भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 417

३८८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


अतिशय भक्तिके साथ हाथ जोड़कर भगवान् जनार्दनकी प्रार्थना करनी चाहिये।

ब्राह्मणो! प्राचीन कालमें प्रजापति दक्षने मनुष्योंको आध्यात्मिक आदि पापोंसे अत्यन्त क्लेश उठाते देख वैशाख मासके शुक्ल पक्षमें तृतीयाको जगन्नाथजीके अंगमें चन्दनका लेप करके प्रसन्नतापूर्वक इस प्रकार स्तवन किया था—'देवदेव जगन्नाथ! आप सहज आनन्दसे परिपूर्ण एवं निर्मल हैं। परमेश्वर! संसारसागरमें डूबे हुए हम दुःखीयोंका उद्धार कीजिये। ये मनुष्य नाना प्रकारके संतापोंसे संतप्त हो रहे हैं। हे कृष्णमेघ! मुझपर कृपा करनेकी बुद्धिसे अपनी शुभ दृष्टिमयी सुधाधारासे इन सबको तृप्त कीजिये। जगदीश्वर! कलियुगके पापसे मोहित हुए मनुष्योंका उद्धार करनेके लिये ही इस नीलाचल-गुफामें आपका यह अवतार हुआ है। जय कृष्ण! जय ईशान! जय अक्षर! जय अविनाशी परमेश्वर! आप प्रसन्न होइये और इन दीन, मूढ एवं अज्ञानी मनुष्योंपर कृपा कीजिये।'

इस प्रकार स्तुति करके 'हे ईश्वर! प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये' ऐसा कहते हुए दक्ष प्रजापतिने जगन्नाथजीके चरणारविन्दोंमें दण्डवत्-प्रणाम किया। तब भगवान्‌ने स्पष्ट वाणीमें प्रजापतिसे कहा—'वत्स! उठो, मैंने तुम्हें दुर्लभ वर प्रदान किया। तुम्हारी जो अभिलाषा है, वह मेरे प्रसादसे निःसन्देह पूर्ण होगी। यह तो तुम जानते ही हो कि अल्प पुण्यवाले प्राणियोंको मेरा अनुग्रह दुर्लभ है, परंतु मेरे उत्सवसे मुझे सन्तुष्ट करके तुमने मेरी प्रार्थना की है, इसलिये मैं तुम्हें यह वर देता हूँ—'जो मनुष्य भक्तिपूर्वक अक्षय तृतीयाको इस अक्षय यात्राका दर्शन करते हैं, वे उस समय मनमें जो इच्छा करते हैं, उसीको प्राप्त कर लेते हैं।' जैसे चन्दनका लेप तापको हर लेता है, वैसे ही मेरा यह उत्सव तीनों तापोंका विनाश करनेवाला है। मैंने तुम्हारी बुद्धिको प्रेरित किया है, इसीलिये तुमने इस उत्सवको सम्पन्न किया है। मैंने दीनोंका उद्धार करनेके लिये मन-ही-मन यह संकल्प किया था, उसीके अनुसार तुम इस कार्यमें प्रवृत्त हुए हो। प्रजापते! तुमने जो अभिलाषा की है, वह सब मैं पूर्ण करूँगा। ये गुण्डिचा आदि बारह महायात्राएँ पवित्र करनेवाली मानी गयी हैं। इनमेंसे एक-एक यात्रा मुक्ति देनेवाली है और सब यात्राएँ तो धर्म, काम, अर्थ, मोक्ष चारों पुरुषार्थोंको प्राप्त करानेवाली हैं। जो भक्तिपूर्वक इनमेंसे एक यात्राका भी दर्शन करता है, वह उसी एकसे भवसागरको पार करके भगवान् विष्णुके धाममें जाता है।'

प्रजापति दक्षसे ऐसा कहकर भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये। तब श्रद्धालु दक्ष प्रजापतिने भगवान्‌की आज्ञासे एक वर्षतक नीलाचलपर निवास करके वहाँके सब बड़े-बड़े उत्सवोंका दर्शन किया। जो अल्पबुद्धिवाले मनुष्य हैं, उनमें भी भगवत् विश्वास बढ़ानेके लिये ये यात्राएँ बतायी गयी हैं। जिस किसी प्रकार भी जगन्नाथजीका दर्शन करनेपर वे निश्चय ही मोक्ष प्रदान करते हैं।

इस संसारमें जो समस्त चराचर विभूतियाँ हैं, वे सब भगवान् विष्णुकी ही हैं। विभूति