भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३७६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

कलशपर भक्तिपूर्वक भगवान्‌की पूजा करे। गायके घी अथवा तिलके तेलसे दीपक जलावे और उसे भगवान्‌के आगे रखकर रात-दिन उसकी रक्षा करे। दिनमें मौन रहे और रातमें जागरण करके भगवत्सम्बन्धी मन्त्रका जप करे। इस प्रकार सात दिन बिताकर आठवें दिन प्रातःकाल उठकर प्रतिष्ठा करावे। इस व्रतराजका विधिपूर्वक पालन करके मनुष्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंको अपनी रुचिके अनुसार प्राप्त करता है।

सात दिनोंतक वहाँ रथकी भलीभाँति रक्षा करके आठवें दिन उन सब रथोंको पुनः दक्षिणाभिमुख कर दे और वस्त्र, माला, पताका तथा चँवर आदिसे उनकी पुनः सजावट करे। आषाढ़ शुक्ला नवमीको प्रातःकाल उन सब भगवद्विग्रहोंको रथपर विराजमान करे। भगवान् विष्णुकी यह दक्षिणाभिमुख यात्रा अत्यन्त दुर्लभ है। भक्ति और श्रद्धासे युक्त मनुष्योंको इस यात्रामें प्रयत्नपूर्वक भाग लेना चाहिये। जैसे पहली यात्रा है उसी प्रकार यह दूसरी भी है। दोनों ही मोक्षदायिनी हैं। यात्रा और मन्दिरप्रवेश—ये दोनों मिलाकर भगवान्‌का एक ही उत्सव माना गया है। यह पूरी यात्रा नौ दिनकी होती है। जिन लोगोंने तीन अंगोंवाली इस यात्राकी पूर्णतः उपासना की है, उन्हींके लिये यह महावेदी महोत्सव सम्पूर्ण फल देनेवाला होता है। गुण्डिचामण्डपसे रथपर बैठकर दक्षिण दिशाकी ओर आते हुए श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्राका जो दर्शन करते हैं, वे मोक्षके भागी होते हैं, अर्थात् भगवान्‌के वैकुण्ठधाममें जाते हैं।

मुनिवरो! इस प्रकार मैंने तुमसे महावेदी महोत्सवका वर्णन किया, जिसके कीर्तनमात्रसे मनुष्य निर्मल हो जाता है। जो प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर इस प्रसंगका पाठ करता है अथवा सावधान होकर सुनता है और भगवत्प्रतिमाका चित्र लेकर भी उसे रथपर बैठाकर भक्तिभावसे इस रथयात्राको सम्पन्न करता है, वह भी भगवान् विष्णुकी कृपासे गुण्डिचामहोत्सवके फलस्वरूप वैकुण्ठधाममें जाता है।

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पुरुषोत्तमक्षेत्रमें चातुर्मास्यकी महिमा, राजा श्वेतपर भगवत्कृपा तथा भगवत्प्रसादका माहात्म्य

जैमिनिजी कहते हैं—सूर्यके कर्क राशिपर रहते हुए आषाढ़ शुक्ला एकादशीसे लेकर कार्तिक शुक्ला एकादशीतक वर्षाकालिक चार महीनोंमें भगवान् विष्णुका शयन होता है। यह श्रीहरिकी आराधनाका परम पवित्र समय है। वर्षाके चार महीनोंमें जितने दिन मनुष्य जनार्दनके समीप रहकर व्यतीत करता है, उतने समयतक वह प्रतिदिन अश्वमेधयज्ञके फलका भागी होता है। समुद्रके पवित्र जलमें स्नान करके श्रीपुरुषोत्तमका दर्शन करते हुए चातुर्मास्य व्रतका पालन करना मुक्तिका साधन माना गया है। इसलिये मनुष्य बड़े यत्नसे पुण्यमय पुरुषोत्तमक्षेत्रमें निवास करे। चातुर्मास्यमें भगवान् शेषशय्यापर शयन करते हैं। आठ महीने पुरुषोत्तमक्षेत्रमें निवास करके प्रतिदिन भगवान् विष्णुका दर्शन करनेसे मनुष्य जिस फलको पाता है, उसीको चातुर्मास्यमें एक दिनके निवास और दर्शनसे प्राप्त कर लेता है। जो सब प्रकारके पापोंमें आसक्त, सम्पूर्ण सदाचारोंसे भ्रष्ट तथा समस्त धर्मोंसे बहिष्कृत हो, वह भी पुरुषोत्तमक्षेत्रमें निवास करे। जो दूध पीकर अथवा शाकाहार करके यहाँ चातुर्मास्य व्यतीत करता है, वह यहाँ प्रचुर सुख भोगकर अन्तमें परम शान्तिको प्राप्त होता है। देवाधिदेव भगवान्‌की प्रसन्नताके लिये मनुष्य यहाँ भीष्मपंचक नामक उत्तम व्रतका पालन करे और जंगली फल-मूल खाकर रहे। यह व्रत भगवान्‌की प्रसन्नताको