संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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(भाद्रपद शुक्ला एकादशी), मेरे मार्ग प्रावरण तथा पुष्य स्नानका महोत्सव करें। फाल्गुनकी पूर्णिमाको मेरे लिये दोलोत्सव करना चाहिये। | जो दोलामें दक्षिणाभिमुख पूजित हुए मेरा दर्शन करते हैं, वे ब्रह्महत्या आदि सब पापोंसे मुक्त हो जाते हैं।'
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समुद्रमें स्नानकी विधि और भगवद् विग्रहोंका वर्णन
मुनियोंने पूछा—महर्षे! इन्द्रद्युम्नने भगवान् लक्ष्मीपतिके जन्मस्नानका उत्सव किस विधिसे किया? इसके अतिरिक्त भगवान्के अन्य सब उत्सवोंका भी विधिपूर्वक वर्णन कीजिये।
जैमिनिजी बोले—मुनिवरो! इस समय मैं ज्येष्ठस्नानका वर्णन करता हूँ। ज्येष्ठ शुक्ला दशमीको व्रतसंकल्प करके मौन रहे। प्रातःकाल उठकर ‘मार्कण्डेयावट’ नामक तीर्थको जाय और आचमन करके दोनों हाथ जोड़कर मार्कण्डेयेश्वरको प्रणाम करके भगवान् भैरवसे भी आज्ञा ले। फिर तीर्थमें प्रवेश करके वरुणदेवता सम्बन्धी पाँच वैदिक मन्त्रोंसे, तीन आवृत्ति करके अघमर्षण सूक्तसे तथा निम्नांकित मन्त्रसे स्नान करे—
संसारसागरे मग्नं पापग्रस्तमचेतनम्।
त्राहि मां भगनेत्रघ्न त्रिपुरारे नमोऽस्तु ते॥
‘भगनेत्रविनाशक भगवान् त्रिपुरारि! आपको नमस्कार है। मैं पापग्रस्त मूढ़ मानव संसार-सागरमें डूबा हुआ हूँ, मेरी रक्षा कीजिये।’
इस प्रकार स्नान करके बाहर निकले और भगवान् शंकरका दर्शन करके मौनभावसे भगवान् नारायणके समीप जाय। मार्कण्डेयेश्वरसे दक्षिण दिशामें जो विष्णुस्वरूप उत्तम वटवृक्ष स्थित है, वह दर्शनमात्रसे पाप-राशिका नाश करनेवाला है। उसका दर्शन करके उसमें भगवान् पुरुषोत्तमकी भावना करते हुए दूरसे ही प्रणाम करे। फिर निम्नांकित मन्त्रका उच्चारण करते हुए उसकी परिक्रमा करे—
अमरस्त्वं सदा कल्प विष्णोरायतनं महत्।
न्यग्रोध हर मे पापं विष्णुरूप नमोऽस्तु ते॥
नमोऽस्त्वव्यक्तरूपाय महाप्रलयस्थायिने।
एकाश्रयाय जगतां कल्पवृक्षाय ते नमः॥
‘हे कल्पवट! आप सदाके लिये अमर हैं। भगवान् विष्णुके महान् निवासस्थान हैं। हे विष्णुरूप वट! मेरे पापको हर लीजिये, आपको नमस्कार है। आप अव्यक्तस्वरूप, महाप्रलय कालमें भी स्थिर रहनेवाले, जगत्के एकमात्र आश्रय तथा कल्पवृक्ष हैं। आपको नमस्कार है।’
इस प्रकार स्तुति करके मनुष्य उस वृक्षके नीचे भक्तिपूर्वक भगवान् विष्णुके नामोंका जप करे। इससे वह सौ करोड़ जन्मोंके पापोंसे भी मुक्त हो जाता है। उसकी छायामें चलनेमात्रसे भी मनुष्यके पाप दूर हो जाते हैं। तत्पश्चात् भगवान्के वाहनरूप गरुड़जीको, जो भगवान् श्रीहरिके आगे भक्तिसे नतमस्तक होकर हाथ जोड़े खड़े हैं, प्रणाम करे। उसके बाद—
छन्दोमय जगद्धामन् यानरूप त्रिवृद्वपुः।
यज्ञरूप जगद्व्यापिन् प्रीयमाणाय ते नमः॥
‘हे गरुड़! आप छन्दोमय, जगत्के आश्रय, भगवान्के वाहनरूप, वेदत्रयीमय शरीरवाले, यज्ञरूप और विश्वव्यापी हैं। सदा प्रसन्न रहनेवाले आपको मेरा नमस्कार है।’
इस प्रकार गरुड़की स्तुति करके भगवान्के मन्दिरमें प्रवेश करे और उसकी तीन बार परिक्रमा करके मन्त्रराज आनुष्टुभसे या पुरुषसूक्तसे अथवा द्वादशाक्षर (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) मन्त्रसे—जिसमें जिसकी रुचि हो उससे, पूजन करे। पंचोपचारकी विधिसे परमेश्वर जगन्नाथजीकी पूजा करे। पूजाके पश्चात् हाथ जोड़कर इस प्रकार