संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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पंचतीर्थ, सोमतीर्थ, द्वादशादित्यतीर्थ, चतुःस्रोततीर्थ, सत्यपदतीर्थ तथा नर-नारायणाश्रमकी महिमा
भगवान् शिवजी कहते हैं— वहाँसे नैर्ऋत्य कोणमें पाँच धाराएँ गिरती हैं, उन्हें द्रवरूपमें पाँच तीर्थ जानो, जिनके नाम इस प्रकार हैं— प्रभास, पुष्कर, गया, नैमिष और कुरुक्षेत्र। उनमें विधिपूर्वक स्नान और नित्यकर्म करके पवित्र हुआ मनुष्य उन-उन तीर्थोंका फल पाता और अन्तमें परम पदको प्राप्त होता है। उन तीर्थोंमें भगवान् विष्णुकी पूजा करके मानव इस लोकमें बहुत सुख भोगता और अन्तमें विष्णुका सालोक्य प्राप्त करता है। उसके बाद सोमकुण्ड नामक निर्मल तीर्थ हैं, जहाँ चन्द्रमाने तपस्या की है। पूर्वकालमें अत्रिकुमार चन्द्रमा जब युवावस्थाको प्राप्त हुए, तब उन्होंने गन्धर्वोंसे स्वर्गवासियोंके सुखकी बार-बार प्रशंसा सुनकर अपने पितासे पूछा कि 'स्वर्गीय सुख कैसे मिलता है।' अत्रिने कहा—'बेटा! तपस्या, यम और नियमोंके द्वारा भगवान् विष्णुकी आराधना की जाय तो साधुपुरुषोंके लिये इहलोक और परलोकमें कौन-सी वस्तु दुर्लभ है?' तदनन्तर नारदजीसे यह सुनकर कि 'बदरीक्षेत्र अत्यन्त निर्मल है' वे अपने पिताको प्रणाम करके उत्तर दिशाको गये। बदरीतीर्थमें पहुँचकर उन्होंने पवित्र फलोंसे भगवान् विष्णुका पूजन किया और परम उत्तम अष्टाक्षर 'ॐ नमो नारायणाय' मन्त्रका जप प्रारम्भ किया। दीर्घकालतक जप-तप करनेके पश्चात् भक्तवत्सल भगवान् प्रसन्न होकर चन्द्रमासे बोले—'सुव्रत! कोई वर माँगो'। तब चन्द्रमाने उठकर बार-बार प्रणाम करके कहा—'भगवन्! मैं आपके प्रसादसे ग्रह, नक्षत्र, तारा, ओषधिवर्ग तथा सम्पूर्ण ब्राह्मणोंका राजा होना चाहता हूँ।'
श्रीभगवान् बोले— वत्स! तुमने दुर्लभ वर माँगा है तथापि तुम्हें देता हूँ—ऐसा ही होगा।
तब सम्पूर्ण देवताओंगोने आकर राजा सोमका विधिपूर्वक अभिषेक किया। उसके बाद वे उज्ज्वल रथके द्वारा स्वर्गको चले गये। तबसे वह तीर्थ सोमकुण्डके नामसे प्रसिद्ध हुआ, जिसके दर्शनमात्रसे मनुष्य निष्पाप हो जाते हैं। उसमें आचमन करनेसे निन्दित मनुष्य भी चन्द्रलोकमें जाते हैं और वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करनेवाला पुरुष चन्द्रलोकको भेदकर विष्णुलोकको प्राप्त होता है। वहाँ तीन राततक भगवान् विष्णुकी पूजा करके जप करनेवाले पुरुषको विशेषरूपसे मन्त्रसिद्धि प्राप्त होती है। मनुष्य मन, वाणी और क्रियाद्वारा जो पाप करता है वह सब वहाँ सोमकुण्डके दर्शनसे नष्ट हो जाता है। वहाँसे आगे द्वादशादित्य नामक तीर्थ है जहाँ तपस्या करके कश्यपजीके पुत्रने सूर्यकी पदवी प्राप्त की है। वहाँ प्रत्येक रविवारको सप्तमी तिथिमें अथवा संक्रान्तिके अवसरपर विधिपूर्वक स्नान करनेमात्रसे मनुष्य सात जन्मोंके पापसे मुक्त हो जाता है। महान् रोगसे पीड़ित पुरुष यदि यहाँ स्नान करके जल पीकर पवित्र हो तो शीघ्र ही वह रोगसे छुटकारा पा जाता है। इसके सिवा वहाँ चतुःस्रोत नामक तीर्थ है। उस वैष्णवक्षेत्रमें भगवान्की आज्ञाके अनुसार धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—ये चारों पुरुषार्थ द्रवरूप होकर स्थित हैं जो सब प्राणियोंकी मुक्तिके हेतु हैं। पूर्व आदि दिशाओंमें क्रमशः उनकी स्थिति है अर्थात् पूर्वमें धर्म, दक्षिणमें अर्थ, पश्चिममें काम और उत्तरमें मोक्ष नामक स्रोत है। ये धर्मप्रधान पुरुषोंकी भाँति मूर्तिमान् होकर स्थित हैं। जो क्रमशः विद्यमान उन चारों