संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * | ३७३ ---|---
जानेवाले मनुष्य सावधान और सदाचारी हों। उन्हें ले जाकर मंचपर विराजमान करें। फिर शान्तिपूर्वक अधिवासित कलशोंके जलसे समुद्रज्येष्ठा मन्त्रके द्वारा भगवद्विग्रहोंको स्नान करावे। यह स्नान दर्शन करने तथा अभिषेक करनेवाले मनुष्योंको कृतकृत्य करनेवाला है। जो मनुष्य वहाँ खड़े होकर प्रसन्नतापूर्वक भगवान्के ज्येष्ठस्नान और यात्राका उत्कण्ठित चित्तसे दर्शन करते हैं, वे संसारसमुद्रमें नहीं गिरते। श्रीहरिके इस स्नानका दर्शन करनेवाले पुरुषोंकी जान-बूझकर या अनजानमें की हुई | अनादिसंचित पापराशि तत्काल नष्ट हो जाती है। स्नान-दर्शन करनेमें जो पुण्य बताया गया है, वही मंचपर विराजमान श्रीहरिका दर्शन करनेसे भी प्राप्त होता है। ब्राह्मणो ! वहाँ एक ही जगन्नाथजी तीन विग्रहोंमें स्थित हैं। उनमेंसे एक-एकका भी स्नान-दर्शन; भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला है। जो भगवान्के स्नानके समय 'जय रामभद्र ! जय सुभद्रे ! जय कृष्ण ! जय जगन्नाथ !' इस प्रकार प्रसन्नतापूर्वक उच्चारण करता है, वह मोक्षको प्राप्त होता है।
<div align="center">~~~~~</div>श्रीजगन्नाथजीकी रथयात्रा, गुण्डिचा-महोत्सव तथा पुनः मन्दिरप्रवेश सम्बन्धी यात्रा एवं उत्सवकी महिमा
जैमिनिजी कहते हैं—तदनन्तर श्रद्धासे युक्त प्रस्तुत किये हुए उपचारोंद्वारा बलभद्र, श्रीकृष्ण और सुभद्राजीका पूजन करे। उसके बाद जैसे पहले मन्दिरसे ले आते समय उत्सव किया गया था, उसी प्रकार महान् उत्सव करके उन सब भगवत्स्वरूपोंको पुनः दक्षिणाभिमुख ले जाय। उस समय जो मनुष्य दक्षिणाभिमुख जाते हुए श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्राका दर्शन करता है, वह स्नान-दर्शनजनित समस्त पुण्य-फलको प्राप्त करता है। मन्दिरके समीप पहुँचनेपर बलभद्र और सुभद्राके साथ जगन्नाथजीकी आरती उतारकर मन्दिरके भीतर प्रवेश करावे और फिर किसी प्रकार उन्हें न देखे।<br><br>ज्येष्ठ मासके शुक्लपक्षमें जो पूर्णिमा आती है, उसमें ज्येष्ठा नक्षत्रके एक ही अंशमें चन्द्रमा और बृहस्पति हों, बृहस्पतिका ही दिन हो और शुभ योग भी हो तो वह महाज्येष्ठी पूर्णिमा कहलाती है, जो सब पापोंका नाश करनेवाली है। महाज्येष्ठी पूर्णिमा महापुण्यमयी तथा भगवान्की प्रीतिको बढ़ानेवाली है। उसमें करुणासिन्धु देवेश्वर जगन्नाथजीका पूजन और | उनके स्नानका दर्शन करके मनुष्य पापराशिसे मुक्त हो जाता है।<br><br>वैशाखके शुक्लपक्षमें जो पापनाशिनी तीज आती है, उसमें रोहिणी नक्षत्रका योग होनेपर राजा पवित्रभावसे संकल्पपूर्वक एक आचार्यका वरण करे। फिर जिन्होंने काष्ठ कर्म देखा और जाना हो, ऐसे एक या तीन बढ़इयोंसे पूर्वोक्त प्रकारसे श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्राजीके लिये तीन रथ तैयार करावे, जिनमें बैठनेके लिये सुन्दर आसन हों और जो सुन्दर कलापूर्ण ढंगसे बनाये गये हों। रथोंका निर्माण हो जानेपर राजा शास्त्रोक्त विधिसे मन्त्रके अनुसार पूर्ववत् उनकी प्रतिष्ठा करे। मार्गका भलीभाँति संस्कार करावे। मार्गके दोनों ओर फूलोंके गुच्छे, माल्य, सुन्दर वस्त्र, चँवर, गुल्मलता आदि और फूलोंके द्वारा मण्डल बनावे। देखनेपर ऐसा मालूम हो कि वहाँ सुन्दर फूलोंसे सुशोभित वन-पंक्ति शोभा पा रही है। रास्तेकी भूमि बराबर कर देनी चाहिये। वहाँ कीचड़ नहीं रहना चाहिये, जिससे भगवान्का रथ सुखपूर्वक चल सके। पग-पगपर रास्तेके दोनों पाश्र्वोंमें दिशाओंको सुगन्धित करनेवाले धूपपात्र