संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 436, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- वैष्णवखण्ड-बदरिकाश्रम-माहात्म्य * ४०७
कहा—'भगवन्! प्रसन्न होइये।' क्षणभर विश्राम करनेके पश्चात् भगवान्ने वहाँकी विरल भूमिको भलीभाँति देखा और देवताओं तथा ऋषियोंका वहाँ एक साथ रहना उचित न समझकर हँसते हुए कहा—'लोकपालो! आपको यहाँ नहीं रहना चाहिये। आपलोगोंके योग्य स्थानकी व्यवस्था मैंने पहलेसे ही कर रखी है।' यों कहकर उन्होंने लोकपालोंको बुलाया और बदरीक्षेत्रमें सुन्दर पर्वतके शिखरपर स्थापित किया। वहीं जलकी इच्छासे उन्होंने शैलदण्डके द्वारा एक पर्वतको तोड़कर मनोहर सरोवर बनाया जहाँ भगवान् विष्णु द्वादशी और पूर्णिमाको स्नान करनेके लिये आते हैं। तत्पश्चात् तपस्वी ऋषि-मुनि वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके जलमें असंग परम ज्योतिका दर्शन करते हैं। सब तीर्थोंमें स्नान करनेका जो फल कहा गया है, वह दण्डपुष्करिणीके दर्शनमात्रसे तत्काल प्राप्त हो जाता है। वहाँ मनीषी पुरुषोंके सभी काम्य कर्म सफल होते हैं तथा यज्ञ, दान और तप सब अक्षय हो जाते हैं। वहाँ ज्येष्ठ मासमें शुक्ल पक्षकी द्वादशी तिथिको विधिपूर्वक स्नान करनेसे मनुष्य कृतार्थ हो जाता है। जो सदा भगवान्के निकट स्थान प्राप्त करना चाहता हो उसे प्रयत्नपूर्वक बदरीक्षेत्रका सेवन करना चाहिये। मानसोद्भेदतीर्थके समीप जो गंगाजीमें संगम है वह निर्मल एवं पवित्र तीर्थ प्रयागसे भी अधिक महत्त्वशाली है। तीस हजार वर्षोंतक वायु पीकर तपस्या करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह गंगासंगममें स्नान करनेमात्रसे मिल जाता है।
संगमसे दक्षिण भागमें धर्मक्षेत्र है जहाँ मूर्तिके गर्भसे नर-नारायण ऋषिकी उत्पत्ति हुई सुनी जाती है। मर्त्यलोकमें वह सबसे उत्तम एवं पावन क्षेत्र है। वहाँ भगवान् धर्म चारों चरणोंसे स्थित हैं। वहाँ मनुष्य यज्ञ, दान, तप आदि जो कोई भी सत्कर्म करते हैं, उसके पुण्यका करोड़ों कल्पोंमें भी क्षय नहीं होता। वहाँसे दक्षिण भागमें उर्वशीसंगम नामक तीर्थ है जो स्नानमात्रसे ही मनुष्योंके सब पापोंको हर लेनेवाला है। उसके बाद कूर्मोद्धारतीर्थ है जो भगवान् विष्णुकी भक्तिका एकमात्र साधन है। वहाँ स्नान करनेसे ही प्राणियोंके अन्तःकरणकी शुद्धि हो जाती है। तदनन्तर ब्रह्मावर्ततीर्थ है जो साक्षात् ब्रह्मलोककी प्राप्तिका प्रधान कारण है। उस तीर्थके दर्शनसे ही सब पापोंका क्षय हो जाता है। वत्स! यहाँ बहुत-से तीर्थ हैं जो देहधारियोंके लिये दुर्गम हैं। मैंने तुम्हारे स्नेहवश संक्षेपसे बतलाया है। जो मनुष्य सदा एकाग्रचित्त होकर प्रतिदिन इस माहात्म्यको सुनता या सुनाता है वह सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। जो मनुष्य एक मासतक एकाग्रचित्त हो भक्तिपूर्वक इसको सुनता है उसके दुर्लभ अभीष्टकी भी सिद्धि हो जाती है। जिन घरोंमें इस माहात्म्यका पाठ होता है वहाँ आधि-व्याधिका घोर भय, दरिद्रता और कलह—ये कभी नहीं होते हैं।
$\sim\sim\circ\sim\sim$