भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 399

३७० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

महादेवी! आप प्रसन्न होइये। शरणागतोंको सुख देनेवाली तथा सबको सन्तुष्ट करनेवाली देवि! आपकी जय हो। परमात्माके सृष्टि, पालन और संहार आदि कर्मोंकी सिद्धि करनेवाली उनकी अनुपम शक्ति एकमात्र आप ही हैं। आप ही सब लोकोंकी जननी, भगवान् विष्णुकी माया, तपस्विनी तथा भद्ररूपा सुभद्रा हैं। आपको नमस्कार करता हूँ। जगत्की मूलभूता सुभद्रा देवीको मैं प्रणाम करता हूँ।'

इसके बाद समुद्रस्नानके लिये भगवान् पुरुषोत्तमकी प्रार्थना करे—'विश्वव्यापी! चराचरस्वरूप भगवान् विष्णु! आपको नमस्कार है। प्रभो! मेरा समुद्रस्नान निर्विघ्न पूर्ण हो। शंख-चक्र-गदाधारी जगदीश्वर! मुझे स्नानके लिये आज्ञा दीजिये।' तदनन्तर भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए एकाग्रचित्त एवं मौन होकर समुद्रके समीप जाय और तीर्थराजके आत्माका चिन्तन करते हुए हाथ जोड़कर इस मन्त्रका उच्चारण करे—

सुदर्शन नमस्तेऽस्तु कोटिसूर्यसमप्रभ।
अज्ञानतिमिरान्धस्य विष्णोर्मार्गं प्रदर्शय॥

'कोटि-कोटि सूर्योंके समान प्रकाशमान सुदर्शन! आपको नमस्कार है। मैं अज्ञानान्धकारसे अन्धा हो रहा हूँ, मुझे भगवान् विष्णुका मार्ग दिखाइये।'

इस प्रकार सुदर्शनकी प्रार्थना करके तीर्थराज समुद्रके जलके समीप पृथ्वीपर घुटने टेककर भक्तिभावसे प्रणाम करे और—

तीर्थराज नमस्तुभ्यं जलरूपाय विष्णवे।
जीवनाय च जन्तूनां परं निर्वाणहेतवे॥

'हे तीर्थराज! आप जलरूपी विष्णु हैं, समस्त जन्तुओंके जीवनदाता हैं और परम शान्तिके हेतु हैं। आपको नमस्कार है।'

यह मन्त्र पढ़ते हुए जलके भीतर प्रवेश करे। समुद्रके जलमें डूबकर मन्त्र-जप करनेका विधान नहीं है। समुद्रमें स्नान करके उठे और विधिपूर्वक आचमन करके प्रार्थना करे—'जगत्पते! तीर्थराज! तुम्हें नमस्कार है। पहलेके कोटिसहस्र जन्मोंमें जिस पाप-राशिका संचय किया गया है, वह सब नष्ट हो जाय।' इस प्रकार स्नान करके तटपर आ जाय और आचमन करके मौन हो दो उज्ज्वल वस्त्र धारण करे। फिर भू-देवी और लक्ष्मी-देवीके साथ शंख-चक्र-गदाधारी चतुर्भुज भगवान् नारायणका ध्यान करके उन्हें मानसिक पूजासे सन्तुष्ट करे। तत्पश्चात् बाहर आवाहन करके भी पूजा करे, जिसकी विधि इस प्रकार है—भगवान्के लिये भावनाद्वारा रत्नसिंहासन देकर यह चिन्तन करे कि भगवान् इसपर विराजमान हैं। फिर उनके दोनों चरणारविन्दोंमें पाद्य निवेदन करे। वह पाद्य श्यामाक, कमल, दूर्वा और अपराजिता लतासे युक्त हो तथा मूलमन्त्रसे उसका संस्कार किया गया हो। पाद्य अर्पण करनेके पश्चात् सोने, चाँदी, ताँबे अथवा शंखके पात्रमें जल, चन्दन, फूल, यव, दूर्वा, कुशाग्र, फल, सरसों और तिलसे विधिपूर्वक अर्घ्यका संस्कार करे। दूर्वा और कुशके अग्रसे अर्घ्य करे। जल लेकर भगवान्के मस्तकपर सींचे। फिर बचे हुए जलको उन्हींके आगे पृथ्वीपर गिरा दे। यह अर्घ्यकी विधि बतायी गयी। उसके बाद जायफल, कंकोल और लवंगसे संस्कार किये हुए जलको भगवान्के आचमनके लिये दे। पुनः अपनी शक्तिके अनुसार पाट, रेशम अथवा कपासके बने हुए दो वस्त्र अर्पण करने चाहिये। फिर यथाशक्ति हार, केयूर, मुकुट और कण्ठा आदि आभूषण भगवान्के अंगोंमें पहनावे। सूतके बने हुए यज्ञोपवीतको गन्ध एवं चन्दनसे चर्चित करके अर्पण करे। तत्पश्चात् कपूर, चन्दन, कस्तूरी और कुंकुमसे अनुलेपन करे। चमेली, कमल, चम्पा, अशोक, पुन्नाग, नागकेसर तथा अन्य सुगन्धित पुष्पोंसे बनी हुई माला अथवा माल्य