भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 432, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 432
  • वैष्णवखण्ड-बदरिकाश्रम-माहात्म्य * ४०३

और तप प्रलयकालतक नष्ट नहीं होते। फलस्वरूपसे वैदिक ज्ञानकी अभिलाषा रखकर जो मनुष्य वहाँ तीन उपवास करते हैं, वे चारों वेदोंकी व्याख्या करनेवाले होते हैं। वेदतीर्थसे उत्तर जलरूपा सरस्वती हैं जो अपने नामका जप करनेपर मनुष्योंकी जड़ताका नाश करती हैं। सरस्वतीके जलमें स्थित होकर एकाग्रचित्तसे जो जप करता है, उसका मन्त्र कभी खण्डित नहीं होता। जगदीश्वर विष्णुने तीनों लोकोंका हित करनेके लिये वाग्वैभव प्रदान करनेवाली सरस्वती नदीका विधिपूर्वक यहाँ स्थापन किया है। इस तीर्थके दर्शन, स्पर्श, स्नान, पूजन, स्तुति और प्रणाम करनेसे मनुष्यके कुलमें कभी सरस्वतीसे बिछोह नहीं होता। सरस्वतीके दक्षिण भागमें द्रवाधारा नामसे प्रसिद्ध इन्द्रपद तीर्थ है, जहाँ इन्द्रने तपस्या की थी। प्रत्येक मासके शुक्लपक्षमें त्रयोदशी तिथिको इन्द्रको सन्तुष्ट करनेवाले उस तीर्थमें स्नान करके दो उपवास और भगवान् विष्णुका पूजन करनेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो इन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। वहीं मानसोद्भेद तीर्थ है जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। वह सब जीवोंके लिये दुर्लभ है। वहाँ जो महर्षि हैं, वे हृदयग्रन्थिका भेदन करते हैं, सब संशयोंको काटते हैं और कर्मबन्धनको क्षीण कर डालते हैं। इसीलिये उस तीर्थका नाम मानसोद्भेद है। यदि भाग्यवश मनुष्य वहाँ एक बूंद भी जल पा जाय तो तत्काल उसकी मुक्ति हो जाती है। जो मनके विषयोंको जीत चुके हैं, जिनकी बुद्धि अत्यन्त तीक्ष्ण है और जो फल, मूल एवं जलका आहार करके रहते हैं, ऐसे महर्षिगण यहाँकी पर्वतीय गुफाओंमें निवास करते हैं। ये मुनि फलाहार, शुद्ध वायुसेवन, गुफाका निवास, झरनोंके जलमें स्नान तथा आश्रमधर्मका पालन करते हैं और वल्कल या ऊर्णामय उत्तम वस्त्र धारण करके तीनों समयके स्नानसे दुर्जय इन्द्रियोंके पराक्रमपर भी विजय पा चुके हैं। यहाँपर बिना इच्छाके भी मुक्ति होती है। यदि कोई प्रमादवश किसी वस्तुकी कामना करता है तो उस कामनाके अनुसार फल भोग लेनेपर फिर उसकी मुक्ति होती ही है। मानसोद्भेदतीर्थसे पश्चिम वसुधारा नामसे प्रसिद्ध एक मनोहर तीर्थ है। कहते हैं कि त्रिलोकीमें बदरिकाश्रम सब तीर्थोंसे श्रेष्ठ है, यह बात नारदजीके मुँहसे सुनकर सभी वसु वहाँ गये। उन्होंने पत्ते चबाकर और जल पीकर वहाँ बड़ी कठोर तपस्या की। इससे उन्हें भगवान्‌का दर्शन प्राप्त हुआ और वे आनन्दमें डूब गये। इस प्रकार नारायणदेवका दर्शन करके उनसे मनोरम वरदानके रूपमें हरिभक्ति, सुख और ऐश्वर्य पाकर वे बहुत प्रसन्न हुए। इस वसुतीर्थमें स्नान और आचमन करके भगवान् जनार्दनका पूजन करनेसे मनुष्य इहलोकमें सुख भोगता और अन्तमें परमपदको प्राप्त होता है। यहाँ पुण्यात्मा पुरुषोंको जलके मध्यसे ज्योति निकलती दिखायी देती है, जिसे देखकर मनुष्य फिर गर्भवासमें नहीं आता। यहाँ तीन दिनतक पवित्र हो उपवास और भक्तिपूर्वक भगवान् जनार्दनकी पूजा करनेसे साधुपुरुष सिद्धोंका दर्शन पाते हैं। जो लोभी और चंचल हैं, जो सत्य नहीं बोलते, परिहासके व्याजसे पराये धन और परायी स्त्रीको कपटसे ग्रहण करना चाहते हैं, जिन्होंने सत्कर्मोंका त्याग कर दिया है, जो अशान्त और अपवित्र रहते हैं, ऐसे मलिनचित्त मानवोंको यहाँ कोई फल नहीं मिलता। जो साधनसंलग्न, शान्त, एकाकी और विधिमार्गका पालन करनेवाले हैं, उनके द्वारा यथाशक्ति किये हुए जप, तप, होम, दान और व्रत आदि कर्म यहाँ अक्षय फल देनेवाले होते हैं। जो मनुष्य भक्तिभावसे विभूषित हो इस पुण्यतीर्थके विषयको पढ़ते-पढ़ाते एवं प्रकाशित करते हैं, वे भगवान् विष्णुके कल्याणमय धाममें जाते हैं।