संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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ब्रह्माजीके द्वारा भगवत्स्वरूपकी एकताका प्रतिपादन तथा भगवान्का राजा इन्द्रद्युम्नको अपनी सेवाका आदेश देना
जैमिनिजी कहते हैं—तदनन्तर राजा इन्द्रद्युम्नने मन-ही-मन आश्चर्यसे चकित होकर ब्रह्माजीसे पूछा—'भगवन् ! यज्ञके अन्तमें भगवान् विष्णुने वैसे ही काष्ठनिर्मित स्वरूप धारण किये थे, जो रथपर विराजमान थे। आपने मन्दिरके भीतर भी उन्हीं विग्रहोंके रूपमें भगवान्की प्रतिष्ठा की है। पहले आकाशवाणीने भी मुझसे यही कहा था कि इस अपौरुषेय वृक्षसे भगवान् चार स्वरूपोंमें अभिव्यक्त होंगे। परंतु इस समय ये एक सच्चिदानन्दघन ब्रह्मरूपमें प्रतिष्ठित दिखायी देते हैं। प्रभो ! यदि आप मुझे इस रहस्यको सुननेका अधिकारी समझते हैं तो ठीक-ठीक बताइये।'
ब्रह्माजीने कहा—राजन् ! यह काष्ठकी मूर्ति है, ऐसा सोचकर तुम्हारे मनमें इसके प्रति साधारण प्रतिमा-बुद्धि न हो। वास्तवमें यह परब्रह्मका स्वरूप है। जो विदारण करे या दान दे उसको दारु कहते हैं। परब्रह्म परमात्मा स्वभावसे ही सब दुःखोंका विदारण और अखण्ड आनन्दका दान करते हैं। इसलिये उनका नाम दारु है। इस प्रकार चारों वेदोंके अनुसार भगवान् श्रीहरि दारुमय हैं। वे जगत्के स्रष्टा हैं। इसलिये उन्होंने अपनेको भी दारुमय स्वरूपमें प्रकट कर लिया। शब्दब्रह्म और परब्रह्ममें कोई भेद नहीं है। प्रलयके समय दोनों एक हैं। केवल सृष्टिकालमें व्यावहारिक भेद रहता है। शब्द और अर्थ दोनों एक-दूसरेकी अपेक्षा रखनेवाले हैं। अर्थके अभावमें शब्द नहीं और शब्दके अभावमें अर्थबोध नहीं होता। इसलिये चारों वेद जैसे शब्द हैं, वैसे ही अर्थ भी हैं। भगवान् हलधर ऋग्वेद-स्वरूप हैं। नृसिंहजी सामवेदरूप हैं। सुभद्रादेवी यजुर्वेदकी मूर्ति हैं और यह सुदर्शन चक्र अथर्ववेदका स्वरूप माना गया है। वेद चार हैं—यह भेद दृष्टि है। अभेद दृष्टिसे सम्पूर्ण वेद एक ही राशि हैं। अतः तुम्हारे मनमें सन्देह नहीं होना चाहिये। एक ही सर्वव्यापी भगवान् अनेक रूपोंमें व्यक्त होते हैं। अन्य अवतारोंमें भी वे इसी न्यायसे बर्ताव करते हैं। राजन् ! इस प्रकार मैंने तुमसे भगवान् जगन्नाथके भेद और अभेद—दोनों ही बताये हैं। जिससे तुम्हारे मनको सन्तोष हो, उसी दृष्टिसे भक्तिपूर्वक भगवान्की आराधना करो। भगवान् सर्वरूपमय हैं तथा सर्वमन्त्रमय हैं। जो जिस प्रकार उनकी आराधना करता है, उसे वे उसी प्रकार फल देते हैं। इसी महिमासे भगवान् विष्णु यहाँ प्रकट हुए हैं। जिसका जितना विश्वास है, उसे उतनी सिद्धि प्राप्त होती है। तुम शुद्ध चित्तसे मन, वाणी और क्रियाद्वारा यहाँ दारु-विग्रह (काष्ठमय स्वरूप) धारण करनेवाले भगवान् गोविन्दकी आराधना करो और इस मन्त्रराजके द्वारा श्रीहरिकी पूजा किया करो। इस मन्त्रसे बढ़कर दूसरा कोई मन्त्र न हुआ है, न होगा। इससे पूजित होनेपर भगवान् विष्णु तत्काल प्रसन्न होते हैं तथा भक्तवत्सल भगवान् अपना परम धाम देते हैं। राजन् ! मैं तुमसे एक तत्त्वकी बात कहता हूँ, ध्यान देकर सुनो। समुद्रके तटपर वटवृक्षके मूलके समीप नीलाचल पर्वतके शिखरपर निवास करनेवाले जो काष्ठमयी मूर्तिके व्याजसे साक्षात् अमृतमय परब्रह्म हैं, उनका दर्शन करके मनुष्य निश्चय ही मोक्षको प्राप्त होता है।
ब्रह्माजीने लोकशिक्षाके लिये राजासे यह सब कहकर पहले प्रकाशमें आये हुए भगवान् विष्णुके