संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 435, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें४०६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
तब विद्याधर और चारणोंसहित सम्पूर्ण देवता, महर्षि और सिद्ध भगवद्दर्शनके लिये उत्कण्ठित हो मेरुपर्वतके शिखरोंको छोड़कर वहाँ आ गये। भगवान्के दर्शनसे उन्हें ऐसा आह्लाद प्राप्त हुआ कि देवलोक तुच्छ प्रतीत होने लगा। तब भगवान्ने उनके सुखके लिये एक ही हाथसे मेरुपर्वतके शिखरोंको उखाड़ लिया और लीलापूर्वक उन्हें यहाँ स्थापित कर दिया; क्योंकि भगवान् विष्णु सबकी प्रीति बढ़ानेवाले हैं। उस समय वहाँ सुवर्णनिर्मित पर्वतको देखकर सब देवता बड़े प्रसन्न हुए और रोग-शोकसे रहित भगवान् नारायणका उन्होंने इस प्रकार स्तवन किया।
**देवता बोले—**जो हम देवताओंके सुखके लिये तथा संसारबन्धनजनित दुःखको दूर करनेके लिये लीलामय शरीर धारण करके स्वर्णमय पर्वतको यहाँ ले आये हैं तथा जिन्होंने एकमात्र देवताओंका पक्ष लेकर सैकड़ों दैत्योंपर विजय पायी है, उग्र तपस्याकी दिव्य शोभासे सम्पन्न उन भगवान् नारायणको हम नमस्कार करते हैं। जो दीनजनोंकी पीड़ारूपी रूईको भस्म करनेके लिये अग्निमय पर्वत हैं, हमपर दया करके जो हमें दयालु पिताकी भाँति उत्तम शिक्षा देते हैं, त्रिभुवनकी रक्षा करनेमें समर्थ दृष्टिपातसे जो पूर्णसुधाका समुद्र प्रवाहित करते हैं, वे भगवान् विपत्तियोंसे हमारी रक्षा करें। ऋषि बोले—'यह समस्त संसार जिनसे व्याप्त होकर शोभा पा रहा है, उन आप सनातन प्रभुको हम प्रणाम करते हैं।' सिद्ध बोले—'भगवान्की दयाके लवलेशमात्रसे महापुरुष सिद्धिको प्राप्त हुए हैं तथा दूसरे संसारी मनुष्य भी उनकी कृपाके कणमात्रसे भयंकर संसारसागरसे शीघ्र ही पार हो गये हैं। ऐसा हमारी बुद्धिका निश्चय है।' विद्याधर बोले—'सर्वव्यापी प्रभो! आप सद्गुणोंके समूह, कल्याणकी मूर्ति परमेश्वर और सम्मानके विस्तारमें हेतु हैं, आपके चरणारविन्दोंके रसका आस्वादन करके हम कृतार्थ हो गये।'
तब भगवान् विष्णुने प्रसन्न होकर देवताओंसे कहा—'तुमलोग कोई वर माँगो।' यह आज्ञा पाकर देवताओंने वरदाताओंमें श्रेष्ठ श्रीहरिसे कहा—'आप देवताओंके भी देवता और साक्षात् लक्ष्मीपति हैं। यदि आप सन्तुष्ट हैं तो हम यही चाहते हैं कि आप बदरीतीर्थ और मेरुपर्वतका कभी त्याग न करें। जो पुण्यभागी मनुष्य यहाँ मेरु-शिखरका दर्शन करते हैं, आपके प्रसादसे उनका मेरुगिरिपर निवास हो और वहाँ चिरकालतक उत्तम भोग भोगनेके पश्चात् उनका आपमें लय हो।' तब 'एवमस्तु' कहकर भगवान् श्रीहरि अन्तर्धान हो गये।
इसके पश्चात् परम उत्तम लोकपालतीर्थ है जहाँ भगवान् विष्णुने स्वयं ही लोकपालोंको स्थापित किया है। एक समय भगवान् विष्णु मेरुनिवासी देवताओंको यहाँ लानेकी इच्छासे वहाँ गये और देवताओं तथा प्रधान-प्रधान ऋषियोंके चरित्रको देखनेके लिये उद्यत हुए। भगवान्को वहाँ उपस्थित देख सब देवताओंने सहसा उठकर नमस्कार किया और विनयपूर्वक