भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३७२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


है—'हे भगवान् नृसिंह! आपको नमस्कार है। आपके उत्तम क्षेत्रमें आपके ही प्रसादसे नृपश्रेष्ठ इन्द्रद्युम्नने एक सहस्र अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान किया था। प्रभो! उस यज्ञके अंगसे प्रकट हुए इस सरोवरमें स्नान करनेके लिये मुझे आज्ञा दीजिये।'

इस प्रकार भगवान्‌की प्रार्थना करनेके पश्चात् सरोवरके किनारे जाकर हाथ धो आचमन करके अंजलि बाँधे प्रार्थना करे—'हे तीर्थप्रवर! अश्वमेध यज्ञके अंगभूत दानके लिये लायी हुई करोड़ों गौओंके खुरसे आपकी भूमि खोदी गयी है। उन गौओंके मूत्र, फेन और दानके जलसे परिपूर्ण होनेके कारण आप सबको पवित्र करनेवाले हैं। मैं आपके सर्वतीर्थमय पवित्र जलमें स्नान करनेके लिये आया हूँ। आप स्नानसे मेरे सब पापोंको छुड़ा दीजिये।'

तत्पश्चात् स्नान करे। जलके भीतर डुबकी लगाकर तीन बार अघमर्षण मन्त्रका जप करे। उसके बाद पुनः तीर्थकी प्रार्थना करे—'अश्वमेधके अंगसे प्रकट हुए सर्वपापनाशक तीर्थ! तुममें स्नान करनेसे मेरे पाप नष्ट हो जायँ।' इस प्रकार तीन बार कहकर तीन बार जलमें गोता लगावे। नृसिंहाकारधारी भगवान् विष्णुका स्मरण करे। देवताओं, ऋषियों और पितरोंका विधिपूर्वक तर्पण करे। फिर पश्चिमाभिमुख विराजमान भगवान् नृसिंहके समीप जाय और अथर्ववेदके मन्त्रसे उनकी पूजा करे। वह अथर्ववेदोक्त मन्त्रराज पूर्वकालमें नारदजीके द्वारा प्रतिष्ठित हुआ। तत्पश्चात् राजा इन्द्रद्युम्नने दीर्घकालतक उस मन्त्रकी उपासना की। नृसिंहाकार भगवान्‌की उपासनाके लिये उसके समान दूसरा मन्त्र नहीं है। उसके उच्चारणमात्रसे भगवान् नृसिंह प्रसन्न हो जाते हैं। ब्रह्माजीने इसी मन्त्रसे काष्ठविग्रहधारी जगदीशजीकी भी स्थापना की है। पूर्वोक्त उपचारोंसे तथा लाल जवापुष्प और अन्यान्य सुगन्धित पुष्पोंसे भगवान् नृसिंहकी पूजा करे। मिश्री और गायका घी मिलाकर गोदुग्धमें तैयार की हुई खीर, घीमें पकाकर बनाये हुए खाँड़ और कपूरसे युक्त मोदक, संयाव (हलवा), घीमें बने हुए पूए, नाना प्रकारके फल, शक्कर और दही मिलाये हुए चावल आदि नैवेद्य निवेदन करे। भगवान् नृसिंहका दर्शन, चरणस्पर्श, नमस्कार और पूजन करके मनुष्य अपने-अपने मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है।

फिर पूर्णिमाको प्रातःकाल पूर्वोक्त विधिसे तीर्थराजके जलमें स्नान करके शुद्ध आहारका सेवन तथा इन्द्रियोंका संयम करते हुए मनुष्य भगवत्प्रीतिकाके लिये पाँच दिनोंतक केवल एक समय भोजन करे। तत्पश्चात् मन्दिरमें प्रवेश करके मंचपर विराजमान पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्राजीका दर्शन करके मनुष्य पापसे मुक्त हो जाता है। जो ज्येष्ठकी अमावास्याको सर्वतीर्थमय कूपसे लाये हुए सुगन्धित जलके द्वारा स्नान कराये जाते हुए श्रीहरिका दर्शन करता है, उसके तन-मनमें पापका सम्पर्क नहीं रहता।

चतुर्दशीको तृण अथवा काष्ठका सुदृढ़ एवं सुन्दर मंच बनवाकर हरी-हरी घासवाली भूमिपर स्थापित करे। उसके ऊपर सुन्दर चंदोवा लगाकर उसे भलीभाँति सजा दे। नाना प्रकारकी मणियोंकी मालासे बन्दनवार बनावे। इस प्रकार मंचको स्थापित करके उसके दक्षिण भागमें कुएँसे जल निकालकर कलशोंमें भरकर शास्त्रोक्त विधिसे उन्हें शालाके भीतर रखे। फिर उन कलशोंमें पावमानी ऋचाके द्वारा सुवासित जल भरे। यह कर्म चतुर्दशीकी आधी रातमें करनेयोग्य बताया गया है। तदनन्तर धीरे-धीरे भगवान् बलभद्र और श्रीकृष्णको राजासे सम्मानित ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ले जायँ। चँवर और ताड़के पंखेसे उनपर निरन्तर हवा करते रहें। भगवान्‌के शरीरपर जो पहले किया हुआ कच्चा लेप हो, उसे न छुड़ावे। जिस प्रकार सुगन्धित लेपसे प्रतिदिन भगवान्‌का अंग पुष्ट हो, वैसा प्रयत्न करे। भगवान्‌को ले