भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३७१

और तुलसीदलकी माला पहनावे तथा कुछ छूटे फूल भी भगवान्‌के मस्तकपर बिखेरे। जो गलेसे लेकर पैरोंतक लंबी हो, उसका नाम माला है और जिसकी लंबाई कण्ठसे लेकर जंघातक हो, उसे माल्य कहते हैं। जो केशोंके मध्यमें पहनाया जाय, वह गर्भक कहा गया है। उसके बाद मस्तकपर पुष्पांजलि बिखेरनी चाहिये। पुष्पांजलिके पश्चात् गुग्गुल, अगुरु, खस, शक्कर, घी, मधु और चन्दनके द्वारा सुगन्धित धूप तैयार करके दे। उसके बाद गायके घीसे सुन्दर दीप जलाकर दे अथवा कर्पूरयुक्त बत्तीके साथ तिलके तेलसे दीपक जलाकर दे। तदनन्तर घीमें तैयार किया हुआ सुगन्धित अन्न, गायका दही, गायके दूधमें पकाकर शक्कर मिलाया हुआ केला, नाना प्रकारके व्यंजनोंसे युक्त पूआ और भाँति-भाँतिके फल—इन सबके सहित मनोरम सुगन्धयुक्त सरस एवं नूतन नैवेद्य तैयार करके भगवान्‌को समर्पित करे। धूप, दीप, नैवेद्य, स्नान, अर्घ्य, मधुपर्क, वस्त्र तथा यज्ञोपवीत—इनमेंसे प्रत्येकके अर्पण करनेपर भगवान्‌को आचमन करावे। अन्य कर्मोंमें आचमनके लिये केवल जल देना चाहिये। परंतु नैवेद्यके अन्तमें संस्कार किया हुआ उपचारयुक्त आचमन देना चाहिये। साथ ही करोद्वर्तनके लिये सुगन्धित चन्दन भी देना चाहिये। उसके बाद कपूर, लवंग, इलायची, जायफल और सुपारीके साथ ताम्बूल अर्पण करे। तत्पश्चात् एक सौ आठ बार मूल मन्त्रका जप करके अनन्य भावसे स्तुतिपाठ करे। फिर प्रदक्षिणा करके भगवान् पुरुषोत्तमकी प्रार्थना करे—‘समस्त तीर्थोंके प्रवर्तक देवाधिदेव जगन्नाथ! आप सर्वतीर्थमय तथा सर्वदेवमय हैं। पापकी राशिमें डूबे हुए मुझ सेवककी रक्षा कीजिये। आपको नमस्कार है।'

इस प्रकार देवेश्वर भगवान् नारायणकी पूजा करके तीर्थराज समुद्रमें स्नान करनेवाला मनुष्य सब तीर्थोंका फल पाता है। कोटि गोदानसे, कोटि यज्ञसे, कोटि ब्राह्मणभोजनसे तथा कोटि महादानोंसे कर्म करनेवालोंके लिये जो पुण्य बताया गया है, वह इस समुद्रस्नानपूर्वक भगवत्-पूजनसे प्राप्त हो जाता है। अन्य तीर्थोंमें किया हुआ पाप समुद्रके किनारे नष्ट होता है और समुद्रके किनारे किया हुआ पाप समुद्रमें स्नान करनेसे नष्ट होता है। ब्रह्महत्यारा, शराबी, गोघाती आदि पाँच प्रकारके महापातकी मनुष्य भी समुद्रस्नान करनेसे निःसन्देह उन पापोंका प्रायश्चित्त कर लेते हैं। जो मनुष्य अपने जन्म, जीवन और शास्त्राध्ययनको सफल बनाना चाहे वह समुद्रतटपर आकर देवताओं और पितरोंका तर्पण अवश्य करे। कृच्छ्र और चान्द्रायण आदि तप सुलभ हैं, बहुत दक्षिणावाले अग्निष्टोम आदि यज्ञ भी सुलभ हैं, परंतु सिन्धुके जलसे पितरोंका तर्पण अत्यन्त दुर्लभ है। स्नानके आदि और अन्तमें जगन्नाथजीका पूजन और बीचमें तीर्थराजके जलमें स्नान करके मनुष्य मोक्षका भागी होता है। तदनन्तर शुद्ध चित्तवाला मनुष्य श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्राको नमस्कार करके उनके स्वरूपका चिन्तन करे।


इन्द्रद्युम्न-सरोवरमें स्नान, नृसिंहजीका दर्शन-पूजन तथा भगवद्विग्रहोंके ज्येष्ठ-स्नानका वर्णन

जैमिनिजी कहते हैं— इसके बाद अपनेको कृतार्थ मानता हुआ मनुष्य अश्वमेध यज्ञके अंगसे उत्पन्न हुए इन्द्रद्युम्न-सरोवरके समीप जाय। उसीके तटपर नृसिंहका स्वरूप धारण करनेवाले भगवान् श्रीहरि निवास करते हैं। वहाँ नृसिंहजीकी प्रार्थना करके विधिपूर्वक स्नान करे। प्रार्थना इस प्रकार