भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 425

३९६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


ये पाँच शिलाएँ विख्यात हैं, जो सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि करनेवाली हैं। एक समय भगवान् नारदने एक शिलापर बैठकर वायु पीकर रहते हुए महाविष्णुका दर्शन करनेके लिये अत्यन्त कठोर तपस्या की। वे साठ हजार वर्षोंतक वृक्षकी भाँति स्थिरभावसे उस शिलापर विराजमान रहे। तदनन्तर भगवान् विष्णु ब्राह्मणका रूप धारण करके कृपापूर्वक उनके सामने गये और उन मुनिश्रेष्ठ नारदसे इस प्रकार बोले—'मुने! बताओ, तुम क्या चाहते हो?'

नारदजीने कहा—आप कौन हैं? इस निर्जन वनमें आपके दर्शनसे मेरे मनमें बड़ी प्रसन्नता हो रही है।

नारदजीके ऐसा कहनेपर भगवान् विष्णुने कृपा करके उन्हें अपने दिव्य स्वरूपका दर्शन कराया। उनके हाथोंमें शंख, चक्र, गदा आदि आयुध शोभा पा रहे थे। वे पीताम्बरसे सुशोभित और कमलोंकी मालासे विभूषित थे। लक्ष्मीका निर्मल निवासभूत भगवान्का वक्ष श्रीवत्सचिह्न तथा कौस्तुभमणिकी प्रभासे प्रकाशमान था। सुनन्द आदि पार्षद भगवान् जनार्दनकी स्तुति कर रहे थे। उन्हें देखकर नारदजीके शरीरमें नूतन प्राण-सा आ गया। वे सहसा खड़े हो गये और हाथ जोड़कर बार-बार नमस्कार करते हुए जगदीश्वरोंके भी ईश्वर श्रीविष्णुकी स्तुति करने लगे—'जो सबके साक्षी और सम्पूर्ण जगत्के अधीश्वर हैं, जिन्होंने भक्तोंकी इच्छासे दिव्य देह धारण किया है, जो शरणागतोंके लिये दयाके महासागर हैं, वे पावन दिव्यमूर्तिधारी भगवान् श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों। जो सम्पूर्ण जगत्के हितके लिये और साधुपुरुषोंके मनको सन्तुष्ट और उनका कल्याण करनेके लिये शीघ्र ही अपनी उत्तम कलाओंद्द्वारा दिव्य देह धारणकर प्रसन्नतापूर्वक दिव्यलीला और हास्यपूर्ण दृष्टि प्रकट करते हैं, सत्त्वगुणका समुदाय ही जिनका स्वरूप है, वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों। जिनके चरणारविन्दोंका अर्चन करनेसे निर्मल चित्त हुए मनुष्य ज्ञानरूपी खड्गसे संसारबन्धनके मूल हेतुओंको काट डालते हैं और खेदरहित हो जिनके स्वरूपभूत ब्रह्मानन्दकी उपलब्धि कर लेते हैं, दीनोंपर दयार्द्रचित्त रहनेवाले वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों। जिनका अनुसरण करनेवाले देवता विपत्तियोंके समुद्रको भी बछड़ेके खुरके समान लाँघकर निर्भय हो स्वर्गमें निवास करते हैं, वे सर्वभूतात्मा हैं। प्रभो! आप वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्धस्वरूप विष्णुको बार-बार नमस्कार है। जनार्दन! आज आपके दर्शनसे मेरा जीवन धन्य हो गया, मेरी तपस्या फलवती हुई और मेरा ज्ञान भी सफल हो गया।'

श्रीभगवान् बोले—नारद! तुम्हारी इस तपस्या और स्तुतिसे मैं प्रसन्न हूँ। तीनों लोकोंमें तुमसे बढ़कर दूसरा कोई मेरा भक्त नहीं है। तुम्हारा कल्याण हो, तुम कोई वर माँगो।

नारदजीने कहा—देव! यदि आप मुझे वर देते हैं तो एक तो अपने चरणकमलोंमें अविचल भक्ति दीजिये। मेरी शिलाके समीप रहना आप कभी न छोड़िये, यह दूसरा वर है; और मेरे इस तीर्थके दर्शन, स्पर्श, स्नान और आचमन करनेवाला मनुष्य पुनः संसारमें शरीर न धारण करे, यह मेरा तीसरा वर है।

श्रीभगवान् बोले—'एवमस्तु'। मैं तुम्हारे स्नेहवश समस्त चराचर जीवोंको मुक्ति देनेके लिये तुम्हारे तीर्थमें निवास करूँगा।

ऐसा कहकर भगवान् विष्णु वहीं अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर नारदजी भी कुछ दिनोंतक बदरीक्षेत्रमें निवास करके मथुरापुरीको चले गये।

स्कन्दने कहा—भगवन्! अब मुझे मार्कण्डेय-शिलाकी महिमा बताइये।

भगवान् शिव बोले—पहले त्रेतायुगके अन्तमें मार्कण्डेयजी तीर्थयात्राका परिश्रम उठाते हुए मथुरामें आये। वहाँ उन्हें नारदजीका दर्शन हुआ। मार्कण्डेयजीने