भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 419

३९० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


आ गये थे, यह तो तुमने प्रत्यक्ष देखा है। ब्रह्मा आदि सब देवता एक ही साथ यहाँ पधारे थे। काष्ठस्वरूप धारण करनेवाले ये साक्षात् चराचरमय विष्णु हैं। इन्हें पृथ्वीपर प्राप्त कल्पवृक्ष समझो। ये सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाले हैं। इनकी उपासना करके जो जैसी कामना रखता है, वैसा फल प्राप्त कर लेता है। ये अन्धकारसे परे अनिर्वचनीय ज्योतिस्वरूप हैं। यतिजन बहुधा प्रयत्न करके भी इन्हें यथार्थरूपसे नहीं जान पाते। नैष्ठिक ब्रह्मचर्यका पालन करनेवाले, शुद्ध धर्मनिष्ठ यतियों तथा अनन्यभक्तिसे युक्त योगियोंके एक ही मार्ग भगवान् श्रीहरि हैं। जैसे संतप्त मनुष्य ग्रीष्म-ऋतुमें शीतल एवं गहरे जलाशयमें गोता लगाकर बड़े सन्तोषका अनुभव करता है उसी प्रकार इन करुणासागर भगवान् पुरुषोत्तमके प्राप्त होनेपर मनुष्य त्रिविध तापजनित दुःखको त्याग देता है। शरणमें आये हुए दीनजनोंका जैसा उपकार ये भगवान् विष्णु करते हैं, वैसा माता, पिता, मित्र, पत्नी और पुत्र कोई भी नहीं कर सकता। अतः भोग और मोक्ष दोनों फलोंको देनेवाले इन जगदीश्वरका तुम सेवन करो और पुरवासियों तथा प्रजाओंके द्वारा भगवान्‌की विभिन्न यात्राओंको भलीभाँति सम्पन्न करते रहो। नृपश्रेष्ठ! सभी राजाओंके लिये धर्मका मार्ग एक-सा ही है। किसी पूर्वपुरुषने उसे चलाया है और पीछे होनेवाले लोग उसका पालन करते हैं। राजेन्द्र! श्रेष्ठ उपचारों और समृद्धियोंद्वारा तीनों समय भगवान् नृसिंहका भजन-पूजन करो, इससे तुम्हें परम शान्ति प्राप्त होगी। अपनी कृतिकी अपेक्षा दूसरेकी कृतिका संरक्षण करना श्रेष्ठ बताया गया है। जो दूसरेके दिये हुए दानकी रक्षा करता है, उसके लिये वह अपने दिये हुए दानसे उत्तम है।'

यह सुनकर नृपश्रेष्ठ श्वेतने राजा इन्द्रद्युम्नके आदेशको गुणयुक्त मालाकी भाँति शिरोधार्य किया। राजर्षि इन्द्रद्युम्न भी भगवान् पुरुषोत्तमको प्रसन्न करके नारदजीके साथ ब्रह्मलोक चले गये।

ब्राह्मणो! यह मैंने तुमसे पुरुषोत्तमक्षेत्रके उत्तम माहात्म्यका वर्णन किया। वहाँ नित्य निवास करनेवाले दारुब्रह्म जगन्नाथजीके माहात्म्यको जो भक्तिपूर्वक श्रवण करता है, उसे अनेक अश्वमेध यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। स्वामिकार्तिकेयजीके बताये हुए अर्द्धोदययोगकी अपेक्षा इस विष्णु-माहात्म्यके कीर्तनका पुण्य अधिक है। जो प्रतिदिन प्रातःकाल इसको सुनता है उसके लिये यह धन, यश, आयु, पुण्य तथा सन्तानकी वृद्धि करनेवाला है। स्वर्गमें प्रतिष्ठारूप फल देता और सब पापोंका नाश करता है।

पुराण-श्रवणके आरम्भमें अपने वैभवके अनुसार तैयारी करनी चाहिये। पहले संकल्प करके पुराण-पाठ श्रवण करनेके लिये अति सुन्दर आभूषणों तथा वस्त्र, चन्दन और माला आदिके द्वारा विधिपूर्वक ब्राह्मणका वरण करे। वह ब्राह्मण शुद्ध कुलमें उत्पन्न हो, किसी अंगसे हीन न हो, शान्त स्वभाववाला हो, अपनी ही शाखाको माननेवाला और अपना पुरोहित हो तथा सब शास्त्रोंके अर्थको यथार्थरूपसे जाननेवाला हो। वरण किये हुए ब्राह्मणको उत्तम आसनपर बिठाकर उसके गलेमें माला पहना दे और मस्तकपर भी पुष्पगर्भ माला रखे। चन्दनसे ब्राह्मणके ललाटमें लेप करे। उस समय वह ब्राह्मण व्यासके समान मान्य होता है। उसी ब्राह्मणके द्वारा विष्णुस्वरूप पुस्तकपर श्रीखण्ड, अगरु आदि पुष्पों और नाना प्रकारके रुचिर उपचारोंसे व्यास-पूजन करावे। कथा सुननेके लिये आने-जानेवाले लोगोंके बैठनेके निमित्त यथायोग्य आसन बनवाकर रखे। स्वयं उत्तम आसनपर बैठकर उत्कण्ठित चित्तसे कथा सुने