भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 426, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 426
  • वैष्णवखण्ड-बदरिकाश्रम-माहात्म्य * ३९७

नारदजीका पूजन और उन्हें प्रणाम किया। तब उन्होंने जहाँ साक्षात् नारायण विद्यमान हैं, उस बदरीक्षेत्रका माहात्म्य इस प्रकार बताया—'साधो! बदरीतीर्थ महाक्षेत्र है, वहाँ भगवान् विष्णुका नित्यनिवास है। तुम वहीं जाओ वहाँ तुम्हें साक्षात् श्रीहरिका दर्शन होगा।' यह सुनकर मार्कण्डेयजीको बड़ा विस्मय हुआ। वे विशालापुरी (बदरिकाश्रम)-में आये और वहाँ स्नान करके शिलापर बैठकर परम उत्तम अष्टाक्षर (ॐ नमो नारायणाय) मन्त्रका जप करने लगे। तीन राततक जप करनेके बाद भगवान् जनार्दन उनपर प्रसन्न हुए और उन्हें शंख, चक्र, गदा, पद्म और वनमाला आदिसे विभूषित स्वरूपका दर्शन कराया। उन्हें देखकर मार्कण्डेयजी सहसा उठे और प्रणाम करके प्रेमसे गद्गदवाणीमें उनकी स्तुति करने लगे।

मार्कण्डेयजी बोले—परमेश्वर! इस अशाश्वत (क्षणभंगुर) संसारमें आपके युगल चरणारविन्द ही सार हैं। संसारी मनुष्योंका उद्धार कैसे हो? अच्युत! मैं आध्यात्मिक आदि तीनों तापोंसे अत्यन्त थका हुआ हूँ, अनेक प्रकारके बढ़े हुए अज्ञानसे आच्छादित होकर संसाररूपी कुहरेमें भटक रहा हूँ, कृपया मेरा उद्धार कीजिये। करुणासागर! अनेक प्रकारके योनियन्त्रोंमें दबकर निकलनेसे प्राप्त हुई गर्भवासजनित शारीरिक वेदनाको मैं कितनी ही बार पा चुका हूँ, अब मेरी रक्षा कीजिये। जरा, मृत्यु और बाल्यावस्था आदिके दुःखोंसे भरे हुए संसारसे मैं बहुत पीड़ित हूँ तथापि इस दुःखके समुद्रमें मेरी सुखबुद्धि हो रही है; दयासिन्धो! मेरी रक्षा कीजिये। कभी मैं कीटयोनिमें पड़ा, कभी स्वेदज जीवके रूपमें जन्म लिया, कभी उद्भिज्ज योनिमें आया और कभी सौभाग्यवश मनुष्य-शरीरको भी प्राप्त हुआ। सब योनियोंमें जन्म लेकर विपत्ति भोग चुका हूँ, अब सर्वथा निस्तेज और अनाथ हूँ। अच्युत! कृपा करके अपनी शरणमें आये हुए मुझ सेवकका उद्धार कीजिये।

बुद्धिमान् मार्कण्डेयजीके द्वारा ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीविष्णुने प्रसन्न होकर कहा—'ब्रह्मर्षे! मुझसे कोई वर माँगो।' मार्कण्डेयजीने कहा—'भगवन्! दीनवत्सल! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो अपने पूजन और दर्शनमें मुझे अविचल भक्ति दीजिये। साथ ही, मैं चाहता हूँ इस शिलापर आपका निवास बराबर बना रहे। यही मेरे लिये वर है।' 'बहुत अच्छा' कहकर भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर मार्कण्डेयजी अत्यन्त प्रसन्न हो अपने पिताके आश्रमपर चले गये। जो मनुष्य इस प्रसंगको सुनता और सुनाता है, उसे भगवान् गोविन्दकी प्राप्ति होती है।


## गरुड़शिला, वाराहीशिला और नारसिंहीशिलाकी उत्पत्ति और महिमा

भगवान् शिव कहते हैं—कश्यपजीसे विनताके गर्भसे दो महाबली और महापराक्रमी पुत्र हुए, जिनका नाम था गरुड़ और अरुण। इनमेंसे अरुण तो सूर्यके सारथि हुए और गरुड़ने भगवान् विष्णुका वाहन होनेकी अभिलाषासे बदरीक्षेत्रके दक्षिण भागमें गन्धमादनके शिखरपर तपस्या प्रारम्भ की। वे फल-मूल और जलका आहार करते, द्वन्द्वोंको धैर्यपूर्वक सहते और जप करनेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ होकर एक पैरसे पृथ्वीपर खड़े हो जप करते थे। भगवान्के दर्शनकी लालसासे उन्होंने बहुत वर्षोंतक तपस्या की। तब साक्षात् भगवान् विष्णु पीताम्बर धारण करके अपने शंख, चक्र आदि आयुधोंसे युक्त हो, पूर्व दिशामें उदित होनेवाले पूर्ण चन्द्रमाकी भाँति गरुड़के सामने प्रकट हुए और मेघके समान गम्भीर शब्द करते हुए बोले। तथापि गरुड़की बाह्य वृत्ति नहीं हुई। तब उन्होंने अपना श्रेष्ठ शंख बजाया, पर उससे भी