संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३८९
और उसके दाता वे एक ही परमेश्वर हैं। जो मनुष्य जिस भावसे भगवान्की सेवा करता है, वह वैसा ही हो जाता है। भगवान्की इतनी ही महिमा है, इस प्रकार उसका माप नहीं किया जा सकता। जो जिस भावसे भगवान्की उपासना करता है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष— इन चारों पुरुषार्थोंकी प्राप्तिके लिये एक ही मार्ग है— दारुब्रह्म जगन्नाथजीकी उपासना। धर्मके स्वरूपका यथार्थ निश्चय करनेमें कोई भी समर्थ नहीं है। भगवान् विष्णु ही धर्म हैं। ये जनार्दन ही धर्म और जगत् दोनोंके स्वामी हैं। वे ही चतुर्विध पुरुषार्थस्वरूप हैं। उनमें जिसकी भक्ति स्थिर हो गयी है, वह सम्पूर्ण कामनाओंसे तृप्त होकर न कभी शोक करता है और न आकाङ्क्षा। इन्द्ररूपसे उपासना किये जानेपर वे ही भगवान् विष्णु त्रिलोकीका ऐश्वर्य प्रदान करते हैं। ब्रह्माजीके रूपमें ध्यान किये जानेपर वंशकी वृद्धि करते हैं, सनत्कुमारके रूपमें इनका चिन्तन किया जाय तो ये दीर्घ आयु प्रदान करते हैं। राजा पृथुके रूपमें भावना करनेपर जीविका और सम्पत्ति प्रदान करते हैं, बृहस्पतिके रूपमें भगवान्की उपासना की जाय तो वे गंगा आदि तीर्थोंका फल देते हैं। सूर्यरूपसे चिन्तन करनेपर वे अन्तःकरणके अज्ञानान्धकारका नाश करते हैं। चन्द्रमाके रूपमें श्रीहरिकी उपासना की जाय तो वे अनुपम सौभाग्य देते हैं। भगवान् वाणीके अधिपति हैं, इस रूपमें भावना करनेपर मनुष्य अष्टादश विद्याओंका तत्त्वज्ञ होता है। यज्ञेश्वर-स्वरूपमें चिन्तन करनेपर जगन्मय सनातन भगवान् अश्वमेध आदि यज्ञोंका फल देते हैं। कुबेररूपमें ध्यान किया जाय तो भगवान् अनुपम समृद्धि प्रदान करते हैं। इस प्रकार दीनों और अनाथोंपर अनुग्रह करनेके लिये दयासागर भगवान् काष्ठमय शरीर धारण करके नीलगिरिपर निवास करते हैं। ब्राह्मणो! तुम सब लोग वहाँ जाओ, एकाग्रचित्त होकर निवास करो और भगवान् लक्ष्मीपतिके युगल चरणारविन्दोंकी शरण लो।
## राजा इन्द्रद्युम्नका ब्रह्मलोकगमन, पुराण-श्रवणकी विधि और ग्रन्थका उपसंहार
मुनियोंने पूछा— भगवन्! विष्णुभक्त राजा इन्द्रद्युम्नने मन्दिरकी प्रतिष्ठाके पश्चात् कौन-सा कार्य किया?
जैमिनिजी बोले— साक्षात् ब्रह्मस्वरूप जगन्नाथजीसे वरदान पाकर नरश्रेष्ठ इन्द्रद्युम्नने अपनेको कृतार्थ माना। भगवान्की आज्ञाके अनुसार उन्होंने पुण्य एवं मोक्ष प्रदान करनेवाली सम्पूर्ण यात्राएँ करवायीं। अनेक प्रकारके उपचारोंसे जगद्गुरु श्रीहरिकी नाना प्रकारसे पूजा की और राजा गाल श्वेतको भगवान्की आज्ञा भलीभाँति समझाकर धर्म और न्यायसे युक्त यह वचन कहा— 'राजन्! तुम बहुश्रुत विद्वान् हो, धर्ममें तुम्हारी निष्ठा है, भगवान्में भी मन, वाणी और क्रियाद्वारा तुम्हारी बड़ी भक्ति है। भगवान् श्रीहरि किसी एकके उपदेशके लिये अनुशासन नहीं करते हैं, ये समस्त चराचरके गुरु हैं और सम्पूर्ण विश्व इनका शिष्य है। मुझपर अनुग्रह करनेके लक्ष्यसे अवतीर्ण हुए भगवान् जगन्नाथ यहाँ दीन-दुःखियोंके उद्धारके लिये सदैव निवास करेंगे। तुम भक्ति और श्रद्धाके साथ इनकी आज्ञाके पालनमें लगे रहो। ये साधारण काष्ठकी प्रतिमा हैं— ऐसी व्यावहारिक बुद्धिसे इन्हें न देखो, ये साक्षात् जगदीश्वर हैं। इनके मन्दिर-प्रवेश-कालमें तीनों लोकोंके निवासी इस पृथ्वीपर