संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३६७
चतुर्विध स्वरूपको प्रकट किया। रथसे उतारते समय जो चार मूर्तियाँ देखी गयी थीं, अब वे ही सिंहासनके ऊपर विराजमान हो गयीं, यह सब लोगोंने प्रत्यक्ष देखा। तत्पश्चात् ब्रह्माजीने द्वादशाक्षर मन्त्रसे बलभद्रजीकी, पुरुषसूक्तसे भगवान् नारायणकी, देवीसूक्तसे सुभद्राजीकी तथा द्वादशाक्षर (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) मन्त्रसे सुदर्शन चक्रकी पूजा की। उसके बाद राजापर अनुग्रह करनेके लिये उन्होंने भगवान्से इस प्रकार निवेदन किया।
ब्रह्माजी बोले—भगवन्! भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले देवदेवेश्वर! इन्द्रद्युम्न दीर्घकालसे आपकी भक्ति करते आ रहे हैं और अब इन्हें आपका दर्शन हुआ। भगवन्! यद्यपि आपका दर्शन सायुज्य मुक्तिका कारण है तो भी ये भक्तियोगके द्वारा आपकी पूजा करनेकी ही अभिलाषा रखते हैं। इसलिये इन्हें आज्ञा दीजिये, जिससे ये भक्तियोगके द्वारा देशकालोचित व्रत आदि तथा भाँति-भाँतिके उपचारोंसे आपकी पूजा करते रहें।
ब्रह्माजीके द्वारा इस प्रकार निवेदन करनेपर काष्ठमय शरीर धारण किये होनेपर भी भगवान्ने मुसकराते हुए गम्भीर वाणीमें कहा, 'इन्द्रद्युम्न! मैं तुम्हारी भक्ति तथा निष्काम कर्मोंसे बहुत प्रसन्न हूँ। मुझमें तुम्हारी स्थिर भक्ति हो। करोड़ोंका धन लगाकर जो तुमने मेरा मन्दिर बनवाया है, इसके भंग हो जानेपर भी मैं इस स्थानका परित्याग नहीं करूँगा। कालान्तरमें भी जो कोई दूसरा पुरुष यहाँ मन्दिर बनवायेगा, तुम्हारे प्रेमसे उसमें भी मेरी स्थिति रहेगी। मन्दिर भंग होनेपर भी मैं इस स्थानका कभी त्याग नहीं करूँगा। जबतक ब्रह्माजीका दूसरा परार्ध पूरा होगा तबतक इस काष्ठमय विग्रहसे ही मैं यहाँ निवास करूँगा। सत्ययुगके प्रथम ज्येष्ठमें यज्ञका प्रारम्भ हुआ और ज्येष्ठकी अमावस्याको* मैंने अवतार लिया है। वही मेरा पवित्र जन्मदिन है। उस दिन महास्नानकी विधिसे प्रत्यर्चामें अधिवासपूर्वक मुझे स्नान कराना चाहिये। ऐसा करनेसे मैं कोटि जन्मोंमें उपार्जित पापराशिका विनाश कर डालूँगा। उस दिन मेरा दर्शन करनेवालोंको सम्पूर्ण तीर्थों, यज्ञों और दानोंका फल प्राप्त होगा। वटवृक्षके उत्तर एक सर्वतीर्थमय कूप है, उसे खोदकर प्रकाशमें लाओ। ज्येष्ठकी अमावस्याको प्रातःकाल मुझको, बलभद्रजीको और सुभद्राको उस कूपके जलसे स्नान कराकर मनुष्य मेरे लोकको प्राप्त कर लेगा। आषाढ़ मासकी शुक्ला द्वितीया यदि पुष्य नक्षत्रसे युक्त हो तो वह इस तीर्थमें मोक्षदायिनी मानी गयी है। नक्षत्रके अभावमें भी मेरी प्रसन्नताके लिये उस तिथिको यात्रा करनी चाहिये। आषाढ़ शुक्ल पक्षकी पुष्य नक्षत्रयुक्त द्वितीया तिथिको मुझको, बलभद्रजीको, सुभद्राको रथपर बिठाकर महान् उत्सवके लिये बहुत-से ब्राह्मणोंको तृप्त करके 'गुण्डिचामण्डप' नामक स्थानको ले जाना चाहिये, जहाँ पहले मैं प्रकट हुआ था। सहस्र अश्वमेध यज्ञकी महावेदी उस समय वहीं थी। उससे बढ़कर पवित्र स्थान इस पृथ्वीपर दूसरा नहीं है। जैसे ब्रह्माके अनुरोधसे और तुम्हारे बनवाये हुए इस महामन्दिरसे इस समय यह नीलाचलका शिखर मेरी अत्यन्त प्रसन्नताका कारण हो रहा है, उसी प्रकार नृसिंह क्षेत्रमें तुम्हारे यज्ञकी वह महावेदी तथा मेरी उत्पत्तिका वह मण्डप मुझे अत्यन्त प्रसन्नता देनेवाला है। मैं बहुत समयतक वहाँ स्थित रहा हूँ, इसलिये उसपर मेरा बहुत प्रेम है। मैं यहाँ तुम्हारी भक्तिसे सदैव स्थित रहूँगा। मेरे उत्थान (हरिबोधिनी एकादशी), मेरे शयन (हरिशयनी एकादशी), मेरे करवट बदलने
* यह तिथि गुजरातके हिसाबसे है। अन्य कई प्रान्तोंकी गणनासे यह आषाढ़ कृष्णा अमावस्या होती है। शुक्ल पक्षमें सब प्रान्तोंकी गणना समान है।