संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 398, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * | ३६९ ---|---
स्तुति करे—'देवदेव जगन्नाथ! आप संसार-समुद्रसे तारनेवाले हैं। भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले जगदीश्वर! आपके चरणोंमें प्रणाम करता हूँ, आप सदा मेरी रक्षा करें। श्रीकृष्ण! आपकी जय हो। जगन्नाथ! आपकी जय हो। आप सबके पापोंका नाश करनेवाले हैं। आपके युगल चरणारविन्द विश्वके लिये वन्दनीय हैं। आपको नमस्कार है। कोटि-कोटि ब्रह्माण्डोंके ईश्वर! आपकी जय हो। वेद आपके निःश्वास वायु हैं, समस्त जगत्के आधारभूत परमात्मन्! आपको नमस्कार है। प्रभो! आप शरणमें आये हुए ब्रह्मा, इन्द्र तथा रुद्र आदि देवताओं और प्रणतजनोंकी पीड़ाको दूर करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। समस्त संसारके निवासस्थान आपकी जय हो। अन्तर्यामिन्! आपको नमस्कार है। अकारण करुणासागर! दीनदयालु! आपकी जय हो। दीनों और अनाथोंको एकमात्र शरण देनेवाले विश्वसाक्षी परमेश्वर! आपको नमस्कार है। देवेश्वर! जिसमें मोहरूपी भँवर उठते हैं, जो अत्यन्त दुस्तर है, क्षुधा-पिपासा आदि छहों ऊर्मियोंके कारण जिसके दूसरे किनारेतक पहुँचना अत्यन्त कठिन है, कुकर्मरूपी ग्राहोंके कारण जो अत्यन्त भयानक दिखायी देता है, जहाँ कोई आश्रय अथवा अवलम्ब नहीं दिखायी देता, जो सर्वथा निस्सार और दुःखरूपी फेनसे युक्त है, उस संसारसमुद्रके जलमें मैं आपकी मायाके गुणोंसे आबद्ध होकर विवश अवस्थामें पड़ा हूँ। आप अपनी कृपाकटाक्षपूर्ण दृष्टिसे देखकर वहाँसे मेरा उद्धार कीजिये। सुरश्रेष्ठ! आप अपनी परम प्रसन्नताके प्रकाशक हैं। जगन्नाथ! संसारभयसे डरनेवाले जीवोंके सहायक बन्धु एकमात्र आप ही हैं। भूख और प्यास प्राणके, शोक और मोह मनके तथा जरा और मृत्यु शरीरके कष्ट हैं। ये ही संसार-सागरकी छः ऊर्मियाँ हैं। इनसे रक्षा कीजिये। भगवन्! आपकी सृष्टिमें आपके समान दीनोंका पालन करनेवाला दूसरा कोई नहीं है, अतः सब लोगोंपर कृपा करनेके लिये आप स्वयं अवतीर्ण हुए हैं। अन्यथा आप पूर्णकाम परमेश्वरके इस पृथ्वीपर आनेका और क्या कारण हो सकता है? जगत्पते! आपके चरणकमलोंकी शरणमें आ जानेसे कोई चिन्ता नहीं रह जाती, क्योंकि आपके चरणारविन्द चारों पुरुषार्थोंके एकमात्र साधक हैं—दर्शनमात्रसे सबके समस्त मनोवांछित फल देनेवाले हैं।'
तदनन्तर शेषसम्बन्धी मन्त्रसे भगवान् बलभद्रजीकी पूजा करे। द्वादशाक्षर मन्त्रसे अथवा आदिमें प्रणव लगाकर नाम मन्त्रसे भी पूजा कर सकते हैं। फिर एकाग्रचित्त होकर प्रणाम करके स्तुतिपाठके द्वारा उन्हें प्रसन्न करे—'सदा सत्पुरुषोंको सुख देनेवाले सच्चिदानन्दस्वरूप बलरामजी! आपकी जय हो। आपकी निर्मल आकृति अविद्यामय पंकसे रहित है, आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण जगत्का भार धारण करके भी कभी थकित न होनेवाले बलभद्र! आपकी जय हो। आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक—तीनों तापोंका विकर्षण (विनाश) करनेके लिये आप सदा अपने हाथमें हल लिये रहते हैं। शरणागतों और दीनोंकी रक्षाके लिये आपके नेत्र सदा खुले रहते हैं। ईश्वर! आप ही दूसरोंके समस्त पापोंका नाश करनेमें समर्थ हैं। निर्मल करुणासागर! दीनबन्धु! आपको नमस्कार है। आपने अपने फणके अग्रभागसे समस्त चराचरसहित इस पृथ्वीको धारण कर रखा है। प्रभो! जिसके पार जाना कठिन है, उस अपार भवसागरसे मेरा उद्धार कीजिये। आप पर और अपर—सबसे श्रेष्ठ हैं। परमेश्वर! आपको नमस्कार है।'
मुसलधारी नागराज बलभद्रकी इस प्रकार स्तुति करके जगत्की आदिकारणरूपा कल्याणमय नेत्रोंवाली सुभद्रा देवीकी पूजा करे। फिर चरणोंमें प्रणाम करके उन विजयस्वरूपा भगवतीको स्तुतिद्वारा इस प्रकार प्रसन्न करे—'देवि! सुभद्रे! आपकी जय हो। संसारसे पार उतारनेवाली