संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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महात्मा गरुड़का ध्यान नहीं टूटा। तब भगवान् श्वासके साथ गरुड़के भीतर प्रवेश करके उनमें बहिर्मुखवृत्ति पैदा करते हुए पुनः बाहर आकर प्रकट हो गये। उस समय भगवान् विष्णुको अपने सामने देखकर गरुड़ निर्भय हो गये। उनके सम्पूर्ण शरीरमें रोमांच हो आया और उन्होंने हाथ जोड़कर भगवान्की स्तुति प्रारम्भ की—'भगवन्! तीनों लोकोंमें निवास करनेवाले देहधारियोंका अन्तःकरण आपका निवासस्थान है, आपकी जय हो, जय हो। आप अपने गुणोंसे समग्र पापराशिका विनाश करते हैं, सम्पूर्ण देहवृन्द आपके युगल चरणारविन्दोंकी मनोहर सुगन्धका अभिवन्दन करते हैं, आप असंख्य शत्रुओंके समूहका विनाश करनेवाले हैं। आपके सिंहासनपर जो कमल है, वह प्रणाम करनेवाले समस्त देवताओं और असुरोंके अतिशय प्रकाशमान कोटि-कोटि किरीटोंसे सुशोभित होता है। आप अपने भक्तोंके हृदयमें फैली हुई अज्ञानमय अनन्त अन्धकारराशिका चन्द्रमाकी भाँति निवारण करते हैं। आपके मनोहर चरण आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक तीनों प्रकारके सन्तापसमूहका अपहरण करनेवाले हैं। संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और संहाररूपी लीलाविलाससे विलसित जो आपकी ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूपी त्रिविध मूर्ति है, उसकी कीर्तिमयी प्रभासे सम्पूर्ण जगत्समुदाय प्रकाशित होता है, ठीक उसी प्रकार, जैसे सूर्य अपनी किरणोंसे समस्त विश्वको प्रकाशित करते हैं। आप अपने भक्तजनोंके हृदयकमलमें भ्रमरकी भाँति शोभा पाते हैं। अपने ज्ञानमें आयी हुई सम्पूर्ण वेदविद्यासे आपका मानस सदैव प्रकाशमान रहता है। जो मुनिजन आपके भक्त हैं, वे आपके चरणोंकी सदा वन्दना किया करते हैं तथा आपके चरणनखोंके प्रक्षालनसे प्रकट हुई गंगाके जलसे अपनेको पवित्र करनेवाले देवता और मुनि आपकी चरणरेणुको हृदयसे प्रणाम करते हैं और उसीको आपकी प्रसन्नताका सार मानते हैं। जगदीश्वर! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। जो आठ शक्तियोंके साथ विराजमान हैं, जिनके गलेमें वनमाला शोभा दे रही है, जो पीताम्बर और पुष्पोंकी मालासे शोभायमान हैं, जिनके चरण कमलवनसे सुशोभित होते हैं तथा जिनकी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ सतत सावधान रहती हैं वे भगवान् विष्णु मेरी रक्षा करें! चल, अचल, त्रिविध तापकी शान्तिके लिये जो चन्द्रमाके समान हैं, देदीप्यमान सूर्यके सदृश जिनकी कान्ति है, जिन्होंने एक होकर भी अनेक रूप धारण कर रखे हैं, वे परम बुद्धिमान् श्रीहरि मेरी रक्षा करें। जो भक्तोंके चिन्तनके लिये नूतन अवताररूप धारण किया करते हैं, जो वैदिकमार्गमें चलनेवालोंका अनेक प्रकारसे हित किया करते हैं, जिन परमेश्वरकी यही (लोकहित साधन) रीति है तथा जो समस्त गुणोंसे शोभा पाते हैं, प्रेम और भक्तिसे सम्पन्न पुरुषोंको ही जिनकी उपलब्धि होती है और अपने सेवकोंको देखनेमात्रसे ही जिनके हृदयमें करुणा उमड़ आती है, वे भगवान् विष्णु समस्त संसारकी रक्षा करें। ये ही भगवान् अपने हाथमें दण्ड लेकर स्वेच्छाचारी मनुष्योंका यमराजकी भाँति शासन करते हैं और ये ही अपने बताये हुए नियमोंमें संलग्न रहनेवाले महापुरुषोंका पालन करनेके लिये सदा अनुकूल बनकर शोभा पाते हैं। ये भगवान् श्रीहरि हमारे सम्पूर्ण दुःखोंका निवारण करनेवाले हों।'
महात्मा गरुड़के इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् विष्णुने वहाँ त्रिपथगामिनी गंगाको बुलाया। तब उस पर्वतके ऊपर साक्षात् पंचमुखी गंगा प्रकट हुईं। उन्हींके जलसे गरुड़जीने भगवान्को पाद्यार्घ्य दिया। फिर वर माँगनेके लिये भगवान्के प्रेरित करनेपर गरुड़जीने कहा—'भगवन्! मैं एकमात्र