भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 422
  • वैष्णवखण्ड-बदरिकाश्रम-माहात्म्य * ३९३

करनेवाले पुरुष घर त्यागकर श्रीहरिका चिन्तन करनेसे गृहकी आसक्ति तथा मृत्युके पराक्रमपर विजय पा जाते हैं। द्वारकामें साक्षात् भगवान् श्रीहरि विराजमान हैं, वे अपने निवास-मन्दिरको कभी नहीं छोड़ते। षडानन ! गोमतीमें स्नान करके भगवान् श्रीकृष्णके मुखारविन्दका दर्शन करनेसे बिना ज्ञानके ही मनुष्यकी मुक्ति हो जाती है।

असी और वरुणाके बीचमें पाँच कोसतक वाराणसीक्षेत्र है। वहाँ मणिकर्णिका, ज्ञानवापी, विष्णुपादोदक और पंचनद कुण्ड (पंचगंगा)-में स्नान करके मनुष्य पुनः माताके स्तनोंका दूध नहीं पीता है। किसी प्रसंगसे भी काशीमें विश्वनाथजीका दर्शन करके मनुष्यको जन्म-मृत्युरहित मुक्ति प्राप्त होती है। कार्तिकेय ! तपस्या और उपवासमें लगा हुआ मनुष्य मथुरापुरीमें जन्मस्थानपर जाकर सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। विश्रामतीर्थमें विधिपूर्वक स्नान करके तिलसहित जलसे तर्पण करे तो मनुष्य अपने पितरोंका नरकसे उद्धार करके स्वयं विष्णुलोकको जाता है। अवन्तीपुरीमें वैशाखमास आनेपर मनुष्य क्षिप्राके जलमें विधिपूर्वक स्नान करके कोटि तीर्थमें गोता लगावे और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन कराकर महाकालेश्वर शिवका दर्शन करे तो सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। कुरुक्षेत्र तथा रामतीर्थमें सूर्यग्रहणके अवसरपर यथाशक्ति सुवर्णदान करनेसे मनुष्य मोक्षका भागी होता है। हरिक्षेत्रमें पादोदक तीर्थके जलमें स्नान करके श्रीहरिका दर्शन करनेसे पुरुष सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके साथ आनन्द भोगता है। विष्णुकांचीमें साक्षात् भगवान् विष्णु और शिवकांचीमें साक्षात् भगवान् शिव निवास करते हैं। दोनोंमें कोई भेद न होनेके कारण दोनोंकी ही भक्तिसे मुक्ति हाथमें आ जाती है, भेदबुद्धि पैदा करनेसे मनुष्योंकी निन्दित गति होती है। पुरुषोत्तमक्षेत्रमें मार्कण्डेय-सरोवरके जलमें स्नान करके एक बार जगन्नाथजीका दर्शन कर लेनेसे मनुष्य ज्ञान अथवा योगके बिना भी पुनः माताके स्तनोंका दूध नहीं पीता। रोहिणिक्षेत्रके अन्तर्गत समुद्रमें तथा इन्द्रद्युम्न-सरोवरमें स्नान करके भगवान् विष्णुके प्रसादको खाकर मनुष्य वैकुण्ठधाममें स्थान पाता है। कार्तिकी पूर्णिमाको पुष्करतीर्थमें स्नान करके दक्षिणासहित श्राद्ध एवं भक्तिपूर्वक ब्राह्मण-भोजन कराकर मनुष्य ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है। माघ मासमें भक्तिभावसे त्रिवेणीसंगममें स्नान करके मनुष्य उस पुण्यको प्राप्त करता है, जो बदरीतीर्थके कीर्तनसे प्राप्त होता है।

भगवान् विष्णुका बदरी नामक क्षेत्र तीनों लोकोंमें दुर्लभ है, उसके स्मरणमात्रसे महापातकी मनुष्य भी तत्काल पापरहित होकर मृत्युके पश्चात् मोक्षके भागी होते हैं। स्वर्ग, पृथ्वी तथा रसातलमें बहुत-से तीर्थ हैं, परंतु बदरी तीर्थके समान दूसरा कोई तीर्थ न हुआ है, न होगा। कार्तिकेय ! तप, योग और समाधिसे तथा सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह बदरीक्षेत्रके भलीभाँति दर्शनमात्रसे मिल जाता है।

बदरीक्षेत्रकी महिमा—अग्निदेवके सर्वभक्षणरूप दोषका निवारण

स्कन्दने पूछा—यह क्षेत्र कैसे उत्पन्न हुआ ? किन लोगोंने इसका सेवन किया है तथा इस क्षेत्रके अधिपति कौन हैं? यह सब बातें मुझे विस्तारपूर्वक बताइये।