भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 424
* वैष्णवखण्ड-बदरिकाश्रम-माहात्म्य *३९५

जलमें स्नान करके भगवान् नारायणके आश्रमपर गये। वहाँ भगवान्‌को प्रणाम करके उन्होंने भक्तिपूर्वक स्तवन किया। 'जो विशुद्ध विज्ञानघन-स्वरूप पुराणपुरुष सनातन प्रजापतियोंके पति, सबके गुरु, एक होते हुए भी अनेक रूपोंको धारण करनेवाले और सम्पूर्ण जगत्‌के एकमात्र स्वामी हैं, शेषनागकी शय्यापर शयन करनेवाले उन शुद्धबुद्धि नारायणको मैं नमस्कार करता हूँ। जो अपनी मायामयी शक्तिका आश्रय लेकर संसारकी सृष्टि करनेके उद्देश्यसे रजोगुणसे युक्त ब्रह्माका रूप धारण करते हैं, सत्त्वगुणसे युक्त होकर इस जगत्‌की रक्षामें कारण बनते हैं और तमोगुणसे संयुक्त हो इस विश्वके भयंकर संहारकारी रुद्र बने हुए हैं, उन त्रिविध रूपधारी भगवान्‌की मैं स्तुति करता हूँ। जो अविद्यासे मोहितचित्त सम्पूर्ण विश्वके रूपमें प्रकट हुआ है और विद्यासे समस्त त्रिलोकीमें एक ही रूपसे व्याप्त हो रहा है, विद्याका आश्रय लेनेसे जिसे सर्वज्ञ और ईश्वर कहते हैं, उस परमेश्वरकी मैं शरण लेता हूँ। जिन्होंने भक्तोंकी इच्छासे अपने दिव्य स्वरूपको प्रकट किया है, योगनिद्राको स्वीकार करके शेषनागकी विशाल शय्यापर अपनेको अर्पित कर रखा है, जो रेशमी पीताम्बर धारण करते हैं और आठ प्रकारकी विचित्र शक्तियोंसे सम्पन्न हैं, उन भगवान् विष्णुकी मैं स्तुति करता हूँ।'

इस प्रकार स्तुति किये जानेपर सर्वान्तर्यामी भगवान् नारायण प्रसन्न होकर पवित्रताकी इच्छा रखनेवाले अग्निदेवसे मधुर वाणीमें बोले—'अनघ! तुम्हारा कल्याण हो, तुम कोई वर माँगो। मैं तुम्हें वर देनेके लिये आया हूँ। मैं तुम्हारी इस स्तुति और विनयसे बहुत प्रसन्न हूँ।'

अग्नि बोले—प्रभो! मैं जिस उद्देश्यसे आया हूँ वह सब आपको ज्ञात है। तथापि कहता हूँ और इस रूपमें आप जगदीश्वरकी आज्ञाका पालन करता हूँ। मुझे सर्वभक्षी तो होना ही पड़ता है, किंतु मेरे इस दोषका निवारण कैसे हो, यही सोचकर मुझे अत्यन्त भय हो रहा है।

भगवान् नारायणने कहा—इस क्षेत्रका दर्शन करनेमात्रसे किसी भी प्राणीका पाप नहीं रह जाता। मेरे प्रसादसे तुममें कभी पातकका सम्पर्क न होगा।

तबसे लेकर सब दोषोंसे रहित भूतात्मा अग्निदेव यहाँ अपनी कलासे विराजमान हैं। जो प्रातःकाल उठकर पवित्र भावसे इस प्रसंगको सुनता और सुनाता है, वह निश्चय ही अग्नितीर्थमें स्नान करनेका फल पाता है।


बदरीक्षेत्रकी पाँच शिलाओंमेंसे नारदशिला और मार्कण्डेयशिलाका माहात्म्य

महादेवजी कहते हैं—स्कन्द ! जो महापातकी और अतिपातकी हैं, वे भी अग्नितीर्थमें स्नान करनेमात्रसे पवित्र हो जाते हैं। जैसे अत्यन्त मलिन सोना आगमें तपानेसे शुद्ध हो जाता है, उसी प्रकार देहधारी प्राणी अग्नितीर्थमें आकर पापमुक्त हो जाता है। जो पाँच प्रकारके महापातक करनेवाले हैं, वे भी इस तीर्थमें स्नान करके प्राणायाम और जप करनेसे शुद्ध हो जाते हैं, ऐसा मेरा मत है। यहाँ जो पाँच शिलाएँ हैं, उनमें सदा भगवान् विष्णुकी स्थिति है, वहींपर सब पापोंका नाश करनेवाला अग्नितीर्थ है।

स्कन्दने पूछा—पिताजी! वहाँ कैसी पाँच शिलाएँ हैं और किसने उनका निर्माण किया है? ये सब बातें पूर्णतः बतलानेकी कृपा करें।

भगवान् शिवने कहा—बेटा! वहाँ नारदी, नारसिंही, वाराही, गारुड़ी और मार्कण्डेयी—