भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 428, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 428
  • वैष्णवखण्ड-बदरिकाश्रम-माहात्म्य * ३९९

आपका वाहन होऊँ और आपके प्रसादसे देवता और दैत्योंमेंसे कोई भी बल, वीर्य एवं पराक्रमद्वारा मुझे जीत न सके। यह शिला मेरे नामसे विख्यात होकर समस्त पापोंका अपहरण करनेवाली हो तथा इसके स्मरणसे मनुष्योंको कभी विषजनित व्याधि न हो।' तदनन्तर 'बहुत अच्छा' कहकर भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये।

स्कन्दने कहा—भगवन्! अब वाराहीशिलाका माहात्म्य बतलाइये।

भगवान् शिव बोले—रसातलसे पृथ्वीका उद्धार करके और युद्धमें हिरण्याक्ष नामक दैत्यको मारकर भगवान् वाराह बदरीक्षेत्रमें आये तथा प्रलयकालकी समाप्तितक वहीं बने रहे। वाराहजीने शिलाके रूपमें ही वहाँ निवास किया।

स्कन्दने कहा—प्रभो! अब नारसिंहीशिलाका माहात्म्य कहिये।

भगवान् शिव बोले—भगवान् नृसिंह अपने नखोंके अग्रभागसे ही लीलापूर्वक हिरण्यकशिपुका वध करके प्रलयकालकी अग्निके समान उद्दीप्त दिखायी देने लगे। तब दयालु देवताओंने आकर और दूर ही खड़े रहकर लीलासे अवतार-विग्रह धारण करनेवाले भगवान् विष्णुका स्तवन किया। तब अपने तेजसे समस्त देवताओं और असुरोंको भी व्याप्त करनेवाले भयानक पराक्रमी नृसिंहजी प्रसन्न होकर बोले—'देवताओ! तुमलोग मुझसे कोई वर माँगो जो तुम्हारी शान्ति और सुखका एकमात्र साधन हो।' उस समय देवताओंके स्वामी ब्रह्माजीने कहा—'भगवान् नृसिंह! आपका यह अत्यन्त उग्ररूप समस्त देहधारियोंको भयभीत करनेवाला है, अतः इसको समेट लीजिये।' उनकी प्रार्थनाके अनुसार दिव्य रूप धारण करके भगवान्‌ने फिर कहा—'देवताओ! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ, बोलो तुम्हारा कौन-सा कार्य करूँ?' देवता बोले—'हमारा अभीष्ट वर यही है कि आप मनको प्रसन्न करनेवाले परम शान्त चतुर्भुजरूपसे ही हमें दर्शन दिया करें।' तब भगवान् उन्हें दिव्यदृष्टिसे देखकर विशालापुरी (बदरिकाश्रम)-को चले गये। तदनन्तर देवताओंका भय शान्त हो गया और उन्होंने जलके मध्यमें विराजमान भगवान् विष्णुका दर्शन, नमस्कार और परिक्रमा करके उन्हींमें अपना मन लगाकर अपने-अपने लोकको प्रस्थान किया। तत्पश्चात् अतिशय भक्तिभारसे नम्र तपस्वी ऋषि आये और अत्यन्त अद्भुत पराक्रमवाले भगवान् नृसिंहका दर्शन करके उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगे—'सम्पूर्ण विश्वके स्वामी जगदीश्वर! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। विश्वको अभय प्रदान करनेवाले विश्वमूर्ते! आप कृपाके समुद्र हैं, आपके चरणकमल सेवन करनेयोग्य तीर्थरूप हैं। लक्ष्मीपते! हमपर दया कीजिये। भक्तकी इच्छाके अनुसार विचित्र शरीर धारण करनेवाले विश्वमुख! विश्वभावन! आप प्रसन्न होइये।' तब भगवान् नृसिंहने प्रसन्न होकर ऋषियोंसे कहा—'वर माँगो।' ऋषि बोले—'जगदीश्वर! यदि आप प्रसन्न हों तो कृपा करके कभी बदरीक्षेत्रका त्याग न करें, यही हमारा अभीष्ट वर है।' भगवान्‌ने 'एवमस्तु' कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। उसके बाद सब ऋषि अपने-अपने आश्रमको चले गये और भगवान् नृसिंह भी शिलारूप हो गये। जो तीन उपवास करके वहाँ भगवान् नृसिंहके जप और ध्यानमें तत्पर होता है, वह साक्षात् नृसिंहरूपधारी भगवान्‌का दर्शन पाता है। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक इस प्रसंगको सुनता और सुनाता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो वैकुण्ठमें निवास करता है।

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