संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३८३
तेजसे सम्पूर्ण जगत्को आच्छादित करनेवाले हैं, उनका भी वसन (आच्छादन) करनेसे तुम्हारा नाम वस्त्र है। तुम जगदीश्वरके वासस्थानमें निवास करो।' तत्पश्चात् चन्दन और पुष्पसे भगवान्का पूजन करे और नृत्य-गीतके द्वारा जागरणपूर्वक रात्रि व्यतीत करे। फिर अरुणोदयकालमें प्रातः-सन्ध्याके समीप पूर्ववत् एकाग्रचित्त हो पुनः भगवान्की पूजा करे। उसके बाद तीन बार मन्दिरकी परिक्रमा करके भगवान्को भी तीन बार घुमावे और उस आच्छादित वस्त्रको हटाकर दर्शन आदिके द्वारा संस्कार करे। तदनन्तर दूर्वा और अक्षतसे पूजा करके भगवान्की आरती उतारे।
हेमन्त ऋतुके आनेपर जो लोग उत्तम वस्त्रोंद्वारा भगवान् नृसिंहको आच्छादित करते हैं अथवा जो आच्छादन-महोत्सवका दर्शन करते हैं वे कभी मोहसे आच्छादित नहीं होते। देवाधिदेव भगवान्के इस प्रावरण-महोत्सवका जो लोग भक्तिपूर्वक दर्शन करते हैं, वे सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्त कर लेते हैं।
पुष्यस्नानोत्सव, उत्तरायणोत्सव तथा दोलारोहणोत्सवका वर्णन
जैमिनिजी कहते हैं—पौषके महीनेमें पूर्णिमाको जब पुष्य नक्षत्र हो, तब भगवान्का पुष्यस्नानोत्सव करे। चतुर्दशीकी रातमें ८१ कलशोंका अधिवासन (स्थापन) करे। भगवान्के आगे सर्वतोभद्रमण्डल बनावे और उसके बीचमें एक बड़ा-सा दर्पण स्थापित करे। रात्रिमें गीत और नृत्य आदिके द्वारा जागरण करे। प्रातःकाल दर्पणमें प्रतिबिम्बित भगवान् पुरुषोत्तमका उपचारोंद्वारा पूजन करे। तदनन्तर पुरुषसूक्तसे कलशोंको अभिमन्त्रित करके फिर उन कलशोंके जलसे अटूट धारा गिराते हुए भगवान् पुरुषोत्तमको स्नान करावे। फिर पावमानीय सूक्त और श्रीसूक्तसे भी क्रमशः बलभद्र और सुभद्राको स्नान करावे। फिर विष्ण्गायत्रीसे* चन्दनयुक्त जलके द्वारा स्नान कराकर श्रीसूक्तसे पूजा करे। तत्पश्चात् भगवान्के श्रीअंगोंमें गन्ध और चन्दनसे लेप करे और उन्हें सुगन्धित पुष्पोंकी मालाओंसे विभूषित करे। फिर रत्नमय छत्र ऊपर उठाकर लक्ष्मीसहित पुरुषोत्तमका पूजन करे। फिर उच्चस्वरसे शंखध्वनि, मंगलगीत और नृत्य आदि हों। भगवान्को चँवर डुलाये जायें, ब्राह्मणलोग जय-जयकार करें और तीन बार अंजलिमें दूर्वा एवं अक्षत लेकर भगवान्की पूजा करके कपूरयुक्त बत्तियोंवाले गायके घीमें जलाये हुए दीपकोंसे जगन्नाथजीकी आरती करे। उसके बाद सुन्दर पानका बीड़ा लगाकर धीरे-धीरे भगवान्के मुखके समीप निवेदन करे। तत्पश्चात् आचार्यको दक्षिणा दे और ब्राह्मणोंका पूजन करे। जो प्रसन्नतापूर्वक पुष्यस्नानका पवित्र उत्सव देखते हैं, वे भगवान् विष्णुके धाममें जाते हैं।
जब भगवान् सूर्य उत्तरदिशाकी ओर गमन करनेकी इच्छासे मकर राशिपर जाते हैं, उस समय उत्तरायण प्रारम्भ होता है। उनके संक्रमणकालका आधा बीस कलाका समय परम पुण्यमय काल माना गया है। वह पितरों, देवताओं तथा ब्राह्मणोंको अत्यन्त प्रिय है। उस समय तीर्थराज समुद्रके जलमें विधिपूर्वक स्नान करके मनुष्य भगवान् नारायणका पूजन करे। कल्पवृक्षको प्रणाम करके देवमन्दिरमें प्रवेश करे और तीन बार श्रीपुरुषोत्तमकी परिक्रमा करके मन्त्रराजके
* विष्ण्गायत्री इस प्रकार है—
ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्।