भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 404, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 404
  • वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३७५

ब्रह्मलोकमें जाकर मोक्ष पाता है। जो पवित्र सहस्रनामका पाठ करते हुए रथकी प्रदक्षिणा करते हैं, वे भगवान् विष्णुके समान होकर वैकुण्ठधाममें निवास करते हैं। जो मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णके उद्देश्यसे दान देता है, उसका वह थोड़ा भी दान मेरुदानके समान अक्षय फल देनेवाला होता है। जो भगवान्‌के आगे रहकर उनके मुखारविन्दका दर्शन करते हुए पग-पगपर प्रणाम करते हैं और मार्गकी धूलि या कीचड़में लोटते हैं, वे क्षणभरमें मुक्तिरूपी फलको पाकर श्रीविष्णुके उत्तम धाममें जाते हैं।

इस प्रकार बलभद्र और सुभद्राके साथ भगवान् श्रीकृष्ण उत्तम रथपर विराजमान हो चारों दिशाओंको प्रकाशित करते हुए और अपने अंगोंका स्पर्श करके बहनेवाली वायुके द्वारा समस्त देहधारियोंके पापोंका नाश करते हुए यात्रा करते हैं। वे बड़े दयालु और भक्तोंके पालक हैं। जो अज्ञानी और अविश्वासके पात्र हैं, उनके मनमें भी विश्वास उत्पन्न करनेके लिये भगवान् विष्णु प्रतिवर्ष यात्रा प्रारम्भ करते हैं।

इस प्रकार गुण्डिचा नगरमें जाकर भगवान् बिन्दुतीर्थके तटपर सात दिन निवास करते हैं; क्योंकि प्राचीन कालमें उन्होंने राजा इन्द्रद्युम्नको यह वर दिया था कि 'मैं तुम्हारे तीर्थके किनारे प्रतिवर्ष निवास करूँगा। मेरे वहाँ स्थित रहनेपर सभी तीर्थ उसमें निवास करेंगे। उस तीर्थमें विधिपूर्वक स्नान करके जो लोग सात दिनोंतक गुण्डिचामण्डपमें विराजमान मेरा, बलरामका और सुभद्राका दर्शन करेंगे, वे मेरा सायुज्य प्राप्त कर लेंगे।' अतः परम पवित्र, सर्वपापनाशक, अकेले ही सब तीर्थोंका फल देनेवाले तथा श्रीविष्णुकी प्रसन्नता बढ़ानेवाले उस शुभ तीर्थमें स्नान करके पितरों और देवताओंका विधिपूर्वक तर्पण करनेके पश्चात् जो तटवर्ती नृसिंह भगवान्‌का दर्शन, पूजन और उन्हें नमस्कार करता है तथा पुनः महावेदीके समीप जाकर पूर्ववत् भक्तिपूर्वक भगवान्‌का पूजन और वन्दन करता है, वह पुरुष हो या स्त्री, उसे भगवान् विष्णुकी सायुज्यमुक्ति प्राप्त हो जाती है।

मघा नक्षत्र पितरोंका है, अतः वह पितरोंको अधिक प्रीति प्रदान करनेवाला है। उस नक्षत्रमें पुत्रोंद्वारा दिया हुआ श्राद्धका दान पितरोंको विशेष तृप्त करता है। उक्त सर्वतीर्थमय सरोवरके तटपर भगवान् विष्णुके समीप नृसिंह और नीलकण्ठके मध्यवर्ती अतिपवित्र स्थानमें यदि मनुष्य श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करे तो अपनी सौ पीढ़ियोंका उद्धार करता है। आषाढ़के शुक्ल पक्षमें पंचमी तिथि, मघा नक्षत्र और जगन्नाथजीका महावेदीपर आगमन—ये तीनों योग यदि इन्द्रद्युम्न-सरोवरपर प्राप्त हों तो वह पितरोंको अक्षय प्रीति देनेवाला चतुष्पादयोग माना गया है। भाद्रपद मासकी अमावास्याको अथवा चारों युगादि तिथियोंमें जो पितरोंके उद्देश्यसे अश्वमेधांग-सम्भूत इन्द्रद्युम्न-सरोवरपर श्राद्ध करता है, उसका किया हुआ वह श्राद्ध सब पापोंका नाश करनेवाला है। सात दिनोंतक मौनभावसे तीनों काल स्नान करे और तीनों संध्याओंमें