भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 434
  • वैष्णवखण्ड-बदरिकाश्रम-माहात्म्य * \hfill ४०५

तीर्थोंका सेवन करते हैं, उन्हें सदैव प्रसन्नता प्राप्त होती है। पूर्वोपार्जित पुण्यपुंजके प्रभावसे श्रेष्ठ जन्म पाकर जो मनुष्य साधनमें प्रवृत्त हैं वे उन चारों पुरुषार्थोंको देखते हैं और जो ग्राम्यवधुओंके क्रीडामृग—विषयभोगोंमें आसक्त हैं वे उन पुरुषार्थोंका दर्शन नहीं कर पाते।

उसके बाद सत्यपद नामक तीर्थ है जो त्रिकोणाकार कुण्डके रूपमें विद्यमान है। वह सब पापोंका नाश करनेवाला है। एकादशी तिथिको उस पावन तीर्थमें साक्षात् भगवान् विष्णु पधारते हैं। तत्पश्चात् ऋषि, मुनि, तपस्वी उस कुण्डमें स्नान करनेके लिये आते हैं। उस तीर्थके दर्शनसे बड़े-बड़े पातक भाग जाते हैं। उसमें स्नान करके बुद्धिमान् पुरुष सत्यलोकको प्राप्त होता है और वहाँसे उसका मोक्ष हो जाता है। जो वहाँ एक दिन और एक रात उपवास करके भगवान् जनार्दनकी यथाशक्ति पूजा करता है वह जीवन्मुक्तिका भागी होता है। त्रिकोण आकृतिसे सुशोभित सत्यपदतीर्थ सब पापोंसे मुक्ति चाहनेवाले पुरुषोंके द्वारा प्रयत्नपूर्वक दर्शन करनेयोग्य है। वहाँ जप, तप, हरिस्तोत्र, पूजा, स्तुति और प्रणाम करनेवाले पुरुषोंकी महिमाका वर्णन ब्रह्माजी भी नहीं कर सकते।

तदनन्तर अत्यन्त निर्मल भगवान् नर-नारायणका आश्रम है। वहाँका स्वच्छ जल दो प्रकारका दिखायी देता है। उन दोनों जलोंके सेवनसे उन दोनों नर और नारायणके प्रति प्रीति होती है, यह निश्चय किया गया है। वहाँ स्नान और यत्नपूर्वक भगवान्‌का पूजन करनेसे मनुष्य तत्काल सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। धर्मकी पत्नी मूर्तिसे भगवान्‌का नर और नारायणके रूपमें अवतार हुआ। वे दोनों माता-पिताकी आज्ञा लेकर तपस्याके लिये गये और नर-नारायण नामवाले दोनों पर्वतोंके बीच तपस्याकी साक्षात् मूर्तिके समान स्थित हो गये। उस तीर्थमें स्नान करके भगवान् विष्णुका पूजन करनेसे मनुष्य नरसे नारायण हो जाता है। वहाँ प्राणियोंका कल्याण करनेवाले साक्षात् भगवान् नारायण तपोमूर्ति होकर स्थित हैं। वहाँ वायु श्रीलक्ष्मीपतिके चरणारविन्दोंसे प्राप्त होनेवाली सुगन्ध लेकर बहती है, जिसका स्पर्श होनेसे कलियुगके पापसे आतुर हुए मनुष्योंका पाप नष्ट हो जाता है। उस तीर्थमें जाकर मुनियोंकी बुद्धि बाह्य पदार्थोंको नहीं देखती, केवल भगवच्चरणारविन्दोंके चिन्तनमें संलग्न रहती है और वहाँ विराजमान साक्षात् भगवान् विष्णु क्रमशः वहाँकी यात्रा करनेवाले पुरुषोंको अपना पद प्रदान करते हैं। उस नारायणगिरिपर सब पापोंका नाश करनेवाले बहुत-से तीर्थ हैं जिन्हें मैं जानता हूँ, साधारण मनुष्य नहीं जानते। उसके दक्षिण भागमें जगदीश्वर विष्णुके अस्त्र विद्यमान हैं, जिनके दर्शनसे मनुष्य अस्त्र-शस्त्रोंके भयका भागी नहीं होता। जो एकाग्रचित्त हो भक्तिपूर्वक इस माहात्म्यको सुनता अथवा सुनाता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुका सालोक्य प्राप्त करता है।


मेरूतीर्थ, लोकपालतीर्थ, दण्डपुष्करिणी, गंगासंगम तथा धर्मक्षेत्र आदिका माहात्म्य और ग्रन्थका उपसंहार

**भगवान् शिव कहते हैं—**ब्रह्मकुण्डसे दक्षिण नरका निवासभूत महान् पर्वत है। जहाँ भगवान्श्रीहरिने लोकसुन्दर मेरुपर्वतको स्थापित किया है। जब भगवान्‌का निवास विशालापुरीमें हुआ,