संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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द्वारा उनकी पूजा करे। इसी प्रकार बलभद्र और सुभद्राका भी उन-उनके नाममन्त्रोंद्वारा पूजन करे। उत्तरायणके प्रारम्भकालमें भगवान् विष्णुका दर्शन करके मनुष्य देहबन्धनसे मुक्त हो जाता है। पूर्वकालमें महर्षि कश्यपने सृष्टिरचना करके इस महान् उत्सवको भगवान्की प्रसन्नताके लिये किया था। कश्यपजीके द्वारा चालू किये हुए इस उत्सवका जो लोग दर्शन करते हैं, वे मोक्षको प्राप्त होते हैं। मुनियो! इस उत्सवमें भी रसोईघरका और अग्निका संस्कार करना चाहिये तथा प्रतिदिन बलिवैश्वदेव करना चाहिये। अग्न्याधानपूर्वक अग्निका संस्कार हो जानेपर प्रतिदिन दिव्यरूपा भगवती लक्ष्मी अदृश्यभावसे वहाँ पहुँचकर भगवान्के भोजनके लिये स्वयं रसोई तैयार करती हैं। उत्तरायण या मकरसंक्रान्तिके उत्सवमें किये हुए स्नान, दान, तप, होम, स्वाध्याय और पितृतर्पण सब अक्षय होते हैं।
फाल्गुनमासमें भगवान्के लिये दोलारोहणका उत्तम उत्सव करना चाहिये। देवदेव श्रीविष्णुकी गोविन्द नामसे प्रसिद्ध प्रतिमा बनवाये और मन्दिरके आगे सोलह खंभोंका एक ऊँचा मण्डप तैयार करे। वह मण्डप चौकोर हो, उसमें चार दरवाजे हों और बीचमें वेदी बनी हुई हो। वेदीके ऊपर सुन्दर चाँदौवा तना हो और माल्य, चँवर तथा ध्वजा आदिसे मण्डपको सुशोभित किया गया हो। वेदीके ऊपर श्रीपर्णी (गम्भारी) काष्ठका बना हुआ भद्रासन स्थापित करे और पाँच या तीन दिनतक वहाँ फाल्गुनोत्सव मनावे। गोविन्दजीकी पूजा करके उन्हें कुछ दूरतक भ्रमण करावे। चतुर्दशीको प्रातःकाल गोविन्दजीकी सुन्दर प्रतिमा जगन्नाथजीके आगे स्थापित करके उन भगवान् पुरुषोत्तमकी पूजा करे। तत्पश्चात् गोविन्दजीकी प्रतिमाका भी पूजन करे। उसके बाद वस्त्र और माला उतारकर मन्त्रज्ञ पुरुष परम ज्योतिकी भावना करते हुए प्रतिमामें उसका न्यास (स्थापन) करे। तदनन्तर वह प्रतिमा पुरुषोत्तमरूप हो जाती है। फिर उसे रत्नमयी डोलीमें बैठाकर स्नानमण्डपमें ले जाय। वहाँ छत्र, ध्वजा, पताका, चँवर, व्यजन तथा दीपमालाओंसे बड़ा भारी उत्सव करे। उसके बाद भद्रासनपर पधराकर विभिन्न उपचारोंद्वारा गोविन्दजीकी पूजा करे। पहले महास्नानकी विधिसे उनको स्नान करावे। फिर सुगन्धित जलसे श्रीसूक्तके द्वारा अभिषेक करे। अभिषेकके पश्चात् वस्त्र, अलंकार और पुष्पहारसे भगवान्का श्रृंगार करे और पूजन-आरती करके सात बार मन्दिरकी परिक्रमा करावे। तत्पश्चात् भगवान्को डोलामण्डपमें ले आवे। मण्डपके निम्न भागमें सात बार भ्रमण करावे। फिर मण्डपके ऊर्ध्व भागमें सात बार भ्रमण कराकर स्तम्भवेदीपर भी सात बार घुमावे। उसके बाद यात्राके अन्तमें भी पुनः इसी क्रमसे इक्कीस बार भ्रमण करावे। रत्ननिर्मित हिंडोलेमें भगवान्को विराजमान करे। भगवान्के मस्तकपर सुन्दर रत्नमय मुकुट हो, वक्षःस्थलपर तारहार उनकी शोभा बढ़ा रहा हो, कानोंमें बहुमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित कुण्डल झिलमिला रहे हों। अन्य अंगोंमें भी यथायोग्य शोभा बढ़ानेवाले दिव्य आभूषणोंसे भगवान्का मनोहर श्रृंगार किया गया हो। भगवान् विकसित कमलपुष्पके मध्यमें लक्ष्मीजीके साथ बैठे हों। उनके हाथोंमें शंख, चक्र, गदा और पद्म तथा कण्ठमें वनमाला हो। मुखपर प्रसन्नता छा रही हो। सुन्दर नासिका हो। पीन वक्षःस्थलके कारण भगवान्का सौन्दर्य और भी बढ़ गया हो। ऐसी मनोहर झाँकीसे सुशोभित गोविन्दजीको डोलापर बैठाकर सब दिशाओंमें सुगन्धित चन्दनकी धूलि बिखेरते हुए उनकी पूजा करे। उस समय गोविन्दजीका ध्यान इस प्रकार करे—‘भगवान् कदम्ब वृक्षके नीचे गोपियोंके मध्यमें विराजमान हैं। गोपी और ग्वालबाल लीलापूर्वक हिंडोलेको डुला रहे हैं और भगवान् उसके भीतर बैठकर लीलारसमें निमग्न हैं।' ऐसा ध्यान करके लाल, पीले और सफेद रंगके