संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 430, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें* वैष्णवखण्ड-बदरिकाश्रम-माहात्म्य * ४०१
विष्णुकी प्रदक्षिणा होती है। षडानन! बदरीक्षेत्रमें भगवान् विष्णुके प्रसादका एक दाना भी मिल जाय तो वह भोजन करनेपर समस्त पापोंको उसी प्रकार शुद्ध करता है जैसे भूसीकी आग सोनेको तपाकर शुद्ध करती है। भगवान् विष्णु नारद आदि ऋषियोंके साथ जिस अन्नको ग्रहण करते हैं वह प्रसाद अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये सबको बिना विचारे भोजन करना चाहिये। भगवान्का प्रसाद ग्रहण करनेके लिये देवता भी बदरीक्षेत्रमें आते हैं और भगवान्के भोजन कर लेनेके बाद प्रसाद लेकर अपने लोकको लौट जाते हैं। इसी प्रकार प्रह्लाद आदि भक्त वह प्रसाद लेकर भगवान्के धाममें जाते हैं। बचपन, जवानी और बुढ़ापेमें जान-बूझकर भी जो पाप किया गया है वह बदरीक्षेत्रमें जाकर भगवान् विष्णुका प्रसाद भक्षण करनेपर नष्ट हो जाता है। जिस पापके लिये प्राणोंका अन्त कर देना ही प्रायश्चित्त बतलाया गया है वह भी बदरीक्षेत्रमें भगवान् विष्णुका प्रसाद खानेसे निवृत्त हो जाता है। बदरीक्षेत्रमें भगवान् विष्णुका प्रसाद भक्षण करनेसे मनुष्य भगवान्की सालोक्य मुक्तिको पाता है। जिसके हृदयमें भगवान् विष्णुका रूप, मुखमें भगवान्का नाम, पेटमें श्रीहरिका प्रसाद और मस्तकपर निर्माल्यसहित भगवान्का चरणामृत है, वह विष्णुस्वरूप ही है। ब्रह्महत्या, मदिरापान, चोरी और गुरुपत्नीगमन—ये महापाप बदरीक्षेत्रमें भगवान् विष्णुका प्रसाद ग्रहण करनेसे नष्ट हो जाते हैं। पृथ्वीमें जो तीर्थ, व्रत और नियम हैं, उनसे भी शीघ्र बदरीक्षेत्रमें भगवान्का चरणामृत पवित्र करनेवाला है। यदि बदरीक्षेत्रमें मनुष्यको एक बूँद भी भगवान्का चरणामृत मिल जाय तो उसको क्या दुर्लभ है? प्रायश्चित्त तभीतक गर्जना करते हैं जबतक बदरीक्षेत्रमें भगवान्का चरणामृत नहीं मिल जाता है। जिन मनुष्योंको अनायास ही मोक्षके मार्गपर जानेकी इच्छा हो, उन्हें प्रयत्नपूर्वक बदरीक्षेत्रमें भगवान् विष्णुके प्रसादका भक्षण करना चाहिये। जो मनुष्य बदरीक्षेत्रमें दिये हुए दानको ग्रहण करते हैं वे पापी जन्म-मरणरूप संसारके भागी होते हैं। उनको कभी यात्राका फल नहीं मिलता। बदरीक्षेत्रमें संन्यासियोंको भोजन देनेसे अपराधी भी भगवान्को प्रिय हो जाता है। विष्णुके समान कोई देवता नहीं, विशालाके समान कोई पुरी नहीं, संन्यासीके समान कोई सेवाका पात्र नहीं और ऋषितीर्थ (बदरीक्षेत्र)-के समान कोई तीर्थ नहीं है*। संन्यासियोंको यहाँ विशेष फलकी प्राप्ति बतायी गयी है। दस बार वेदान्तश्रवणसे जो पुण्य कहा गया है, वह बदरीतीर्थके दर्शनमात्रसे संन्यासियोंको प्राप्त हो जाता है। ज्ञानी, अज्ञानी, संन्यासी अथवा व्रतपरायण सभी पुरुषोंको अभीष्ट फलकी प्राप्तिके लिये बदरीक्षेत्रका अवश्य दर्शन करना चाहिये।
कपालतीर्थ, ब्रह्मतीर्थ और वसुधारातीर्थकी महिमा
स्कन्द बोले— महेश्वर! जहाँ आपके हाथसे कपाल गिरा है, कृपया उस तीर्थका माहात्म्य बतलाइये।
भगवान् शिवने कहा— वत्स! वह अत्यन्त गोपनीय तीर्थ है। देवता और असुर सभी वहाँ मस्तक झुकाते हैं। ब्रह्महत्यारा मनुष्य भी वहाँ स्नान करनेमात्रसे शुद्ध हो जाता है। पापमोचन कपालतीर्थमें पाँच तीर्थ हैं। उनमें किया हुआ स्नान, तप और दान सब अक्षय होता है। वहाँ विधिपूर्वक पिण्डदान देकर पितरोंको नरकसे
* न विष्णुसदृशो देवो न विशालासमा पुरी। न भिक्षुसदृशं पात्रमृषितीर्थसमं न हि॥ (स्क० पु० वै० ब० ५। ५८)