भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 420
  • वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३९१

अथवा झाड़-बुहारकर शुद्ध किये हुए स्थानमें सबके साथ बैठे। व्यासके आगे ऊँचे आसनपर न बैठे। स्नान करके दो शुद्ध वस्त्र धारण करे। आचमन करके शरीरमें यथास्थान तिलक करे और प्रसन्नतापूर्वक मनसे भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए कथामें विश्वास करे। पुराण, ब्राह्मण, देवता, मन्त्र, कर्म, तीर्थ तथा बड़े-बूढ़ोंके वचनमें विश्वास फलदायक होता है। सब पुण्य विश्वासका कारण है। पुराण-श्रवणके समय पाखण्डी आदिसे बातचीत, व्यर्थकी बकवाद और सब प्रकारकी चिन्ताओंका प्रयत्नपूर्वक त्याग करे। इसी विधिसे प्रतिदिन प्रसन्नतापूर्वक कथा सुने। पाठ समाप्त होनेपर बारंबार करताल आदि बजाकर 'जय कृष्ण! जगन्नाथ! हरे!' इत्यादि नामोंका कीर्तन करे। कीर्तन इतने उच्चस्वरसे होना चाहिये कि आकाशमें उसकी ध्वनि गूँज उठे। इस प्रकार भगवान् विष्णुकी प्रीति के लिये प्रतिदिन कीर्तन करना चाहिये। तदनन्तर ग्रन्थ समाप्त होनेपर भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके लिये बड़ी भक्तिके साथ वस्त्र, माला, चन्दन और आभूषण आदिकी विशेष व्यवस्था करके व्याससदृश माननीय आचार्यको विभूषित करे और अपनी शक्तिके अनुसार विधिपूर्वक दक्षिणा दे। दक्षिणा ऐसी देनी चाहिये जिससे आचार्यको सन्तोष हो जाय। शान्तिकर्म, पौष्टिककर्म, व्रतबन्ध, विवाह आदि कर्म, मोक्षसाधक कर्म, पुराण-श्रवण, यज्ञादिका अनुष्ठान, दान और अनेक प्रकारके व्रत—ये यदि दक्षिणाहीन हों तो निष्फल हो जाते हैं। तत्पश्चात् यथाशक्ति तैयार कराये हुए अन्नसे ब्राह्मणोंको भोजन करावे। मुनिवरो! इस प्रकार तुमलोगोंसे पुराण-श्रवणकी यह सांगोपांग विधि बतायी गयी।

मुनि बोले—अहो! हमारा महान् सौभाग्य है कि पापराशिका विनाश करनेवाला यह पुराण-श्रवणका फल हमने आपके मुखारविन्दसे सुना। मुने! इस समय इसके फलकी प्राप्तिके लिये हम आपको यथाशक्ति दक्षिणा देते हैं, इसे आप प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण करें। यह कह उन अकिंचन मुनियोंने समिधा, कुशा, फूल, फल और अक्षत आदि जैमिनिजीको देकर बड़े हर्षके साथ पुरुषोत्तमक्षेत्रको प्रस्थान किया।

॥ उत्कलखण्ड या पुरुषोत्तमक्षेत्र-माहात्म्य संपूर्ण ॥

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