संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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रखे जायँ। सड़कपर चन्दनके जलका छिड़काव हो। नगाड़ा और ढक्का आदि बाजे बजाये जायँ। सोने-चाँदीके ध्वज, जिनके बीचमें चित्रकारी की गयी हो, लगाये जायँ और उनपर पताकाएँ फहराती रहें। भूमिपर बहुत-सी वैजयन्ती मालाएँ बिछी हों। अनेकों कसे-कसाये हाथी-घोड़े प्रस्तुत किये जायँ, जिनका भलीभाँति श्रृंगार किया गया हो। इस प्रकार सामग्री एकत्र करके उत्तम भक्तिसे युक्त राजा महान् उत्सव करे।
आषाढ़के शुक्लपक्षमें पुष्य नक्षत्रसे युक्त द्वितीया तिथि आनेपर उसमें अरुणोदयके समय भगवान्की पूजा करे। ब्राह्मणों, वैष्णवों, तपस्वी और यतियोंके साथ स्वयं भी हाथ जोड़कर राजा देवाधिदेव भगवान्से यात्राके लिये निवेदन करे— ‘प्रभो! आपने पूर्वकालमें राजा इन्द्रद्युम्नको जैसी आज्ञा दी है उसके अनुसार रथसे गुण्डिचामण्डपके प्रति विजययात्रा कीजिये। आपकी कृपा-कटाक्षपूर्ण दृष्टिसे दसों दिशाएँ पवित्र हों तथा स्थावर-जंगम समस्त प्राणी कल्याणको प्राप्त हों। आपने यह अवतार लोगोंके ऊपर दयाकी इच्छासे ग्रहण किया है। इसलिये भगवन्! आप प्रसन्नतापूर्वक पृथ्वीपर चरण रखकर पधारिये।’
इसके बाद कुछ लोग मंगलगीत गावें। कोई जय-जयकार करें और ‘जितं ते पुण्डरीकाक्ष०’ इत्यादि मन्त्रका उच्च स्वरसे जप करें। सूत, मागध आदि हर्षमें भरकर भगवान्के पवित्र यशका गान करें। भगवान्के दोनों पार्श्वमें सुवर्णमय दण्डसे सुशोभित व्यजनोंकी पंक्ति धीरे-धीरे डुलती रहे। कृष्णागरुकी धूपसे सम्पूर्ण दिशाएँ और वहाँका आकाश सुवासित रहे। झाँझ, करताल, वेणु, वीणा, माधुरिका आदि वाद्य गोविन्दकी इस विजययात्राके समय मधुर स्वरसे बजते रहें। इस प्रकार उत्सव आरम्भ होनेपर बलभद्र, श्रीकृष्ण और सुभद्राको ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य लोग धीरे-धीरे पैर रखते हुए ले जायँ। बीच-बीचमें रूईदार बिछौनोंपर उन्हें विश्राम करावें और इस प्रकार उन सबको रथपर ले जायँ। फिर उस उत्तम रथको घुमाकर बलभद्र, कृष्ण तथा सुभद्राको सुन्दर चँदोवायुक्त मण्डपसे सुशोभित रथमें विराजमान करें। उन सबको रूईदार गद्दोंपर बैठाकर भक्तिपूर्वक भाँति-भाँतिके वस्त्र, आभूषण और मालाओंसे विभूषित करें। नाना प्रकारके उपचारोंसे उनकी पूजा भी करें। उस समय रथपर विराजमान होकर यात्रा करते हुए श्रीजगन्नाथजीका जो लोग भक्तिपूर्वक दर्शन करते हैं, उनका भगवान्के धाममें निवास होता है। भगवान् श्रीहरिके उस उत्सवका माहात्म्य क्या बतलाऊँ। जिनके नामका संकीर्तन करनेमात्रसे सौ जन्मोंका पाप नष्ट हो जाता है, रथमें स्थित हो महावेदीकी ओर जाते हुए उन पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्राजीका दर्शन करके मनुष्य अपने करोड़ों जन्मोंके पापोंका नाश कर लेता है। मेघोंके द्वारा जलकी वर्षाके संयोगसे रथका मार्ग जब कीचड़युक्त हो जाता है, उस समय भी वह श्रीकृष्णकी दिव्यदृष्टि पड़नेसे समस्त पापोंका नाश करनेवाला होता है। उस पंकिल रथमार्गमें जो उत्तम वैष्णव भगवान्को साष्टांग प्रणाम करते हैं, वे अनादिकालसे अपने ऊपर चढ़े हुए पापपंकको त्याग कर मुक्त हो जाते हैं। जो भगवान् वासुदेवके आगे जय शब्दका उच्चारण करते हुए स्तुति करते हैं, वे भाँति-भाँतिके पापोंपर निःसन्देह विजय पा जाते हैं। जो श्रेष्ठपुरुष वहाँ नृत्य करते और गाते हैं, वे उत्तम वैष्णवोंके संसर्गसे मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। जो भगवान्के नामोंका कीर्तन करता हुआ उस यात्रामें साथ-साथ जाता है तथा गुण्डिचा नगरको जाते हुए श्रीकृष्णकी ओर देखकर भक्तिपूर्वक ‘जय कृष्ण, जय कृष्ण, जय कृष्ण’ का उच्चारण करता है, वह माताके गर्भमें निवास करनेका दुःख कभी नहीं भोगता। जो मनुष्य रथके आगे खड़ा होकर चँवर, व्यजन, फूलके गुच्छों अथवा वस्त्रोंसे भगवान् पुरुषोत्तमको हवा करता है, वह