भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 394
  • वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३६५

उठे। उन्होंने नारद आदि ऋषियों तथा विद्वान् ब्राह्मणोंके साथ स्वयं स्वस्तिवाचन किया। ब्राह्मणलोग वैदिक सूक्तोंका पाठ करने लगे। भाँति-भाँतिके मंगल वाद्य बजने लगे। उस समय सबने रथके समीप जाकर सीढ़ियोंके मार्गसे सावधानीके साथ भगवद्विग्रहोंको उतारा। दोनों बगलमें, भुजाओंमें, मस्तकपर तथा दोनों चरणोंमें हाथ लगाकर लोग धीरे-धीरे भगवान् नारायणको रूईदार गद्देपर विश्राम कराते हुए मन्दिरके समीप ले गये। ऊपर-ऊपरसे पारिजात पुष्पोंकी वर्षा होने लगी। ब्रह्माजी इस प्रकार स्तुति करने लगे—'जगन्नाथ श्रीकृष्ण! आपकी जय हो। सब पापोंका नाश करनेवाले प्रभो! आपकी जय हो। लीलासे काष्ठ-विग्रह धारण करनेवाले नारायण! आपकी जय हो। सबको मनोवांछित फल देनेवाले माधव! आपकी जय हो। संसार-सागरमें डूबे हुए जीवोंका लीलापूर्वक उद्धार करनेवाले अविनाशी परमेश्वर! आपकी जय हो, जय हो। करुणासागर! आपकी जय हो। दीनोद्धार-परायण! आपकी जय हो। अच्युत! अनन्त! ईशान! आपकी जय हो, जय हो, जय हो। प्रभो! आपको नमस्कार है।' यह स्तुति होते समय नारदजी बड़ी प्रसन्नताके साथ वीणा बजाते थे। भगवान्‌के मस्तकपर पीछेकी ओरसे दो रत्नमय छत्र लगाये गये। दोनों पार्श्वभागमें चामरग्राही देवता पंक्तिबद्ध खड़े थे, जो धीरे-धीरे चँवर डुला रहे थे। इसी प्रकार सब लोग बड़े कौतूहलके साथ बलभद्र, सुभद्रा तथा सुदर्शन चक्रके विग्रहोंको भी ले गये। मन्दिरके मुख्यद्वारपर रत्नमय स्तम्भोंसे सुशोभित मण्डप तैयार किया गया था। उसमें अभिषेकके लिये भगवान्‌को पधराया गया। उन सब विग्रहोंके सामने दर्पण रख दिये गये। फिर रत्नोंके कलशोंमें रखे हुए तीर्थोंके जलसे क्रमशः पुरुषसूक्त और श्रीसूक्त पाठ करते हुए स्वयं ब्रह्माजीने लोकशिक्षाके लिये अभिषेक किया। तत्पश्चात् अलंकार धारण कराकर भगवद्विग्रहोंको गन्ध और माला आदिसे सुशोभित करके ब्रह्माजीने स्वयं ही आरती उतारी और मन्त्र पढ़ते हुए उन सब विग्रहोंको रत्नमय सिंहासनोंपर स्थापित किया।

ब्रह्माजी बोले—सम्पूर्ण जगत्‌के आधार तथा समस्त लोकोंमें प्रतिष्ठित सर्वव्यापी जनार्दन! आप इस मन्दिरमें सुस्थिर भावसे विराजमान होइये। यह प्रतिष्ठा सुप्रतिष्ठा हो। नाथ! आपके प्रतिष्ठित होनेपर हम सब यहाँ प्रतिष्ठित होंगे। आपकी आज्ञा और आपके प्रसादसे यह प्रतिष्ठा परिपूर्ण हो।

इस प्रकार जगन्नाथकी स्थापना करके ब्रह्माजीने उनके हृदय-कमलका स्पर्श करते हुए आनुष्टुभ मन्त्रराज*का एक सहस्र जप किया। वैशाखमासके शुक्ल पक्षमें अष्टमी तिथिको पुष्य नक्षत्रके योगमें उत्तम बृहस्पतिके दिन भगवान् जगन्नाथकी प्रतिष्ठा की गयी। इसलिये वह दिन परम पवित्र एवं सब पापोंका नाश करनेवाला है। उसमें किया हुआ स्नान, दान, तप, होम आदि सब पुण्यकार्य अक्षय होता है। जो मनुष्य उस दिन भक्तिभावसे भगवान् श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्राजीका दर्शन करते हैं, वे निःसन्देह मोक्षके भागी होते हैं। वैशाखमासमें जो शुक्ल पक्षकी अष्टमी आती है, उसमें यदि बृहस्पतिवार और पुष्य नक्षत्रका योग हो तो उस दिन किया हुआ जगन्नाथजीका पूजन कोटि जन्मोंके पापोंका नाश करनेवाला होता है।

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* मन्त्रराज आनुष्टुभ इस प्रकार है—
उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम् ॥