावे और उसके बीचमें एक बड़ा-सा दर्पण स्थापित करे। रात्रिमें गीत और नृत्य आदिके द्वारा जागरण करे। प्रातःकाल दर्पणमें प्रतिबिम्बित भगवान् पुरुषोत्तमका उपचारोंद्वारा पूजन करे। तदनन्तर पुरुषसूक्तसे कलशोंको अभिमन्त्रित करके फिर उन कलशोंके जलसे अटूट धारा गिराते हुए भगवान् पुरुषोत्तमको स्नान करावे। फिर पावमानीय सूक्त और श्रीसूक्तसे भी क्रमशः बलभद्र और सुभद्राको स्नान करावे। फिर विष्ण्गायत्रीसे* चन्दनयुक्त जलके द्वारा स्नान कराकर श्रीसूक्तसे पूजा करे। तत्पश्चात् भगवान्के श्रीअंगोंमें गन्ध और चन्दनसे लेप करे और उन्हें सुगन्धित पुष्पोंकी मालाओंसे विभूषित करे। फिर रत्नमय छत्र ऊपर उठाकर लक्ष्मीसहित पुरुषोत्तमका पूजन करे। फिर उच्चस्वरसे शंखध्वनि, मंगलगीत और नृत्य आदि हों। भगवान्को चँवर डुलाये जायें, ब्राह्मणलोग जय-जयकार करें और तीन बार अंजलिमें दूर्वा एवं अक्षत लेकर भगवान्की पूजा करके कपूरयुक्त बत्तियोंवाले गायके घीमें जलाये हुए दीपकोंसे जगन्नाथजीकी आरती करे। उसके बाद सुन्दर पानका बीड़ा लगाकर धीरे-धीरे भगवान्के मुखके समीप निवेदन करे। तत्पश्चात् आचार्यको दक्षिणा दे और ब्राह्मणोंका पूजन करे। जो प्रसन्नतापूर्वक पुष्यस्नानका पवित्र उत्सव देखते हैं, वे भगवान् विष्णुके धाममें जाते हैं।
जब भगवान् सूर्य उत्तरदिशाकी ओर गमन करनेकी इच्छासे मकर राशिपर जाते हैं, उस समय उत्तरायण प्रारम्भ होता है। उनके संक्रमणकालका आधा बीस कलाका समय परम पुण्यमय काल माना गया है। वह पितरों, देवताओं तथा ब्राह्मणोंको अत्यन्त प्रिय है। उस समय तीर्थराज समुद्रके जलमें विधिपूर्वक स्नान करके मनुष्य भगवान् नारायणका पूजन करे। कल्पवृक्षको प्रणाम करके देवमन्दिरमें प्रवेश करे और तीन बार श्रीपुरुषोत्तमकी परिक्रमा करके मन्त्रराजके
* विष्ण्गायत्री इस प्रकार है—
ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्।