भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 431

४०२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

उद्धार करे। यह पितृतीर्थ कहा गया है। वहाँ तिलसे तर्पण करनेपर पितर उत्तम स्वर्गलोकको जाते हैं। जो मनुष्य एकाग्रचित्त हो स्थिरतापूर्वक वहाँ एक दिन और एक रात जपमें लगा रहता है, उसके महान् मनोरथकी सिद्धि तत्काल हो जाती है। स्वामिकार्तिकेयने पूछा—पिताजी! ब्रह्मतीर्थ कहाँ है और उसका कैसा फल बताया गया है? भगवान् शिवने कहा—एक समय भगवान् विष्णुकी नाभिसे निकले हुए कमलपर प्रजापति ब्रह्माजी विराजमान थे। उसी समय मधु और कैटभ नामक दैत्य ब्रह्माजीसे वेदोंको चुराकर चल दिये। तब ब्रह्माजीने भगवान् विष्णुके द्वारा प्रतिपालित बदरीतीर्थमें आकर उन्हें प्रणाम किया और उन सनातन भगवान्‌की स्तुति की। तब भगवान् श्रीहरि हयग्रीव अवतार धारण करके एक कुण्डसे प्रकट हुए। उनके हाथोंमें शंख, चक्र आदि आयुध शोभा पा रहे थे। उनकी कटिमें पीताम्बर सुशोभित था। श्रीअंगोंकी कान्ति श्वेत थी। वे चार भुजाधारी भगवान् हयग्रीव दर्पपूर्ण दृष्टिसे सब ओर देख रहे थे। उनका स्वरूप अद्भुत था, नेत्रोंसे कठोरता प्रकट हो रही थी। उनकी गर्दनके चंचल बालोंसे टकराकर मेघोंकी घटा छिन्न-भिन्न हो जाती थी। वे अपने दिव्य तेजसे समस्त ज्योतिर्मय ग्रहोंकी प्रभाको तिरस्कृत कर रहे थे। भगवान् बड़ी कृपा करके इस अद्भुत रूपमें ब्रह्माजीके आगे खड़े हुए। उन्हें देखकर ब्रह्माजीभी आश्चर्यचकित हो उठे। उनके नेत्रोंमें प्रसन्नता छा गयी और वे प्रणाम करके भगवान्‌की स्तुति करने लगे। ब्रह्माजी बोले—जिनकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ है, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है। लक्ष्मीजीके आश्रयभूत नारायण! आपको नमस्कार है। लक्ष्मीनिकास! विशाल वनमाला धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। विज्ञानस्वरूप! आपको नमस्कार है। सबकी हृदयगुफामें निवास करनेवाले आपको नमस्कार है। जो समस्त इन्द्रियोंके स्वामी और परम शान्त हैं उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है। अपने भक्तोंकी रक्षाके लिये शरीर धारण करनेवाले भगवान् शार्ङ्गपाणिको नमस्कार है। अनन्त क्लेशोंका नाश करनेवाले गदाधारी ब्रह्मको नमस्कार है। संसारकी विविध असार वस्तुओंसे निवृत्त करनेके लिये कर्म करनेवाले भगवान्‌को नमस्कार है। समस्त जीवोंके रक्षक विजयशील विष्णुको नमस्कार है। विश्वम्भर! समस्त गुणवृत्तियोंसे निवृत्त होनेवाले आपको नमस्कार है। देवताओं और असुरोंके श्रेष्ठतम अवलम्बन! सांसारिक विषयोंसे निवृत्ति और समस्त विश्वकी रक्षा—ये दोनों आपकी कीर्तियाँ हैं। आपको नमस्कार है। सबके हृदयमें रहनेवाले सर्वज्ञ महेश्वर श्रीविष्णुकी ब्रह्माजीने जब इस प्रकार स्तुति की, तब वे शीघ्र ही वहाँ गये और उन दोनों दैत्योंको बाँधकर उन्होंने लीलापूर्वक उन्हें मार डाला। तत्पश्चात् वेदोंको लेकर वे ब्रह्माजीके समीप आये और ब्रह्माजीको देकर स्वरूपमें स्थित हो गये। तबसे ब्रह्माद्वारा प्रकट किया हुआ वह तीर्थ तीनों लोकोंमें ब्रह्मकुण्डके नामसे विख्यात हुआ। उसके दर्शनमात्रसे महापातकी मनुष्य भी पापरहित हो तत्काल ब्रह्मलोकमें चले जाते हैं। जो लोग यहाँ स्नान और व्रत करते हैं, वे ब्रह्मलोकको भी लाँघकर विष्णुलोकमें जाते हैं। स्कन्दने पूछा—वेदोंको पाकर ब्रह्माजीने क्या किया? श्रीमहादेवजी बोले—वत्स! बदरिकाश्रमतीर्थ देखकर चारों वेद ब्रह्माजीके साथ जाना नहीं चाहते थे। तब सिद्धोंके समझानेपर वेदोंने दो स्वरूप धारण किये। द्रवरूपसे तो वे बदरिकाश्रमतीर्थमें रह गये और ज्ञानरूपसे ब्रह्माजीके साथ गये। तब ब्रह्माजीने (वेदोंके अनुसार) विधिपूर्वक तीनों लोकोंको रचा। (इस ओर) ब्रह्मकुण्डमें, जहाँ द्रवरूपी वेद स्थित हैं, किये हुए स्नान, दान